राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : संघ शक्ति से एकजुट होती सज्जन-शक्ति
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : संघ शक्ति से एकजुट होती सज्जन-शक्ति

अनेक संगठनों के माध्यम से संघ के स्वयंसेवक देशहित में समाज को जगाने और सक्रिय करने में लगे हैं। बांग्लादेशी घुसपैठ, जिहाद, देशविरोधी वामपंथी विचार, नक्सलवाद जैसे मामलों को लेकर संघ के स्वयंसेवक वर्षों से समाज जागरण कर रहे हैं। इसका परिणाम भी दिख रहा है। वामपंथी उखड़ रहे हैें, नक्सली हथियार डाल रहे हैं, जिहादी अंतिम सांस ले रहे हैं

Written byविजय कुमारविजय कुमार
Dec 22, 2025, 06:46 am IST
inसंघ @100
किशनगंज में 2008 में बांग्लादेशी घुसपैठ के विरोध में अभाविप की एक रैली

किशनगंज में 2008 में बांग्लादेशी घुसपैठ के विरोध में अभाविप की एक रैली

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के लिए राष्ट्र सर्वोपरि है। शाखा से प्राप्त संस्कारों के कारण वह व्यक्ति, परिवार और गांव से आगे जाकर राष्ट्रहित में काम करता है। डॉ. हेडगेवार 1921 के ‘असहयोग आंदोलन’ तथा 1930 के ‘जंगल सत्याग्रह’ में जेल गए थे। हजारों स्वयंसेवकों ने भी उनका अनुसरण किया। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ तथा महाराष्ट्र में आष्टि चिमूर के विद्रोह में स्वयंसेवकों का प्रत्यक्ष सहभाग उल्लेखनीय है। 1947 में हिंदुओं को बचाने में संघ की भूमिका की प्रशंसा विरोधियों ने भी की है। आजादी के बाद दिल्ली के मजहबी दंगों में गांधी जी और नेहरू जी की सुरक्षा भी संघ ने की।

आजादी एवं विभाजन के बाद जम्मू-कश्मीर में श्रीनगर, जम्मू, मीरपुर, कोटली, अनंतनाग, राजौरी, पुंछ आदि की रक्षार्थ कई स्वयंसेवकों ने प्राण दिए। ‘एक विधान, एक प्रधान और एक निशान’ के लिए डॉ. मुखर्जी का बलिदान हुआ। हजारों स्वयंसेवकों ने ‘प्रजा परिषद’ तथा ‘भारतीय जनसंघ’ के बैनर तले इसके लिए सत्याग्रह किया। 1989-90 में कश्मीर में शुरू किए गए आतंकवाद के कारण वहां से हिंदुओं का जबरदस्त पलायन हुआ। 1990 में ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ तथा ‘राष्ट्र सेविका समिति’ ने इस बारे में देश को जागरूक किया। 2008 का ‘अमरनाथ आंदोलन’ भी हिंदू जागृति के लिए याद किया जाएगा।

1999 में करगिल युद्ध के समय संघ ने अपनी गौरवशाली परंपरा के अनुसार सेना की सहायता की। इसकी प्रशंसा सभी सैन्य अधिकारियों ने की। इससे पूर्व 1962 में चीन से युद्ध के समय स्वयंसेवकों की भूमिका से प्रभावित होकर नेहरू जी ने संघ को गणतंत्र दिवस (26 जनवरी, 1963) की परेड में शामिल किया। 1965 में पाकिस्तानी हमले के समय सीमा पर प्रत्यक्ष सहायता के अलावा स्वयंसेवकों ने दिल्ली का यातायात संभाला तथा रक्तदान के कीर्तिमान स्थापित किए। प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने तो तत्कालीन सरसंघचालक श्रीगुरुजी को परामर्श के लिए 6 सितंबर, 1965 को दिल्ली में एक बैठक में आमंत्रित किया था।

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 1975 का आपातकाल एक काला अध्याय है। उन दिनों भ्रष्टाचार से घिरीं इंदिरा गांधी का पार्टी में बहुत विरोध था। संजय गांधी के फरमान संविधान से ऊपर माने जाते थे। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार और गुजरात में संघ, विद्यार्थी परिषद और जनसंघ के सहयोग से युवा वर्ग सड़कों पर उतरा हुआ था। अतः इंदिरा गांधी ने 25 जून को आपातकाल लगा दिया। विपक्षी नेता पकड़ लिए गए। चार जुलाई को संघ पर प्रतिबंध लग गया।

जब पूरा देश निराश था, तब स्वयंसेवकों ने साइक्लोस्टाइल पर्चे बांटकर देश को जाग्रत किया। ‘लोक संघर्ष समिति’ के नाम पर 14 नवंबर, 1975 से 26 जनवरी, 1976 तक सत्याग्रह हुआ। लगभग सवा लाख लोग जेल गए, जिनमें एक लाख स्वयंसेवक ही थे। थाने और जेलों में हजारों का शारीरिक उत्पीड़न हुआ, कई का निधन हो गया। इस दौरान स्वयंसेवकों ने बंदीजनों के परिवारों की भी देखभाल की।
लोक संघर्ष समिति के प्रमुख यद्यपि जयप्रकाश जी तथा पुरानी कांग्रेस के रवीन्द्र वर्मा थे; पर असली काम जनसंघ के नानाजी देशमुख तथा संघ ने ही किया। सुबह्मण्यम स्वामी, केदारनाथ साहनी, मकरंद देसाई आदि ने विदेशों में तानाशाही का भंडाफोड़ किया। 15 अगस्त को लालकिले से इंदिरा गांधी के भाषण के समय तथा 2 नवंबर, 1975 को राष्ट्रमंडल देशों के सांसदों के सम्मेलन में स्वयंसेवकों ने साहसपूर्वक पर्चे बांटे। गांधी जयंती, नेहरू एवं इंदिरा जयंती, गणतंत्र दिवस जैसे कार्यक्रमों में भी जनता की आवाज बुलंद की गई। आपातकाल में घरेलू संपर्क के कारण संघ के 90 प्रतिशत प्रचारक पकड़े नहीं जा सके।

देश-विदेश के दबाव में इंदिरा गांधी ने लोकसभा के चुनाव घोषित कर दिए। इसके लिए विपक्षी नेताओं को जेल से छोड़ा गया। संघ के प्रयास से सबने मिलकर ‘जनता पार्टी’ के बैनर तले चुनाव लड़ा। चुनाव में जनता का गुस्सा फूटा और कांग्रेस हार गई। इस संघर्ष की रीढ़ संघ ही था। अतः चुनाव से पूर्व शासन ने संघ से संपर्क कर प्रतिबंध हटाने की बात कही। उनकी शर्त थी कि स्वयंसेवक चुनाव में निष्क्रिय हो जाएं; पर संघ ने इसे ठुकरा दिया।

1948 में भी स्वयंसेवकों के सत्याग्रह ने सरकार को झुकाया था। तब गांधी जी की हत्या के झूठे आरोप में संघ पर प्रतिबंध लगा था। हर देशघाती शासकीय नीति का संघ ने विरोध किया है। चाहे वह ‘कच्छ समझौता’ हो या ‘तीन बीघा आंदोलन’। वामपंथी आतंक देश की बड़ी समस्या है। इसका सर्वाधिक शिकार तेलंगाना क्षेत्र हुआ। वारंगल का काकतीय विश्वविद्यालय तो नक्सलियों का प्रशिक्षण केंद्र ही था। वहां लेनिन और माओ के चित्र तथा लाल झंडे फहराए जाते थे। उस्मानिया विश्वविद्यालय (हैदराबाद) की स्थिति भी ऐसी ही थी। यह चुनौती विद्यार्थी परिषद ने स्वीकार की और सैकड़ों युवाओं ने प्राण देकर विश्वविद्यालयों तथा पूरे राज्य को इन तत्वों से मुक्त किया। गांवों में भारतीय किसान संघ ने इन्हें उखाड़ने में विशेष भूमिका निभायी।

पंजाब में उग्रवाद

1980 के दशक में कांग्रेस ने अपने राजनीतिक उद्देश्य के लिए पंजाब में उग्रवाद को बढ़ावा दिया, जो फिर भस्मासुर बन गया। हिंदू और सिखों में दरार डाल दी गई। इसे सुधारने में संघ, विश्व हिंदू परिषद, विद्यार्थी परिषद, ज्ञान प्रबोधिनी, राष्ट्रीय सुरक्षा समिति आदि का बड़ा योगदान रहा। कई शाखाओं पर हमले हुए, जिसमें स्वयंसेवक मारे गए; पर संघ ने सद्भाव का मार्ग नहीं छोड़ा। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई हिंसा में कई जगह स्वयंसेवकों ने सिखों को शरण दी। आतंकवादी हमले में घायलों को ‘पंजाब पीड़ित सहायता समिति’ ने सहायता दी। समस्या के स्थायी समाधान के लिए ‘राष्ट्रीय सिख संगत’ का गठन हुआ, जिसने देश और विदेश में प्रबुद्ध सिखों को जागरूक करने में बड़ी भूमिका निभाई।

विद्यार्थी परिषद ने युवाओं की संगठित ऊर्जा को निर्धन, वनवासी एवं समस्याग्रस्त क्षेत्रों में लगाया। इससे सैकड़ों सेवा कार्य खड़े हुए। अतः सामाजिक कुरीतियां तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में तस्करी घटी। परिषद ने सर्वेक्षण तथा समाज प्रबोधन के कई कार्यक्रम किए। इनमें हिंदी एवं वंदे मातरम् का समर्थन, उर्दू का विरोध, परिसर की रक्षा, शैक्षिक परिवार भावना, गुरु पूजा आदि प्रमुख हैं। असम में बांग्लादेश से हो रही मुस्लिम घुसपैठ पर पूरे देश को जाग्रत करने का श्रेय विद्यार्थी परिषद को ही है। इसके लिए सर्वेक्षण, प्रदर्शन, गोष्ठियां तथा शहीद ज्योति यात्रा जैसे अभिनव कार्यक्रम किए गए। पूर्वोत्तर और शेष भारत की दूरी घटाने में 1966 से शुरू ‘अंतरराज्यीय छात्र जीवन दर्शन’ का बड़ा योगदान है। श्रीलंका के शरणार्थियों की समस्या पर ध्यान दिलाने के लिए 26 जून, 1985 को पूरे देश में ‘श्रीलंका दिवस’ मनाया गया।

पंजाब में उग्रवाद के दौरान अमृतसर से दिल्ली तक ‘श्री गुरु तेगबहादुर शहीदी संदेश ज्योति यात्रा’ निकाली गई। इन कार्यक्रमों में कई पत्रकार तथा बुद्धिजीवी भी सहभागी हुए। संघ का काम मुख्यतः नई पीढ़ी में देशभक्ति एवं अनुशासन निर्माण करना है; पर न जाने क्यों इससे देशविरोधी बेचैन हो जाते हैं। इनमें मिशनरी, कट्टर मुस्लिम और वामपंथी ताकतें प्रमुख हैं। पूर्वोत्तर भारत में कई प्रचारक तथा स्थानीय कार्यकर्ताओं की हत्या के बावजूद संघ ने शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा के काम जारी रखे। अतः स्थानीय जनजातियों के अधिकांश बड़े नेता संघ से जुड़ गए हैं। इसका प्रभाव अब हर क्षेत्र में प्रकट हो रहा है। तमिलनाडु में भी मिशनरियों ने ‘विवेकानंद शिला स्मारक’ निर्माण का घोर विरोध किया; पर वे विफल हुए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष : जागरण से परिवर्तन

Topics: बांग्लादेशी घुसपैठस्वयंसेवकविजय कुमाररा.स्व.संघकश्मीर समस्याविश्व हिंदू परिषदउग्रवाद और नक्सलवादआपातकालजागरूकताजिहाददेशविरोधी ताकतेंविभाजन की विभीषिकावामपंथी कट्टरपंथराष्ट्रीय सुरक्षास्वतंत्रता संग्रामनक्सलवादपाञ्चजन्य विशेष
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