राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 :जागरण से परिवर्तन
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष : जागरण से परिवर्तन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठन शिक्षा, स्वावलंबन, रोजगार, संस्कार के अनेक प्रकल्प चला रहे हैं। इनसे कन्वर्जन जैसी गतिविधियों पर कुछ हद तक रोक लगी है। ऐसे प्रकल्प विदेश में रहने वाले स्वयंसेवक भी चला रहे हैं। इन कार्यों ने एक अच्छा वातारण बनाया है।  प्रथम कड़ी-

Written byविजय कुमारविजय कुमार
Dec 4, 2025, 12:06 pm IST
inविश्लेषण, संघ @100

भारत धर्मप्राण देश है। विदेशी और विधर्मियों के हमले से विश्व की अधिकांश सभ्यताएं नष्ट हो गईं, पर हमें धर्म ने बचा लिया। यद्यपि कई जगह थोथे कर्मकांड, छुआछूत और ऊंच-नीच का दुष्परिणाम कन्वर्जन और देश-विभाजन में हुआ। अतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने धर्म जागरण के व्यावहारिक काम हाथ में लिए। इससे कन्वर्जन की बजाय परावर्तन और घरवापसी होने लगी। इसमें विश्व हिंदू परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, विद्या भारती आदि का विशेष योगदान है।

सेवा और शिक्षण केंद्र

आजादी के बाद बनी सरकार की सोच में धर्म गौण था। अतः मिशनरियों ने सेवा के नाम पर हजारों गैर सरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) बनाकर ईसाईकरण की गति बढ़ा दी। पैसे की वहां कोई कमी नहीं थी। इससे पूर्वोत्तर भारत विशेष प्रभावित हुआ। अतः संघ-प्रेरित संस्थाओं ने वहां चिकित्सालय, छात्रावास, विद्यालय आदि शुरू किए। देश के सभी राज्यों में वहां के छात्र-छात्राओं के लिए छात्रावास बनाए गए। इससे नई पीढ़ी में देशप्रेम जाग्रत हुआ और वातावरण बदला।

अंग्रेजों ने स्थानीय जनजातियों को कहा, “वे प्रकृति-पूजक हैं, हिंदू नहीं, क्योंकि हिंदू से अलग होने पर उनका कन्वर्जन सरल हो जाता था।” विश्व हिंदू परिषद ने रानी मां गाइदिन्ल्यू, एन.सी.जेलियांग, हिप्सन राय, एच.अंडरसन मावरी, तालुम रुकबो, गेगांग अपांग, नीलवीर शास्त्री, कुंभकुमार होजाई, रामकुई वांगदे नेउमे, अविनाश ब्रह्म…आदि को हिंदू सम्मेलनों में बुलाया। वहां विराट हिंदू शक्ति के दर्शन से उनकी सोच बदली। उनके नेतृत्व में ही फिर हजारों सेवा और शिक्षण केंद्र शुरू हुए।

यद्यपि यह सरल नहीं था। कई कार्यकर्ताओं की हत्या हुई; पर बाकी डटे रहे। इसका सुफल शीघ्र सामने आया। मिशन वाले जनजातियों की भाषा, बोली, परंपरा, पूजा-पद्धति आदि मिटाकर उन्हें अंग्रेजी भाषा, रोमन लिपि और बाइबिल थमा देते हैं, जबकि संघ उन्हें सुदृढ़ करता है। इससे प्रभावित होकर कई जगह उग्रवादियों और ईसाई नेताओं ने भी अपने बच्चों को इन विद्यालयों में डाला है। मिशन वाले चाहते थे कि जो दलित हिंदू ईसाई होकर चर्च से सुविधा ले रहे हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ भी पूर्ववत मिले। ऐसा होने से लाखों हिंदू ईसाई बन जाते; पर संघ ने यह षड्यंत्र विफल कर दिया। संघ-प्रेरित संस्थाओं के प्रयास से कई जगह चर्च या बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा कब्जाई गई जमीन खाली हुई तथा वहां मंदिर, श्मशान, मकान, बाजार आदि बने। कई जगह मुकदमे और झगड़े भी हुए। धार्मिक कार्यक्रमों से आई जागृति के चलते कई विदेशी मिशनरियों को देश छोड़ना पड़ा।

घटीं दूरियां

इधर पेट्रो डाॅलर के बल पर मुस्लिम गतिविधियां भी बढ़ रही थीं। छिटपुट कन्वर्जन तो होते ही थे; पर अब सामूहिक कन्चर्जन से भय पैदा किया गया। पहला प्रयोग 19 फरवरी,1981 को तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम् में हुआ। इससे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी चिंतित हुईं। उनके संकेत पर संघ के साथ डा. कर्णसिंह सक्रिय हुए और दिल्ली में ‘विराट हिंदू समाज’ नामक कार्यक्रम हुआ। इसके बाद तो हर राज्य और जिले में ऐसे आयोजन हुए। इनमें बड़े संतों के साथ हर जिले, नगर, वर्ग और क्षेत्र में प्रभावी संत भी आए।

इन आयोजनों से हिंदुओं की जातीय दूरियां घटीं। पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन के दौर में हुए सम्मेलनों से वहां की सांझी विरासत मजबूत हुई। इसी दौरान स्वयंसेवकों के भी महाशिविर तथा सम्मेलन हुए। इनमें बेंगलूरु, पुणे, मंगलुरू, हैदराबाद, करनाल, लखनऊ, आगरा, मेरठ, लुधियाना आदि के कार्यक्रम विशेष रहे।

शासन प्रायः मिशनरी तथा मजहब परस्त माैलवियों के देशविरोधी कामों पर ध्यान नहीं देता; पर अब कई राज्यों में कानून द्वारा कन्वर्जन, चंगाई सभा तथा मजहबी सम्मेलनों पर रोक लगी है। सेवा भारती के प्रकल्पों से भी हिंदू जागरण की गति बढ़ी है। जहां जैसी जरूरत, वैसे काम उन्होंने शुरू किए हैं। दिल्ली में मुले जाटों तथा गाड़िया लुहारों के बीच काम हो रहा है। कश्मीर से विस्थापित हिंदुओं के साथ ही वहां आतंक से पीड़ित मुस्लिम बच्चों के लिए भी छात्रावास चलाए जा रहे हैं। महिलाओं के सैकड़ों ‘स्व सहायता समूह’ संचालित हो रहे हैं। 1997 में ओडिशा के ब्रह्मबराठ में विशाल इस्लामिक सम्मेलन हुआ। क्योंकि मांस भोज से पर्यावरण को हानि होती है, अत: हिंदुओं के विरोध पर वहां शाकाहारी भोजन ही बना।

सुखद परिवर्तन

पूर्वोत्तर के चाय बागानों में काम के लिए अंग्रेज विभिन्न राज्यों से हजारों जनजातीय श्रमिकों को लाए। उनकी बस्तियों में चर्च तो बने, पर मंदिर नहीं। अतः हिंदू रीति से विवाह के बिना ही स्त्री और पुरुष एक साथ रहने लगे। कई पीढ़ियां ऐसे ही बीतने से अनेक समस्याएं पैदा हुईं। उनके बच्चों को कानूनी मान्यता नहीं मिलती थी। अतः सेवा भारती ने सामूहिक विवाह (बूढ़ा बिया) कराये। तीन-तीन पीढ़ियों के विवाह एक साथ हुए। ऐसे हजारों विवाह अब तक हो चुके हैं। देश की कई धार्मिक संस्थाएं इसमें सहयोग करती हैं।
परिवार समाज की महत्वपूर्ण इकाई है; पर बढ़ते आर्थिक दबाव तथा आधुनिकता से इसे चोट पहुंची है। ‘परिवार प्रबोधन’ कार्यक्रमों से इनमें संतुलन के प्रयास हो रहे हैं। घर में प्रतिदिन सामूहिक भोजन तथा साप्ताहिक पूजा से माहौल में सुखद परिवर्तन होते हैं। संयुक्त परिवारों का सम्मान तथा नवयुगल को कुछ दिन उनके साथ रहने जैसे प्रयोग भी किए गए हैं।

विदेश में प्रभाव

धर्म जागरण का प्रभाव विदेशों में भी है। रोजगार हेतु गए स्वयंसेवकों ने वहां भी शाखाएं खोली हैं। केन्या में ‘भारतीय स्वयंसेवक संघ’ तथा ‘हिंदू काउंसिल आफ केन्या’ ने संकट में हिंदुओं की रक्षा की। अब वहां विद्यालयों में हिंदू ग्रंथों को स्थान मिला है तथा दीपावाली की सरकारी छुट्टी होती है। 1971 में युगांडा से जब तानाशाह शासक ईदी अमीन ने एशिया वालों को निकाला, तो केन्या के हिंदुओं ने ही उन्हें सहारा दिया।

माॅरीशस में हिंदू स्वयंसेवक संघ के प्रयास से ‘गंगा तालाब’ तीर्थ बन गया है। त्रिनिदाद के मंदिरों में धार्मिक संस्कार होने लगे हैं। इससे कन्वर्जन रुका है। जुलाई, 1996 में गुयाना, सूरीनाम और जमैका में ‘केरेबियन हिंदू परिषद’ बनी। म्यांमार में एक प्रचारक द्वारा भगवान बुद्ध पर बनाई प्रदर्शिनी से सरकार प्रभावित हुई और ‘सनातन धर्म स्वयंसेवक संघ’ का गठन हुआ। मुस्लिम देश मलेेशिया में ‘हिंदू सेवई संगम’ युवा शिविर लगाता है। नेपाल में ‘मातृभूमि स्वयंसेवक संघ’ तथा इंग्लैंड और अमेरिका में ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ है। इंग्लैंड में ‘हिंदू मैराथन’ से भारत के सेवा कार्यों के लिए धन जुटाते हैं। कई देशों में संस्कृत और वैदिक गणित की कक्षाएं भी लगती हैं।

संवेदनशील होने के कारण स्वयंसेवक हर संकट में सहयोग करते हैं। अतः स्थानीय शासन भी उनका सम्मान करता है। वहां के शिविर, प्रशिक्षण वर्ग तथा हिंदू सम्मेलनों में भारत से संघ, विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्र सेविका समिति, सेवा इंटरनेशनल, फ्रैंड्स आफ इंडिया सोसायटी इंटरनेशनल आदि के कार्यकर्ता जाते हैं। मीडिया उनके साक्षात्कार प्रचारित करता है। अब तो विदेश से भी कई प्रचारक तथा पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनेे हैं। कई जगह ‘हिंदू छात्र परिषद’ भी बनी है। इंडोनेशिया, डेनमार्क, जर्मनी, कनाडा, हालैंड, फिजी आदि में भी काम है। संघ का ‘विश्व विभाग’ इनमें समन्वय करता है। हर पांचवें साल भारत में होने वाले ‘विश्व संघ शिविर’ में सैकड़ों स्वयंसेवक सपरिवार आते हैं। अभी तक विदेशों में हिंदू जाति, भाषा और राज्य के आधार पर संगठित थे; पर अब वे हिंदू के नाते भी साथ आने लगे हैं। यह संघ की बड़ी उपलब्धि है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : संघ में सेवा विभाग

आपातकाल के बाद संघ का नाम और काम बढ़ने पर सेवा कार्यों को संगठित रूप दिया गया।
तत्कालीन सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस का इस पर बहुत जोर था। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 : शक्ति स्वर में संघ-साधना

Topics: स्वावलंबनराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)जागरण से परिवर्तनकन्वर्जनआनुषांगिक संगठनविद्या भारतीपरावर्तन और घरवापसीरोजगारविश्व हिंदू परिषद (VHP)सेवा भारतीशिक्षावनवासी कल्याण आश्रमसंस्कारपाञ्चजन्य विशेष
विजय कुमार
विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ [Read more]
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