बांग्लादेश में फिर से हिंसा की तैयारी? जुलाई चार्टर को लेकर जमात ने दी सरकार को धमकी
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बांग्लादेश में फिर से हिंसा की तैयारी? जुलाई चार्टर को लेकर जमात ने दी सरकार को धमकी

सरकार के सामने अब जिहादी ताकतों का एक और दांव आया है। अब उनका कहना है कि अगर सरकार ने जुलाई चार्टर लागू नहीं किया तो वह एक बार फिर से सड़कों पर होंगे और सरकार को उनके विरोध का सामना करना होगा।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jun 18, 2026, 08:02 pm IST
in विश्व
बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़की थी (फाइल फोटो)

बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़की थी (फाइल फोटो)

बांग्लादेश सरकार जहां हिंदू और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर जिहादी ताकतों के सामने झुकती दिखाई दे रही है तो वहीं जिहादी ताकतें इसके बाद भी सरकार को बख्शने के मूड में नहीं दिख रही हैं। हिंदुओं के आराध्य प्रभु श्रीराम की प्रतिमा का निर्माण रोके जाने के बाद भी उन पर हमले जारी हैं।

मगर सरकार के सामने अब जिहादी ताकतों का एक और दांव आया है। अब उनका कहना है कि अगर सरकार ने जुलाई चार्टर लागू नहीं किया तो वह एक बार फिर से सड़कों पर होंगे और सरकार को उनके विरोध का सामना करना होगा।

क्या है जुलाई चार्टर?

जुलाई चार्टर क्या है और क्यों जमात इसे लागू करने के लिए बेचैन है? वह भी वह जमात, जिसे लोकतान्त्रिक तरीके से जनता ने सिरे से नकार कर विपक्ष मे बैठाया है। फिर भी वह सत्ताधारी बीएनपी को चुनौती दे रही है? यह भी प्रश्न उठता है कि आखिर वे कौन सी ताकतें हैं, जो जमात को इस सीमा तक ताकत और साहस दे रही हैं?

जुलाई चार्टर दरअसल बांग्लादेश मे बना हुआ वह दस्तावेज है, जिसे 2024 की कथित छात्र क्रांति के बाद राजनीतिक सुधार दस्तावेज के रूप मे बनाया गया था और उसमें नई तरह का देश की व्यवस्था का ढांचा था। उसमें शासन, न्यायिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार सहित कई विषयों पर सुधारात्मक प्रस्ताव थे।

यह कहा जा रहा था कि संविधान के स्थान पर जुलाई चार्टर को ही लागू किया जाए। परंतु यह संविधान का प्रतिस्थापन न होकर एक राजनीतिक सुधार आंदोलन या कदम है। इसे मोहम्मद यूनुस की सरकार ने बनाया था। परंतु इसकी वैधता पर संवैधानिक संस्थाओं ने प्रश्न उठाए थे। क्योंकि इस चार्टर का मसौदा किसी चुनी हुई सरकार ने नहीं बनाया था, बल्कि यह चार्टर उन लोगों ने बनाया था, जिनका चयन जनता ने नहीं किया था, बल्कि सेना ने शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद उन्हें गद्दी पर बैठाया था।

इस चार्टर के निर्माण में कथित छात्र नेता भी शामिल थे, जिनकी पार्टी को भी जनता ने फरवरी में हुए चुनावों में जनता ने पूरी तरह से नकार दिया है।

हालांकि इस चार्टर को लेकर कहा जाता है कि इसे फरवरी में जनमत संग्रह में जनता का भारी समर्थन मिला था। जमात का यह मानना है कि बीएनपी को इस जनादेश का समर्थन करना चाहिए और वह अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए इस कथित जनमत संग्रह का लाभ उठाना चाहती है।

इस कथित सुधार पैकेज पर बीएनपी और जमात सहित अन्य सियासी पार्टियों ने अक्टूबर 2025 में हस्ताक्षर किए थे। और बाद में इसपर जनमत संग्रह कराया गया था। और इसमें 68% जनता ने इसका समर्थन किया था।

इसमें प्रधानमंत्री के लिए नियत अवधि तक तमाम कथित सुधार हैं, जिन्हें जमात लागू करवाना चाहती है। अब जमात ए इस्लामी के मुखिया शफ़ीकुर रहमान ने सरकार को खुलेआम चेतावनी दे दी है कि अगर यह सुधार लागू नहीं हुए तो वह सड़कों पर उतरेगी।

16 जून को जातीय संसद के LD हॉल में पत्रकारों के साथ विचारों के आदान-प्रदान की बैठक में बोलते हुए रहमान ने कहा, “हम जनता के फ़ैसले को लागू करने से पीछे नहीं हटेंगे। अगर संसद में कोई समाधान निकल भी आता है, तो भी सड़कों पर आंदोलन जारी रहेगा। हम सरकार को जनता के जनादेश को लागू करने के लिए मजबूर करेंगे।” उन्होंने आगे चेतावनी दी, “यह मांग पूरी होकर रहेगी, आज नहीं तो कल।”

विदेश में भी समर्थन का प्रयास कर रही है जमात

जमात इस विषय पर देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी समर्थन लेने का प्रयास कर रही है। उसके नेता की देशों के राजनायिकों के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं। फिर चाहे अमेरिका हो, डेनमार्क हो या फिर सिंगापुर। पार्टी इस बात को प्रमुखता से उठा रही है कि ये सुधार देश की जनता की आवाज है और सरकार इसे दबाने की कोशिश कर रही है।

बीएनपी का रुख भी इस चार्टर को लेकर जटिल और विरोधाभासी है। जुलाई चार्टर को लागू करने के लिए पहले बीएनपी ने हामी भरी थी। और इसका समर्थन किया था। जुलाई चार्टर को लागू करने के लिए मोहम्मद यूनुस की सरकार ने Constitutional Reform Council का प्रस्ताव रखा था। जिसमें निर्वाचित नेता शामिल होंगे जो संवैधानिक सुधार करने वालों के रूप में भी कार्य करेंगे। और इस काउंसिल में शामिल होने के लिए सांसदों को जुलाई चार्टर लागू करने के लिए एक अतिरिक्त शपथ लेनी होगी।

जमात का आरोप है कि बीएनपी ने इन सबके समर्थन में हस्ताक्षर तो किए थे, मगर सरकार में आने के बाद वह बदल गई है। और अब वह मुकर रही है। बीएनपी के सांसदों ने चार्टर का तो समर्थन किया था, मगर इस अतिरिक्त शपथ लेने से इनकार कर दिया था। उन्होनें यह तर्क दिया था कि वे पहले से ही संविधान की शपथ लेकर सांसद बन चुके हैं तो अतिरिक्त शपथ संवैधानिक रूप से उचित नहीं है।

इधर जमात इसे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। जुलाई चार्टर को लेकर इस तरह का उसका आक्रामक रुख कहीं न कहीं इस बात का संकेत है कि वह अपने कट्टर एजेंडे को लागू करने के लिए हर राजनीतिक अवसर का प्रयोग कर सकती है।

 

Topics: बांग्लादेश में हिंदूबांग्लादेश सरकारहिंदुओं का दमनबांग्लादेश जमात
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