भारत को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिल गई थी, लेकिन गोवा तब भी विदेशी शासन में था। लगभग 450 वर्षों तक गोवा पर पुर्तगालियों का शासन रहा। पुर्तगालियों का इतने लंबे समय तक शासन करने के बाद भी गोवा के लोगों के मन से स्वतंत्रता की इच्छा कभी खत्म नहीं हुई। इस आजादी की लड़ाई में कई ऐसे वीर सेनानी थे, जिनका योगदान बहुत बड़ा था, लेकिन उन्हें वह पहचान नहीं मिल सकी जिसके वे हकदार थे। मोहन रानाडे जी ऐसे ही एक साहसी और समर्पित योद्धा थे।
मोहन रानाडे जी का गोवा मुक्ति आंदोलन में योगदान
मोहन रानाडे जी का जन्म 1929 में महाराष्ट्र के सांगली जिले में हुआ था। वे पेशे से वकील थे, लेकिन देशभक्ति उनके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य थी। वे बचपन से ही राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित थे। खासतौर पर सावरकर भाइयों के विचारों ने उनके सोचने और काम करने के तरीके को दिशा दी। उनके लिए देश की सेवा केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में विश्वास रखने की बात थी। इसी सोच के कारण मोहन रानाडे जी गोवा मुक्ति आंदोलन से जुड़ गए। वे ‘आजाद गोमंतक दल’ नामक संगठन का हिस्सा बने, जो पुर्तगाली शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में विश्वास करता था। 1950 के दशक की शुरुआत में वे मराठी शिक्षक के रूप में गोवा गए। यह उनका छद्म रूप था। असल में वे गोपनीय रूप से आंदोलन की गतिविधियों में भाग ले रहे थे और स्थानीय युवाओं को आजादी की लड़ाई के लिए तैयार कर रहे थे।
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आंदोलन की नई दिशा
उस समय यह साफ हो गया था कि गोवा में अहिंसक आंदोलन सफल नहीं हो रहे थे। पुर्तगाली शासन पर सत्याग्रह का कोई असर नहीं पड़ रहा था। इसलिए कई क्रांतिकारियों ने हथियार उठाने का रास्ता चुना। मोहन रानाडे जी भी इसी विचार के समर्थक थे। उन्होंने पुर्तगाली पुलिस चौकियों पर हुए कई हमलों में भाग लिया। 28 जुलाई 1954 को दादरा और नगर हवेली पर हुए हमले के बाद 2 अगस्त 1954 को यह क्षेत्र पुर्तगालियों से मुक्त हो गया। इससे आंदोलन को नई ताकत मिली। लोगों का विश्वास बढ़ा कि गोवा को भी आजादी दिलाई जा सकती है।
गोवा मुक्ति के संघर्ष में मोहन रानाडे का अदम्य साहस
1955 में बनस्तारीम पुलिस स्टेशन पर हमले के दौरान मोहन रानाडे जी गिरफ्तार हो गए। उन्हें 26 साल की कठोर जेल की सजा दी गई, जिसमें 6 साल एकांतवास भी शामिल था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। देशभर में उनकी रिहाई के लिए आवाज उठी और अंततः 25 जनवरी 1969 को वे जेल से बाहर आए। आपको बता दें कि 19 दिसंबर 1961 को भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ के जरिए गोवा को आजाद कराया। इस आजादी की नींव मोहन रानाडे जैसे वीर सेनानियों के त्याग और बलिदान पर टिकी थी।














