एक मशहूर गजल है – “निकलो न बेनकाब तुम, जमाना खराब है!” ऐसे ही न जाने जमाने की गलत नीयत पर सवाल उठाती हुए कितनी गजलें और शायरी हैं। इममें नकाब, पर्दा और हिजाब की तारीफ़ों के कसीदे पढे गए। नकाब को नजाकत का दूसरा नाम बता दिया गया, मगर नकाब कब नहीं पहनना चाहिए, यह नहीं बताया गया।
किसी व्यक्ति का चेहरा पूरी तरह से ढका हो तो वह कौन है और क्या वह वही व्यक्ति है, जिसका दावा किया जा रहा है, पता नहीं चल सकता है। जो नकाब नजाकत या शराफत का दूसरा नाम माना जाता है, क्या उसकी आड़ में गलत काम तो नहीं हो रहा है। यह भी संदेह रहता है, क्योंकि घटनाएं कुछ ऐसी हो चुकी हैं, जो इस डर को पैदा करती हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री सचिवालय ‘संवाद’ में आयोजित कार्यक्रम के दौरान आयुष चिकित्सकों को नियुक्ति पत्र वितरित करते समय एक महिला के हिजाब को हटाते हुए यह कह दिया कि “यह क्या है?” इसके बाद इस पर हंगामा मचा हुआ है।
नकाब की जगह घूंघट होता तो
जाहिर है कि नकाब क्यों हटाया? नकाब कैसे हट सकता है? नकाब हटाने का काम तो तहजीब पर हमला है? नकाब हटाना तो पहचान पर हमला है, अब यदि इसकी जगह घूँघट होता तो वह पिछड़ेपन का प्रतीक होता तो उसे हटाया जा सकता था। जैसे घूँघट हटाना सबसे बड़ा सामाजिक सुधार हो, क्योंकि लड़की का दम घुटता है उसमें, मगर नकाब में तो लड़की को शायद बहुत अच्छी सांस आती है, इसलिए नकाब हटाने की बात कोई नहीं करता।
जब चेहरा पहचान हो तब
वैसे इसे व्यक्तिगत पसंद कहा जाता है, परंतु व्यक्तिगत पसंद केवल तभी तक व्यक्तिगत है, जब सार्वजनिक जीवन को प्रभावित न कर रही हो। यदि महिला किसी सार्वजनिक पद पर है, जहां पर उसका चेहरा उसकी पहचान होना चाहिए, उस समय किसी भी प्रकार से उसका चेहरा छिपा हुआ होना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे उस पद या प्रोफेशन की निजता भी भंग होती है। यदि कोई डॉक्टर है और वह नकाब में है तो यह कैसे पता चलेगा कि नकाब के पीछे वही व्यक्ति है? या फिर उसकी कोई और पहचान है? इसके लिए वर्ष 2023 की एक घटना का उल्लेख आवश्यक होगा।
बुर्का पहनकर अस्पतालों में घूमता था जावेद
यह घटना है नागपुर के इंदिरा गांधी मेडिकल अस्पताल की, जहां पर एक बुर्कानशी, जोकि डॉक्टर का सफेद ऐप्रन पहनती थी, उसे सुरक्षाकर्मियों ने कुछ संदेह होने पर पकड़ा। इसके बाद पता चला कि वह दरअसल समलैंगिक जावेद है, जो केवल पुरुषों से दोस्ती करने के लिए आता था।
तमिलनाडु में वेल्लोर में घर में लूट के लिए बुर्के का सहारा : तमिलनाडु में 26 मई 2023 को ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला सामने आया था, जिसमें अपराधियों ने एक बड़ी लूटपाट की और वे बुर्का पहनकर घर में घुसे थे।
बुर्कानशीं महिलाओं द्वारा लूटपाट
ये तो पुरुषों द्वारा बुर्का पहनकर किये गए अपराध हैं। मगर ये समाचार आम हैं, जिनमें बुर्कानशीं महिलाएं लूटपाट करती हुई दिखाई देती हैं। 13 सितंबर 2025 को ही यह समाचार सुर्खियां बना था कि गोरखपुर की एक गहनों की दुकान से बुर्के में ग्राहक बनीं महिलाओं ने गहने चुराने की कोशिश की, मगर वे सीसीटीवी में कैद हो गईं थीं और फिर पुलिस ने उनसे सोने की एक अंगूठी और दो जोड़ी बिछिया बरामद की थी।
क्या नकाब का हो रहा दुरुपयोग?
हाल ही में आगरा से भी ऐसा ही मामला सामने आया था, जिसमें दो बुर्कापोश औरतों ने साड़ियां चुराई थीं। इस तरह के कई मामले सामने आते हैं, तो क्या ऐसे में यह प्रश्न नहीं उठना चाहिए कि क्या वाकई में नकाब का कोई दुरुपयोग तो नहीं कर रहा है? जमाने को खराब बताने वाले लोग नकाब के दुरुपयोग पर बात नहीं करते, जबकि लंदन में वर्ष 2005 में उसके ट्रांसपोर्ट सिस्टम अर्थात मेट्रो और बस पर फिदायीन हमले का प्रयास किया गया था। इस असफल हमले के अपराधी यासीन हसन उमर ने पुलिस से बचने के लिए बुर्के का प्रयोग किया था।
पुलिस से बचने के लिए बुर्के का प्रयोग
वर्ष 2013 में ब्रिटेन में मोहम्मद अहमद, जो कि एक संदिग्ध आतंकी था और जिसे ‘टेररिज्म प्रिवेंशन एंड इन्वेस्टिगेशन मेजर्स’ (TPIM) के तहत निगरानी में रखा गया था। उसने भी पुलिस की पकड़ से भागने के लिए बुर्के का प्रयोग किया था। वह लंदन की एक मस्जिद में घुसा और वहां से बुर्का पहनकर बाहर निकला ताकि निगरानी कर रही पुलिस को चकमा दे सके। वह बुर्के के अंदर अपनी ‘इलेक्ट्रॉनिक टैग’ (जो उसकी लोकेशन बताती थी) को भी छिपाने या काटने में सफल रहा और गायब हो गया। वर्ष 2015 में मध्य अफ्रीकी देश चाड की राजधानी में बोको हरम के आतंकियों ने दोहरा हमला किया था और हमलावर पुरुषों ने महिलाओं का भेष धरने के लिए बुर्का पहना था। इसके बाद ही वहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इसे “छलावरण” मानते हुए प्रतिबंधित कर दिया था।
शोपियां का हमला, आतंकी ने पहन रखा था बुर्का
कश्मीर में भी कई आतंकी बुर्के का इस्तेमाल करते हुए सुरक्षाबलों पर हमला करते हुए पाए गए। वर्ष 2018 का शोपियां का हमला, जिसमें आतंकी बुर्का पहनकर पुलिस स्टेशन में घुसे और एक पुलिसकर्मी की हत्या कर उसकी राइफल छीन ली। इसके साथ ही वर्ष 2018 में लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी श्रीनगर के एक अस्पताल से भागने में सफल रहा था क्योंकि उसके साथियों ने उसे बुर्का पहनाकर महिलाओं के बीच छिपा लिया था।
राजस्थान का घूंघट का मामला
नीतीश के अलावा अशोक गहलोत का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें वह एक महिला का घूंघट हटाते नजर आ रहे हैं। उस समय कहा गया था कि इससे ग्रामीण महिलाओं में रूढ़िवादी परंपरा खत्म होगी। अशोक गहलोत के सलाहकार संयम लोढ़ा ने घूंघट को महिलाओं पर थोपा गया सामाजिक बोझ करार दिया था। उन्होंने यहां तक घोषणा कर दी थी कि घूंघट मुक्त पंचायत को 25 लाख रुपये दिए जाएंगे।
बुर्के पर समाज में विमर्श शुरू
बुर्के के पक्ष और विपक्ष में समाज के अंदर विमर्श शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर भी लोग चर्चा कर रहे हैं। अब देखना यह है कि इसको लेकर मुस्लिम महिलाएं क्या कहती हैं।

















