उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से रिश्तों को कलंकित करने वाली घटना सामने आई है। यहां एक 26 साल की मुस्लिम महिला के साथ उसी के ससुर ने गन पॉइंट पर जबरन शारीरिक संबंध बनाए। जब पीड़िता ने हिम्मत करके अपने पति को आपबीती सुनाई तो पति ने उसका साथ देने के बजाय फोन पर ही तीन बार तलाक बोल दिया।
क्या है पूरी वारदात की क्रोनोलॉजी?
26 वर्ष की पीड़िता की चार वर्ष पहले शादी हुई थी। उसका पति मुंबई में प्राइवेट नौकरी करता है और 6-7 महीने में एक बार घर आता है। महिला बहराइच में सास-ससुर और जेठ के साथ रहती थी। FIR के मुताबिक, 8 जून की रात ससुर अच्छन खान शराब के नशे में कमरे में घुसा और तमंचा दिखाकर रेप किया। आरोप है कि जेठ रेहान खान इस दौरान दरवाजे पर पहरा देता रहा और बाद में उसने भी जबरदस्ती की। 9 जून की सुबह महिला ने अपनी सास को इस बारे में बताया। उसकी सास ने उसे चुप रहने और “घर की इज्जत” का हवाला देकर धमकाया। 10 जून को जब उसने मुंबई में पति को फोन पर पूरी बात बताई, तब पति ने कहा, तूने मेरे बाप-भाई पर इल्जाम लगाया है। तेरा-मेरा रिश्ता खत्म, अब तू मेरे घर से निकल जा। उसने “तलाक, तलाक, तलाक” बोलकर रिश्ता खत्म कर दिया।
11 जून को महिला किसी तरह मायके पहुंची और 12 जून को बहराइच महिला थाने में केस दर्ज कराया गया। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64, 351 और मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत केस दर्ज किया है। बता दें कि 2019 से भारत में तीन तलाक गैर-कानूनी है और इसके लिए 3 साल तक की जेल का प्रावधान है। फिलहाल तीनों आरोपी फरार हैं, पुलिस उनकी तलाश कर रही है।
सवालों के केंद्र में मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान
बहराइच मामला सामने आने के बाद, मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े सवाल एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में हैं। हालांकि देश में 2019 से तीन तलाक को अपराध घोषित करने वाला कानून लागू हो चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई महिलाओं का दावा है कि एकतरफा तलाक, सामाजिक बहिष्कार और पारिवारिक उत्पीड़न की घटनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। कानून बनने के बाद तीन तलाक के मामलों में कमी आने की सरकारी रिपोर्टें सामने आई हैं, हालांकि महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस समस्या का महज स्वरूप बदला है, समस्या खत्म नहीं हुई है।
क्या ये सिर्फ बहराइच की कहानी है ?
यह ताजा मामला बहराइच का है लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों से भी समय-समय पर ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं, जहां महिलाओं ने आरोप लगाया कि उन्हें कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना छोड़ दिया गया। उन्हें परिवार या समुदाय के दबाव का सामना करना पड़ा या फिर विवाह संबंधी विवादों में उनका पक्ष ही नहीं सुना गया।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई मामलों में पीड़ित महिलाएं आर्थिक रूप से पति या परिवार पर निर्भर होती हैं। इसलिए वे सामाजिक बदनामी, बच्चों के भविष्य और आर्थिक असुरक्षा के डर से शिकायत दर्ज कराने से भी बचती हैं। इतना ही नहीं अगर एक बार तीन तलाक दिए जाने के बाद मुस्लिम महिला का पति से समझौता हो जाए या वह फिर से उसके साथ रहना चाहे, तब भी उसे एक नई त्रासदी का सामना करना पड़ता है। उसे किसी दूसरे पुरुष के साथ हलाला की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
बता दें कि हलाला से जुड़ी शिकायतों ने भी समय-समय पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस पैदा की है। कई महिलाओं ने अदालतों और महिला संगठनों के समक्ष आरोप लगाए कि धार्मिक प्रथाओं की आड़ में उनका मानसिक और शारीरिक शोषण हुआ। वहीं अनेक इस्लामी विद्वानों ने भी स्पष्ट किया है कि किसी भी प्रकार का जबरन या शोषणकारी व्यवहार धार्मिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
इसी प्रकार महिला जननांग विकृति (FGM/खतना) के मुद्दे पर भी महिला अधिकार समूह लगातार आवाज उठाते रहे हैं। उनका तर्क है कि महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा सर्वोपरि होनी चाहिए और किसी भी परंपरा का मूल्यांकन मानवाधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर होना चाहिए। इन सभी घटनाओं का समेकित संदेश यही है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। जब तक महिलाओं को शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता, कानूनी सहायता और सामाजिक समर्थन नहीं मिलेगा, तब तक उनके अधिकार कागजों से निकलकर वास्तविक जीवन में पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाएंगे।

















