भारत-रूस संबंध : रिश्तों की राह सहयोग की दिशा
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भारत-रूस संबंध : रिश्तों की राह सहयोग की दिशा

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत और रूस की रणनीतिक साझेदारी मजबूत हुई है। ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और महत्वपूर्ण खनिजों में सहयोग बढ़ाकर 2030 तक 100 अरब डॉलर का लक्ष्य रखा गया है। द्विपक्षीय मुद्रा व्यापार, मुक्त व्यापार समझौते और परमाणु परियोजनाएं नई विश्व व्यवस्था में संतुलन बनाने के साथ अमेरिकी थानेदारी को चुनौती देती हैं

Written byसुमित मेहतासुमित मेहता
Dec 16, 2025, 05:53 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
प्रगाढ़ संबंध : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

प्रगाढ़ संबंध : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

रूस-यूक्रेन युद्ध उम्मीद से अधिक लंबा खिंचता जा रहा है और वैश्विक राजनीति व आर्थिक मामले में रूस अलग-थलग पड़ता जा रहा है। ऐसी स्थिति में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का नई दिल्ली का हाल का दौरा बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में ‘विशेष और विशेषाधिकारिक रणनीतिक साझेदारी’ के अंतर्गत 16 द्विपक्षीय समझौते हुए, जो रक्षा, ऊर्जा, व्यापार सहित अन्य उभरते क्षेत्रों से जुड़े हैं। इन समझौतों का लक्ष्य वित्त वर्ष 2024-25 में 65 अरब अमेरिकी डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाकर 2030 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाना है। यह लगभग 9 प्रतिशत की मध्यम विकास दर (सीएजीआर) दर्शाता है।

रूस पर पश्चिमी देशों के बढ़ते और कड़े होते प्रतिबंधों के बीच भारत से समझौते स्थिरता, विविधता और डी-डॉलराइजेशन से बाहर निकलने पर जोर देते हैं। यह भारत और रूस को ट्रांसअटलांटिक प्रभुत्व वाली विश्व व्यवस्था के मुकाबले एक संतुलन बनाए रखने वाली महत्वपूर्ण शक्ति बनाता है। यानी भारत और रूस विश्व व्यवस्था में संतुलन बनाने वाले महत्वपूर्ण देश बन गए हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अगले 10 वर्ष में इन दोनों यूरेशियाई देशों के बीच सीधा आर्थिक लेन-देन लगभग 1.5 खरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है, जो आगामी 20 वर्ष में 3 से 4 खरब डॉलर तक हो सकता है।

आर्थिक एवं भू-रणनीतिक साझेदारी

भारत-रूस संबंधों की शुरुआत 1971 की भारत-सोवियत संधि से हुई थी। तब से यह रिश्ता विनिमय के सरल लेन-देन से बढ़कर एक मजबूत और जीवंत आर्थिक और भू-रणनीतिक साझेदारी बनता गया है, खासकर 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद। रूस के वैश्विक अलगाव के कारण भारत उसकी ऊर्जा निर्यात के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार बन गया है। भारत रोजाना 1.5 मिलियन बैरल से अधिक कच्चा तेल रूस से आयात करता है, जो रूस के समुद्री तेल व्यापार का लगभग 40 प्रतिशत है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस से भारत के ऊर्जा (मुख्यतः कच्चा तेल, कोयला, गैस) आयात में भारी वृद्धि हुई है, जिससे रूस के पक्ष में व्यापार घाटा 9 के मुकाबले 1 के असंतुलन तक पहुंच गया है, जहां भारत का आयात रूस से बहुत अधिक है, जबकि निर्यात कम। इससे रूस को भारी लाभ हुआ और भारत की ऊर्जा सुरक्षा बढ़ी, लेकिन व्यापार असंतुलन भी बढ़ा है। इस व्यापार में लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा ऊर्जा आयात का है, जबकि शेष मुख्य रूव से रक्षा उपकरणों का है। भारत ने शीत युद्धकाल से ही अमेरिकी हार्डवेयर के बजाय रूसी रक्षा उपकरणों को प्राथमिकता दी है।

भारत-रूस शिखर सम्मेलन में भारत और रूस के लिए 10 महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिनमें ऊर्जा, परिवहन, कृषि, दवाइयां, सूचना प्रौद्योगिकी, नाभिकीय ऊर्जा, अंतरिक्ष, वित्त और आवश्यक खनिज शामिल हैं। इन समझौतों का उद्देश्य कर में कटौती, लॉजिस्टिक्स में सुधार और रुपये-रूबल में भुगतान को बढ़ावा देना है। यह कदम भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट स्ट्रैटजी’ से भी मेल खाता है, जिससे क्वाड जैसे गठबंधन पर दबाव डाले बिना भारत अपने आवश्यक संसाधनों को सुरक्षित कर सके। साथ ही, ये समझौते रूस को पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ मजबूत आर्थिक सहारा प्रदान करते हुए भारत के रणनीतिक और विश्वसनीय साथी के रूप में उसकी भूमिका को और सुदृढ़ करेंगे।

निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति का भरोसा

ऊर्जा समझौता भारत-रूस आर्थिक संबंधों का केंद्र बिंदु है। इस क्षेत्र में राष्ट्रपति पुतिन ने ‘शैडो फ्लीट’ पर अमेरिकी ‘सेकेंडरी’ प्रतिबंध के बावजूद भारत को कच्चे तेल, एलएनजी और कोयले की निर्बाध आपूर्ति का भरोसा दिया है। रूसी यूराल्स क्रूड भारत को ब्रेंट से 10-15 डॉलर प्रति बैरल कम कीमत पर मिलता है, जिससे भारत सालाना 5-7 अरब डॉलर की बचत करता है।

अनुमान है कि अगले 10-20 वर्ष में भारत छूट पर मिलने वाले रूसी यूराल्स क्रूड के कारण क्रमश: 60 अरब डॉलर और 120 अरब डॉलर बचा सकता है। इससे भारत को अपनी लगभग 5.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन की आयात जरूरतों के लिए मजबूत सुरक्षा बफर बनाने में भी मदद मिलेगी, क्योंकि रूस से आयात जरूरतों का लगभग 20-25 प्रतिशत हिस्सा पूरा हो जाएगा। इससे भारत को अपने पहले से ही सीमित और महत्वपूर्ण वित्तीय संसाधनों को बुनियादी ढांचे और अन्य बजटीय आवश्यकताओं के लिए सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।

जीवाश्म ईंधन के अलावा, दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग ने कुडनकुलम की 12 गीगावाट विस्तार योजना को पुनर्जीवित किया है। इसमें रूस 2035 तक लगभग 25 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश करेगा। इससे सालाना लगभग 50-60 टेरावाट घंटे स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन होगा, जिससे भारत को यूरेनियम आपूर्ति के लिए अन्य आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता से होने वाले वाले जोखिमों से बचने में मदद मिलेगी। रूस के आर्कटिक भंडारों से लिथियम, रेयर अर्थ और ग्रेफाइट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के समझौते भारत की पूरी आयात निर्भरता को समाप्त करेंगे। यह समझौता भारत के 10 अरब अमेरिकी डॉलर के इलेक्ट्रिक वाहन उत्पादन-प्रोत्साहन योजना (पीएलआई) के तहत 5 अरब डॉलर के ऑफटेक को भी संभव बनाएगा।

भारतीय कामगारों के लिए अवसर

2017 में शुरू हुए यूरेशियाई आर्थिक संघ (ईएईयू) के साथ मुक्त व्यापार समझौते को आगे बढ़ाते हुए इस भारत-रूस शिखर सम्मेलन में 2028 तक 90 प्रतिशत वस्तुओं पर शून्य टैरिफ शर्तों को अंतिम रूप दिया गया। इससे भारतीय फार्मा और वस्त्र उद्योग के लिए तीन करोड़ उपभोक्ताओं का बाजार खुल जाएगा, जिससे सालाना 15-20 अरब डॉलर के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। यूरेशियाई आर्थिक संघ में रूस, बेलारूस, कजाकिस्तान, आर्मेनिया और किर्गिस्तान शामिल हैं। इस महत्वपूर्ण श्रम समझौते के तहत भारत 2030 तक सूचना प्रौद्योगिकी, निर्माण और नर्सिंग क्षेत्रों में रूस को लगभग 5 लाख भारतीय कामगार उपलब्ध कराएगा। इससे 20 लाख कामगारों की कमी से जूझ रहे रूस के लिए जहां काफी हद तक कामगारों की कमी पूरी हो सकेगी, वहीं भारत को अपने रोजगार सृजन के लक्ष्य को पूरा करने और अपनी जनसांख्यिकीय बढ़त का लाभ उठाने का अवसर मिलेगा।

इस कुशल, अर्ध-कुशल और अकुशल श्रम शक्ति की आपूर्ति से सालाना लगभग 4 अरब डॉलर की कमाई होने का अनुमान है। यह खाड़ी देशों के विदेशी मुद्रा कमाने वाले मॉडल की तरह है, लेकिन इससे अमेरिकी डॉलर के बजाय रूसी रूबल में कमाई होगी। इससे भारत को अमेरिकी निगरानी से बाहर रहकर विदेशी मुद्रा कमाने में भी मदद मिलेगी और रूस से जीवाश्म व परमाणु ईंधन तथा अन्य आयातों का भुगतान आंशिक रूप से रूबल में किया जा सकेगा। यह भुगतान मॉडल काफी हद तक यूएई के साथ हमारे ‘मुद्रा स्वैप’ समझौते जैसा ही है।

वैकल्पिक भुगतान प्रणाली

भारत-रूस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों देश अपनी राष्ट्रीय मुद्रा, यानी रुपये और रूबल में द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए प्रणाली विकसित करने और इसे बेहतर बनाने पर सहमत हुए हैं, ताकि स्विफ्ट प्रणाली और अमेरिकी हस्तक्षेप के प्रभाव के बिना व्यापार निर्बाध चलता रहे और लेन-देन आसानी से हो सके। फिलहाल, दोनों देशों के बीच 96 प्रतिशत द्विपक्षीय व्यापार लेन-देन इन राष्ट्रीय मुद्राओं में ही होते हैं। इस लेन-देन में राष्ट्रीय भुगतान प्रणाली, वित्तीय संदेश प्रणाली और केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्रा प्लेटफॉर्म का आपसी संपर्क शामिल होगा। इसका मतलब है भारत की यूपीआई प्रणाली को रूस की एसपीएफएस प्रणाली से जोड़ा जाएगा। पुराने रुपये-रूबल व्यापार समझौते को फिर से शुरू किया जाएगा, जिसमें रूस भारतीय रुपये रख सकता है और भारतीय आयातक सीधे रूस के बैंकों, जैसे-स्बेरबैंक को भुगतान कर सकते हैं। इसे डी-डॉलराइजेशन की दिशा में एक कदम माना जा रहा है। इसमें भारतीय बैंक भूमिका निभाएंगे। मॉस्को स्थित एसबीआई और केनरा बैंक के संयुक्त उद्यम, जिसका नाम कमर्शियल इंडो बैंक एलएलसी (सीआईबीएल) है, रूस के उन बैंकों से जुड़ा रहेगा जो स्विफ्ट प्रणाली से प्रभावित हुए हैं।

इस तरह भारत अपने ‘पेमेंट सेटलमेंट सिस्टम’, जैसे यूपीआई और रु-पे को रूस की एसपीएफएस और मिर (एमआईआर) प्रणाली के साथ जोड़ सकेगा। यह डी-डॉलराइजेशन और भारत-रूस के बैंकिंग तथा भुगतान प्रणाली के गहरे एकीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। इस एकीकरण की सफलता से अधिक से अधिक देश अमेरिकी डॉलर में होने वाले व्यापार और स्विफ्ट (एसडब्ल्यू आईएफटी) द्वारा तय भुगतान पर निर्भरता कम करने के लिए अपनी भुगतान प्रणाली बनाने और उन्हें जोड़ने पर मिलकर काम करेंगे। यह सफलता भारत को यूपीआई और रू-पे प्रणाली को विश्व स्तर पर बढ़ावा देने में भी मदद कर सकती है, जिससे दूसरे देश भी इनका इस्तेमाल कर सकें।

वैश्विक स्तर पर भारत-रूस साझेदारी अमेरिका की एकध्रुवीयता को चुनौती देती है। भारत ‘ओपेक’ देशों की राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा बाजारों में कीमतों में उतार-चढ़ाव और अमेरिका के टैरिफ नीति में अनिश्चितता के बीच उसके साथ व्यापार पर निर्भरता को संतुलित करते हुए अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर रहा है।

संक्षेप में, पुतिन की यह यात्रा भारत-रूस को एक मजबूत, पारस्परिक और मूल्य आधारित बहुध्रुवीय गठबंधन के रूप में स्थापित करती है, जो अमेरिकी प्रभुत्व की एकध्रुवीयता को चुनौती देता है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा सुझाए गए 100 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य को जल्दी हासिल कर लेना यूरेशियाई पुनर्जागरण की शुरुआत हो सकती है, जहां व्यावहारिकता कई जटिल संकटों से निपटने की राह दिखाती है। आगामी 20 वर्ष के परिप्रेक्ष्य में 3-4 खरब अमेरिकी डॉलर की इस आर्थिक गतिविधि से पता चलता है कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की भू-आर्थिक व भू-रणनीतिक कूटनीति किस तरह काम कर रही है, जो शीत युद्ध काल के ऐतिहासिक संबंधों को भविष्य की आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी के साथ मिलाकर नई विश्व व्यवस्था में स्थायी प्रभाव पैदा कर रही है।

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