गोवा मुक्ति आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक अध्याय है। जब 1947 में भारत आजाद हो गया, तब भी गोवा पर पुर्तगालियों का शासन बना रहा। गोवा में रहने वाले भारतीयों को बोलने की आजादी नहीं थी, उन पर अत्याचार किए जाते थे और उनकी भारतीय पहचान को दबाने की कोशिश की जाती थी। इस अन्याय के खिलाफ देशभक्तों ने संघर्ष शुरू किया, जिसे गोवा मुक्ति आंदोलन कहा गया।
गोवा सत्याग्रह की शुरुआत
इस आंदोलन की एक बड़ी शुरुआत 13 जून 1955 को हुई। उस दिन कर्नाटक से भारतीय जनसंघ के नेता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक जगन्नाथ राव जोशी ने गोवा सत्याग्रह की शुरुआत की। उनके साथ लगभग 3000 सत्याग्रही गोवा की ओर बढ़े। इस दल में बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं। सभी सत्याग्रही निहत्थे थे और शांति के साथ अपने अधिकारों की मांग कर रहे थे। लेकिन जब वे गोवा की सीमा पर पहुँचे, तो पुर्तगाली सैनिकों ने उन पर लाठीचार्ज किया और गोलियां चला दीं। यह व्यवहार बहुत ही क्रूर और अमानवीय था।
15 अगस्त 1955 की गोलीबारी और गोवा मुक्ति आंदोलन में वीरांगनाओं का बलिदान
इसके बाद 15 अगस्त 1955 को एक और दुखद घटना हुई। जब पूरा भारत स्वतंत्रता दिवस मना रहा था, उसी दिन गोवा की सीमा पर करीब 5000 से अधिक सत्याग्रही “पुर्तगाली गोवा छोड़ो” के नारे लगाते हुए आगे बढ़े। पुर्तगाली सेना ने बिना किसी चेतावनी के उन पर गोलियां चला दीं। इस गोलीबारी में लगभग 51 सत्याग्रही शहीद हो गए और 300 से ज्यादा लोग घायल हुए। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। गोवा मुक्ति आंदोलन में महिलाओं का योगदान भी बहुत साहसिक रहा। सुभद्राबाई नाम की 40 वर्ष की एक महिला ने अद्भुत वीरता दिखाई। जब एक पुरुष सत्याग्रही घायल हो गया, तो उन्होंने उसके हाथ से झंडा लिया और आगे बढ़ीं। इसी दौरान उन्हें गोली लगी और वह बलिदान हो गईं। उनका बलिदान आज भी लोगों को प्रेरणा देता है।
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सांस्कृतिक सहयोग और जनसंघर्ष से गोवा मुक्ति
इस आंदोलन को सांस्कृतिक समर्थन भी मिला। प्रसिद्ध संगीतकार सुधीर फड़के, जिन्हें बाबुजी कहा जाता था, ने देशभक्ति गीतों के माध्यम से लोगों में जोश भरा। वहीं सरस्वती आपटे ‘ताई’ के नेतृत्व में राष्ट्रीय सेविका समिति ने पुणे में सत्याग्रहियों के लिए भोजन और रहने की व्यवस्था की। मुंबई में यूनाइटेड फ्रंट ऑफ गोवन नामक संगठन बना, जिसने दादरा और नगर हवेली को पुर्तगालियों से मुक्त कराने में बड़ी भूमिका निभाई। कई वीर कार्यकर्ताओं ने इसमें योगदान दिया। हालांकि उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कई बार आंदोलन पर रोक भी लगाई, जिससे लोगों में नाराजगी बढ़ी। अंततः इन सभी बलिदानों और संघर्षों के कारण 1961 में गोवा को पुर्तगाली शासन से आजादी मिली।
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