'मील का पत्थर बनेगा यह निर्णय'
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होम मत अभिमत

‘मील का पत्थर बनेगा यह निर्णय’

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय ने अब जो कहा है, वह जनजाति सुरक्षा मंच वर्षों से कह रहा है कि जो लोग हिंदू से ईसाई या मुसलमान बने हैं, उन्हें पूर्व की तरह सरकारी सुविधाएं नहीं मिल सकतीं। 'डी—लिस्टिंग' अभियान इसी के लिए तो चल रहा है

Written byन्यायमूर्ति (सेनि) प्रकाश कुमार उईकेन्यायमूर्ति (सेनि) प्रकाश कुमार उईके
Dec 15, 2025, 08:50 am IST
inमत अभिमत
गोंड जाति से मुसलमान बने आरिफ ने अपनी बेटी महेक आरिफ के लिए अनुसूचित जनजाति का प्रमाणपत्र बनवा लिया है। ये लोग अनुच्छेद 342 का फायदा उठाते हैं। इसलिए इस पर संशोधन की मांग की जा रही है।

गोंड जाति से मुसलमान बने आरिफ ने अपनी बेटी महेक आरिफ के लिए अनुसूचित जनजाति का प्रमाणपत्र बनवा लिया है। ये लोग अनुच्छेद 342 का फायदा उठाते हैं। इसलिए इस पर संशोधन की मांग की जा रही है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक निर्णय ने पुनः इस चर्चा को छेड़ दिया है कि ऐसे अनुसूचित जनजाति एवं जाति के व्यक्ति, जो ईसाई या मुसलमान बन चुके हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए या नहीं! क्या संविधान निर्माताओं की ऐसी मंशा थी कि जो लोग अपना आदि मत एवं हिंदू धर्म को छोड़ चुके हैं, वे आज भी ‘सामाजिक भेदभाव के आधार पर’ आरक्षण प्राप्त करने के अधिकारी हैं! उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि ऐसे छद्म ईसाइयों और मुस्लमानों की जांच सरकार को करनी चाहिए। इस प्रकार के लोग संविधान के साथ धोखाधड़ी कर रहे हैं।

जितेंद्र साहनी नाम के एक व्यक्ति ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी। इसमें उसने कहा था कि वह ईसाइयत को मानता है एवं सप्ताह में दो दिन स्वयं की भूमि पर प्रार्थना सभा आयोजित करता है। इसके लिए उसने स्थानीय प्रशासन से अनुमति भी प्राप्त की थी, लेकिन प्रशासन ने जानबूझ उसे रद्द कर दिया एवं उस पर दुर्भावनावश मामला दर्ज किया है, जिसे खारिज किया जाए।

वहीं सरकारी पक्ष का कहना था कि जितेंद्र साहनी ईसाई मत का प्रचार करता है एवं हिंदू धर्म के देवी-देवताओं का मजाक उड़ाता है। कहता है कि हिंदू धर्म में ‘एक सूंड वाले देवता’ हैं, ‘पशु-पक्षी के आकार वाले देवता’ हैं, ‘जिनकी पूजा करना बुरी आत्मा को पूजने जैसा है।’ स्थानीय लोगों द्वारा पुलिस को ऐसी शिकायत प्राप्त हुई थी। इस कारण प्रशासन ने प्रार्थना सभा आयोजित करने की अनुमति खारिज कर दी थी। किंतु उसके बावजूद साहनी द्वारा प्रार्थना सभा आयोजित कर हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के विषय में अनर्गल शब्द कहे गए। इस कारण उसके विरुद्ध मामला दर्ज किया गया है।

न्यायालय ने साहनी की याचिका खारिज करते हुए राज्य एवं केंद्र सरकार के अधिकारियों को निर्देश दिए कि इस प्रकार से पंथ बदल कर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का लाभ प्राप्त कर रहे लोगों की जांच कर कार्रवाई की जानी चाहिए।

उल्लेखनीय है कि संविधान के अनुच्छेद 341 में प्रावधान है कि यदि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति हिंदू, सिख एवं बौद्ध मत को छोड़ कर अन्य पंथ ग्रहण कर चुका है, तो उसे अनुसूचित जाति वर्ग का लाभ प्राप्त नहीं होगा, किंतु अनुच्छेद 342 के अंतर्गत इस प्रकार का प्रावधान अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए नहीं है। इस कारण हिंदू से ईसाई या मुसलमान बने लोग 75 वर्ष से जनजाति समुदाय के संवैधानिक अधिकारों एवं आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रहे हैं, सभी सरकारी योजनाओं से लाभान्वित हो रहे हैं।

अब जब सर्वोच्च न्यायालय में ‘धर्म स्वतंत्रता अधिनियम’ की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है तब इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह निर्णय मिल का पत्थर साबित होगा। सरकार कन्वर्ट हुए लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं देने के लिए कोई संवैधानिक सुधार करेगी या नहीं, यह भविष्य के गर्त में है, किंतु इस निर्णय ने जनजाति समुदाय की 1967 से चली आ रही ‘डी-लिस्टिंग’ की मांग को कानूनी रूप से जायज ठहराया है।

Topics: ईसाई या मुसलमानइलाहाबादपाञ्चजन्य विशेषजनजाति समुदायअनुसूचित जनजाति एवं जातिमत एवं हिंदू धर्मआरक्षण का लाभ
न्यायमूर्ति (सेनि) प्रकाश कुमार उईके
न्यायमूर्ति (सेनि) प्रकाश कुमार उईके
अध्यक्ष, भारतीय आदिम जाति सेवक संघ, नई दिल्ली [Read more]
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