वंदेमातरम् : इतिहास से संसद तक
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वंदेमातरम् : इतिहास से संसद तक

संसद में ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर बहस हुई, जिसमें इस गीत के इतिहास, महत्ता और विवादों पर चर्चा हुई। यह गीत राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन समाधान सम्मान और तर्क से होना चाहिए

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 13, 2025, 07:36 pm IST
inभारत, विश्लेषण

संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर 8 दिसंबर को लोकसभा और 9 दिसंबर को राज्यसभा में चर्चा हुई। यह पहला अवसर है जब संसद में इस गीत के इतिहास, उसके महत्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका पर इतने व्यापक स्तर पर चर्चा हुई। इसका उद्देश्य शांतिपूर्ण और सार्थक संवाद स्थापित करना था। राष्ट्रीय भावनाओं से जुड़े इस विषय पर सभी सदस्यों से संयम और सम्मान के साथ विचार-विमर्श की अपेक्षा थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जैसे ही बहस शुरू हुई, उम्मीद के विपरीत माहौल तनावपूर्ण हो गया। कुछ सांसदों ने इसे देशभक्ति का प्रतीक बताते हुए जोरदार समर्थन किया, तो कुछ ने इसे लेकर अपने मतभेद स्पष्ट किए।

‘वंदे मातरम्’ की गौरवशाली यात्रा

लोकसभा में चर्चा की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने पर सदन में सामूहिक चर्चा करना गर्व की बात है। इतिहास के कई महत्वपूर्ण पर्व जैसे संविधान के 75 वर्ष, सरदार वल्लभ भाई पटेल और बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती, तथा गुरु तेग बहादुर जी का 350वां बलिदान दिवस-ये सभी घटनाएं हमें प्रेरित करती हैं। इस चर्चा से आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा का रास्ता खुलेगा। ‘वंदे मातरम्’ के 50 वर्ष पूरे होने पर देश गुलामी में था और 100 वर्ष पर आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा था, जब देशभक्तों को जेलों में बंद किया गया था। उस समय लोकतंत्र कमजोर था।

अब 150 वर्ष पूरे होने पर यह गौरवशाली अवसर है इसे पुनः स्थापित करने का। उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ‘वंदे मातरम्’ ने उस विचार को पुनर्जीवित किया, जो हजारों वर्ष से भारत की रग-रग में बसा था। यह गीत सिर्फ राजनीतिक आजादी का मंत्र नहीं था, बल्कि मातृभूमि की मुक्ति का पवित्र आह्वान था। ‘वंदे मातरम्’ जैसा भावगीत दुनिया के इतिहास में दुर्लभ है, जिसने सदियों तक करोड़ों लोगों को देशभक्ति और बलिदान के लिए प्रेरित किया। यह स्वतंत्रता, समर्पण और तपस्या का अद्भुत मंत्र था, जो संकटों का सामना करने की शक्ति देता है।

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे ‘एक सूत्र में बंधे सहस्त्र मन, एक ही कार्य में अर्पित सहस्त्र जीवन’ कहा है। इस गीत ने भारत को स्वावलंबन का रास्ता भी दिखाया। ‘वंदे मातरम्’ को लेकर महात्मा गांधी की भावनाओं को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि 2 दिसंबर, 1905 को दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका ‘इंडियन ओपिनियन’ में गांधी जी ने लिखा था, ‘‘यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया है, जैसे यह हमारा राष्ट्र गान हो। इसकी भावनाएं महान और अन्य राष्ट्र के गीतों से अधिक मधुर है। इसका एकमात्र उद्देश्य हमारे अंदर देशभक्ति की भावना जगाना है। यह भारत को मां के रूप में देखता और उसकी स्तुति करता है।’’ फिर भी पिछली सदी में इसके साथ इतना बड़ा अन्याय और विश्वासघात क्यों हुआ? वह कौन सी ताकत थी, जिसकी इच्छा बापू की भावनाओं पर भारी पड़ गई, जिसने इसे विवादों में घसीटा? आज जब हम इसकी 150वीं वर्षगांठ बना रहे हैं, तो इन बातों को नई पीढ़ी को भी समझाना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि 15 अक्तूबर, 1937 को मोहम्मद अली जिन्ना ने इसका विरोध किया। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा। मुस्लिम लीग के आधारहीन बयानों पर कड़ा जवाब देने के बजाय उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ की पृष्ठभूमि की जांच शुरू कर दी। उन्होंने 20 अक्तूबर को सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखा, ‘‘मैंने ‘वंदे मातरम्’ का बैकग्राउंड पढ़ा। मुझे लगता है कि इससे मुस्लिम भड़केंगे।’’ 26 अक्तूबर को कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम्’ के टुकड़े कर दिए। तुष्टीकरण की राजनीति के दबाव में कांग्रेस ‘वंदे मातरम्’ के लिए झुकी, इसलिए उसे भारत के बंटवारे के लिए झुकना पड़ा। दुर्भाग्य से कांग्रेस की नीतियां आज भी वैसी ही हैं। यही नहीं, आईएनसी (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) अब एमएमसी (मुस्लिम माओवादी कांग्रेस) हो गया है। आज भी कांग्रेस और उसके साथी, जिनके नाम के साथ कांग्रेस जुड़ा हुआ है, सब ‘वंदे मातरम्’ पर विवाद खड़ा करने की कोशिश करते हैं।

अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि किसी राष्ट्र का असली चरित्र संकट के समय प्रकट होता है। 1947 के बाद भी भारत ने चुनौतियों का सामना ‘वंदे मातरम्’ की भावना से किया। 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे पर्वों पर देशभर में तिरंगा फहरता है। खाद्य संकट हो या आपातकाल, युद्ध या वैश्विक महामारी कोरोना, हर बार ‘वंदे मातरम्’ ने देश को मजबूती दी और एकजुट करने का काम किया। इस गीत में राष्ट्र की शक्ति और भावनाओं को जोड़ने वाली ऊर्जा है, जो हमारी संस्कृति और चेतना का प्रतीक है। यह सिर्फ स्मरण का क्षण नहीं, बल्कि नई प्रेरणा और समर्पण का समय है। यह गीत हमें राष्ट्र के प्रति कर्तव्य के लिए प्रेरित करता है। आत्मनिर्भर और समृद्ध भारत का सपना ‘वंदे मातरम्’ की भावना से ही साकार होगा। हमें इस प्रेरणा को स्वीकार करते हुए देशवासियों को साथ लेकर चलना है ताकि 2047 तक विकसित भारत बन सके। मुझे विश्वास है कि यह चर्चा देश की नई पीढ़ी को ऊर्जा और प्रेरणा देगी।

देश की आत्मा और सांस्कृतिक प्रतीक

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत के ‘वंदे मातरम्’ को देश की आत्मा का गीत बताया। उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ और ‘आनंदमठ’ कभी भी इस्लाम विरोधी नहीं रहे। यह देश के इतिहास और वर्तमान, दोनों से जुड़ा है। ‘वंदे मातरम्’ से जिन पंक्तियों को हटाया गया, उन्हें केवल जिन्ना के नजरिए से देखने पर ही सांप्रदायिक और राजनीतिक कहा जा सकता है। इसमें कहीं भी मूर्ति पूजा पर जोर नहीं दिया गया है। फिर भी इसे तुष्टीकरण के लिए इस्तेमाल किया गया। आजादी के आंदोलन के दौरान कांग्रेस के कुछ तथाकथित सेकुलर लोगों की बेचैनी इतनी बढ़ गई थी कि उन्हें भारतीय संस्कृति, परंपरा और महान सभ्यता से जुड़ी बातें उन्हें सांप्रदायिक दिखती थीं।

उन्होंने एक पुस्तक का हवाला देते हुए कहा कि पंडित नेहरू की मौजूदगी में विदेश मंत्रालय की उच्चस्तरीय बैठक में कॉमनवेल्थ सेक्रेट्री वाईडी गुंडेविया ने उनसे पूछा कि अगर कम्युनिस्ट केंद्र की सत्ता में आ जाएं तो सरकारी तंत्र का क्या होगा? नेहरू जी ने झुंझलाकर जवाब दिया-भारत के लिए खतरा कम्युनिज्म नहीं, हिंदू दक्षिणपंथी कम्युनलिज्म है। रक्षा मंत्री ने कहा कि यह विडंबना है कि जिस कम्युनिस्ट विचारधारा ने कई देशों में सत्ता पाने की हिंसा का रास्ता चुना, उसे खतरा न मानकर ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना में विश्वास रखने वाली विचारधारा को खतरा माना गया। यह ऐसा पूर्वाग्रह था, जिससे तुष्टीकरण की राजनीति का जन्म हुआ। इसी कारण पड़ोसी देशों से आए अल्पसंख्यक समुदाय के शरणार्थियों को दशकों तक उनके अधिकारों से वंचित रखा गया, मुस्लिम महिलाओं से समान अधिकार छीने गए। इसी तुष्टीकरण की राजनीति के कारण देश का विभाजन हुआ और आज पश्चिम बंगाल के अनेक परिवारों को पलायन करना पड़ रहा है।

गीत का विरोध नेहरू परिवार के खून में

राज्यसभा में ‘वंदे मातरम्’ गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि जवाहरलाल नेहरू ने 1937 में वंदे मातरम् के केवल दो अंतरों को मान्यता दी थी। यहीं से देश में तुष्टीकरण की राजनीति शुरू हुई। इस तरह के फैसलों ने आगे चलकर देश के विभाजन का रास्ता तैयार किया। अगर उस समय पूरा वंदे मातरम् स्वीकार किया जाता तो शायद भारत का विभाजन न होता।

जब ‘वंदे मातरम्’ 100 साल का हुआ तो पूरे देश को बंदी बना दिया गया। जब 150 साल पर लोकसभा में चर्चा शुरू हुई, तो गांधी परिवार के दोनों सदस्य (राहुल-प्रियंका) नदारद थे। ‘वंदे मातरम्’ का विरोध नेहरू से लेकर आज तक गांधी परिवार के खून में है। कांग्रेस पार्टी की एक नेत्री ने लोकसभा में कहा कि ‘वंदे मातरम्’ पर अभी चर्चा की कोई जरूरत नहीं है। जो लोग ‘वंदे मातरम्’ के महत्व को नहीं जानते, वही इसे चुनाव से जोड़ रहे हैं। ‘वंदे मातरम्’ के प्रति समर्पण की जरूरत तब भी थी, जब यह लिखा गया और अब भी है। दुनिया भर में जहां भी आजादी के दीवाने थे, उन्होंने इसका गुणगान किया। जब सरहद पर जवान अपने प्राण त्यागता है, तो उसकी जुबान पर ‘वंदे मातरम्’ होता है।

संसद के दोनों सदनों में ‘वंदे मातरम्’ पर चर्चा के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि स्वस्थ लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उनका समाधान विनम्रता और तर्क के साथ करना चाहिए, न कि वैमनस्य और ध्रुवीकरण के साथ। ‘वंदे मातरम्’ जैसे राष्ट्रीय विषय पर चर्चा तभी सार्थक होगी, जब सदन में सभी पक्ष मिलकर देश के हित को प्राथमिकता दें और भावनाओं को सकारात्मक ऊर्जा में बदलें।

Topics: राष्ट्रगीतवंदे मातरम्रवींद्रनाथ ठाकुरपाञ्चजन्य विशेषसांस्कृतिक प्रतीकmain. FEATUREDदेश की आत्माइतिहास से संसदप्रधानमंत्री मोदीगौरवशाली यात्राअमित शाहनेहरू परिवारराजनाथ सिंह
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