कार्तिगई दीपम् : दीप बुझाने वाले जजों को डराने चले
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दीप बुझाने वाले जजों को डराने चले

इस विवाद को बनाए रखने का एक बड़ा कारण मंदिरों और धार्मिक परम्पराओं पर नियंत्रण स्थापित करना है। यही कारण है कि बार-बार मंदिर पर्व और उत्सवों में हस्तक्षेप किया जाता है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट कह चुका है कि मंदिर का पैसा देवता की संपत्ति है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Dec 13, 2025, 08:45 am IST
inसम्पादकीय

सोचिए… एक पहाड़ी, जहां सदियों से बिना विवाद, बिना राजनीति, बिना संघर्ष कार्तिगई दीपम् की ज्योति प्रज्ज्वलित की जाती रही सो वहां इस वर्ष न्यायालय के आदेश के बाद भी स्थानीय प्रशासन ने एक आदेश निकालकर उस परंपरा को ही खंडित करने का प्रयास किया। यही नहीं, जिन न्यायमूर्ति ने यह निर्णय दिया था विपक्ष द्वारा उनके खिलाफ महाभियोग तक लाने का राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है।

तमिलनाडु की पवित्र पहाड़ी तिरुपरंकुंद्रम पर सदियों पुरानी कार्तिगई दीपम् की परंपरा अचानक विवाद का केंद्र क्यों बन गई? एक तरफ करोड़ों हिंदुओं की आस्था है, दूसरी तरफ देश की संस्कृति को विभाजित करने का प्रयास करने वाली विषैली राजनीति।

कार्तिगई दीपम् को हर साल तिरुपरंकुंद्रम की पहाड़ी पर दीपथून यानी ‘शिला ज्योति स्तंभ’(Stone Lamp Pillar) प्रज्ज्वलित किया जाता है, इसकी प्राचीनता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि संगम साहित्य में इसे भगवान मुरुगन की पहाड़ी के रूप में बताया गया है। चोल, पांड्य और पल्लव राजवंशों ने इस पर्व को संरक्षित किया। इस पर्व का उद्देश्य अंधकार पर प्रकाश की विजय और दिव्य शक्ति का आवाहन करना है।

पहाड़ी के नीचे प्राचीन सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर, मध्य में सदियों पुराना काशी विश्वनाथ मंदिर और शिखर पर सिकंदर बदुशाह की दरगाह स्थित है, जो 17वीं शताब्दी में मुगलों द्वारा बनाई गई। अर्थात् मंदिरों की स्थापना के सदियों बाद दरगाह बनी। दीपथून पर दीप जलाने का निर्देश मद्रास उच्च न्यायालय ने दिया था और मंदिर प्रशासन को इसे सुचारु रूप से संपन्न कराने का आदेश दिया गया था।

लेकिन प्रशासन ने न्यायालय की अवहेलना करते हुए दीपक का स्थान बदलने की कोशिश की। यहीं से विवाद शुरू हुआ। प्रशासन ने इसे “न्यायिक व प्रशासनिक सुविधा” कहा, परंतु प्रश्न यह है कि जो परंपरा हजारों वर्ष से बिना किसी विवाद के चल रही थी, वह अचानक प्रशासनिक सुविधा के नाम पर कैसे गलत ठहरा दी गई? असल बात यह है कि विवाद स्थान का नहीं, बल्कि नियंत्रण का है।
क्या प्रशासन हिंदू परंपराओं को अपनी सुविधा के अनुसार बदल सकता है?

क्या द्रविड़ पहचान को सनातन से अलग दिखाना एक योजनाबद्ध राजनीतिक परियोजना है?
यह बहस तब और अधिक गंभीर हो जाती है जब तमिलनाडु सरकार के साथ विपक्षी दल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी आदि हिंदुओं के पक्ष में फैसला सुनाने वाले न्यायमूर्ति पर महाभियोग चलाए जाने की मांग करने लगते हैं। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार हुआ कि किसी न्यायिक निर्णय के विरोध में इस प्रकार राजनीतिक दबाव बनाया गया कि उसकी गूंज संसद तक पहुंची। इस संदर्भ में गृह मंत्री अमित शाह ने भी कहा, “स्वतंत्र भारत में ऐसा पहली बार हो रहा है कि एक न्यायाधीश ने एक मंदिर में दीप जलाने का आदेश दिया और उन्हें हटाने के लिए विपक्ष ने महाभियोग लाने का प्रस्ताव रखा।’’

ऐसे में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि बात केवल मुस्लिम तुष्टीकरण की है या फिर द्रविड़ बनाम सनातन के भ्रम को गहरा करने का एक बड़ा षड्यंत्र? इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने स्पष्ट कहा है, “तमिलनाडु में हिंदुओं का जागना ही मनचाहे परिणाम के लिए काफी है। तमिलनाडु में भी हिंदू संगठन काम कर रहे हैं। वे हमें बताएंगे। फिर हम इस बारे में सोचेंगे। हालांकि मुझे लगता है कि तमिलनाडु में हिंदुओं के सामर्थ्य के आधार पर ही इस मुद्दे का हल निकल सकता है।’’

आंध्रप्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने भी कहा कि द्रविड़ पहचान का अर्थ सनातन से अलग होना नहीं है। यह विवाद मूल रूप से ‘द्रविड़ बनाम बाहरी’ की राजनीतिक हवा देने के लिए शुरू हुआ था, परंतु धीरे-धीरे इसे हिंदू बनाम मुस्लिम का रंग देने की कोशिश की गई, जबकि वास्तविक मुद्दा केवल पहाड़ी के स्वामित्व और परंपरागत अधिकार का है।

भारत की संस्कृति एक है, इसे सनातन कहा जाता है। द्रविड़ इस सांस्कृतिक धारा से बाहर नहीं है। राजनीतिक दल अपनी पहचान द्रविड़ के रूप में गढ़ते हैं, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि द्रविड़ संस्कृति सनातन से अलग है। दक्षिण भारत के ही कई इतिहासकारों ने इस विभाजन को निराधार बताया है। दक्षिण भारत के इतिहासकार के. ए. नीलकंठ शास्त्री कहते हैं, “संगम साहित्य में शिव मुरुगन, विष्णु, कृष्ण, इन्द्र, वरुण जैसे दैविक रूप स्पष्ट मिलते हैं। चोल, पल्लव और पांड्य राजवंश शैव और वैष्णव परम्पराओं के संरक्षक थे। दक्षिण भारत के सबसे बड़े मंदिर आगम और वेद पर आधारित थे।”

दूसरा प्रमाण तमिल ब्राह्मी और संगम युग के विशेषज्ञ, इरावथम महादेवन ने दिया है। उनकी खोज से सिद्ध हुआ है कि संगम युग में अग्नि यूप स्तम्भ यज्ञ, देवी उपासना और स्कन्द आराधना की परम्परा गहराई से मौजूद थी। तमिल ब्राह्मी लिपि भारतीय ब्राह्मी परिवार की ही स्वाभाविक शाखा है। यह किसी अलग सभ्यता का संकेत नहीं है


तीसरा प्रमाण, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के टी.पी. महादेवन के शोध से मिलता है। उनका शोध बताता है कि दक्षिण भारतीय संस्कृति भारतीय सनातन सांस्कृतिक ढांचे के भीतर विकसित हुई है। तमिल आराधना में अग्नि, सूर्य, जल, पूजा, पितृ तर्पण और योग की परम्पराएं वैदिक परम्पराओं से संगति रखती हैं।

चौथा प्रमाण, आनुवांशिकी अध्ययन से मिलता है। हार्वर्ड के शोध समूह के अनुसार, उत्तर और दक्षिण भारत के लोगों में कोई नस्लीय भेद नहीं है। आर्य आक्रमण का सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से निरस्त हो चुका है। द्रविड़ बनाम आर्य एक भाषाई वर्गीकरण है, कोई जातीय विभाजन नहीं। यही वह सच है जिसे छिपाया गया… और कार्तिगई दीपम् विवाद उसी एजेंडे की कड़ी जैसा लगता है। पहले परंपराओं पर हस्तक्षेप, फिर इतिहास पर, फिर धार्मिक पहचान पर।

दरअसल पूरा मुद्दा नया नहीं है। 1862, 1912 और 1923 में इसी पहाड़ी पर न्यायिक संघर्ष हो चुका है। 1909 के सरकारी आदेश ने स्पष्ट किया कि पूरी पहाड़ी हिन्दुओं की पूजा-स्थली है और देवस्थानम् इसका स्वामी है। 1923 के प्रिवी काउंसिल फैसले ने भी मंदिर के अधिकार को सही ठहराया। दीपथून, जो दरगाह से 50 मीटर दूर है, पारंपरिक कार्तिगई दीपम् के लिए ही बनाया गया था। न्यायालय ने माना कि वहां दीप जलाना पूरी तरह न्यायसंगत है और आदेश दिया कि इस वर्ष से दीपथून पर कार्तिगई दीपम् अवश्य जलाया जाए। यह सिर्फ न्यायालय का आदेश नहीं था, यह इतिहास की बहाली थी।

दरअसल, इस विवाद को बनाए रखने का एक बड़ा कारण मंदिरों और धार्मिक परम्पराओं पर नियंत्रण स्थापित करना है। यही कारण है कि बार-बार मंदिर पर्व और उत्सवों में हस्तक्षेप किया जाता है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट कह चुका है कि मंदिर का पैसा देवता की संपत्ति है। अगर हम आज मौन रहे, तो कल कोई भी पर्व सिर्फ सरकारी आदेशों के हिसाब से मनाया जाएगा।

दक्षिण को उत्तर से, द्रविड़ को सनातन से, तमिल को हिंदू से अलग दिखाने की जो कोशिश है वह इतिहास, विज्ञान, तर्क और आस्था, चारों के सामने टिक नहीं सकती, क्योंकि द्रविड़ संस्कृति अलग नहीं है। द्रविड़ परम्पराएं भी तो इसी सनातन का आलोक हैं। इसे कोई प्रशासनिक आदेश या फतवा तय नहीं कर सकता। कार्तिगई दीपम् की लौ सिर्फ एक दीपक नहीं, यह याद दिलाती है कि सत्य चाहे जितना दबा दिया जाए, लेकिन जब समय आता है तो वह प्रकाश की तरह फिर प्रकट होता है।

x@hiteshshankar

Topics: दीपथूनतुष्टीकरणशिला ज्योति स्तंभपाञ्चजन्य विशेषषड्यंत्रमहाभियोगhiteshshankarकार्तिगई दीपम् विवादधार्मिक परम्पराओं पर नियंत्रणमंदिरों में हस्तक्षेपन्यायिक निर्णयतिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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