विश्व विरासत में दीपोत्सव : विश्व को आलोकित करता भारतीय आध्यात्मिक संदेश
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विश्व विरासत में दीपोत्सव : विश्व को आलोकित करता भारतीय आध्यात्मिक संदेश

लाल किले की ऐतिहासिक प्राचीरों पर 10 दिसंबर 2025 को जब ‘वंदे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ की स्वर-लहरियां गूंजी तो वह केवल एक घोष नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा का उद्घोष था।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Dec 12, 2025, 03:24 pm IST
inभारत
deepotsava

अयोध्या में दीपोत्सव (फाइल फोटो)

लाल किले की ऐतिहासिक प्राचीरों पर 10 दिसंबर 2025 को जब ‘वंदे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ की स्वर-लहरियां गूंजी तो वह केवल एक घोष नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा का उद्घोष था। यूनेस्को की 20वीं अंतर-सरकारी समिति द्वारा दीपावली को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किए जाने की घोषणा ने उस क्षण भारत की सांस्कृतिक चेतना को विश्व मंच पर अभूतपूर्व आलोक से भर दिया। विश्व के 194 देशों के प्रतिनिधि साक्षी थे कि कैसे भारत की एक परंपरा वैश्विक धरोहर बनते हुए सभ्यता के साझा मूल्यों (प्रकाश, सामूहिकता और आशा) का प्रतीक बन गई। यह निर्णय संस्कृति के इतिहास में एक नया अध्याय है, जहां उत्सव और सभ्यता, लोक-परंपरा और वैश्विक संवाद, दोनों एक धारा में समाहित हो गए। दीपावली का यह गौरव किसी औपचारिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं बल्कि उस दीर्घ, गहन और जीवंत सांस्कृतिक प्रवाह की मान्यता है, जिसने सहस्राब्दियों से मानव समाज के हृदय में ज्ञान, सद्भाव और आत्मिक एकता का प्रकाश जलाए रखा है। जिस धरती ने वेदों का स्वर, योग की साधना और कला की परंपराओं को जन्म दिया, उसी भूमि से निकला दीपोत्सव आज विश्व मानवता का साझा उत्सव बन गया है, एक ऐसा पर्व, जो सीमाओं से परे जाकर मनुष्य की सामूहिक चेतना को आलोकित करता है।

सांस्कृतिक कूटनीति की ऐतिहासिक घड़ी

भारत द्वारा पहली बार यूनेस्को की प्रतिष्ठित अंतर-सरकारी समिति के सत्र की मेजबानी करना केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं था बल्कि सांस्कृतिक कूटनीति की वह ऐतिहासिक घड़ी थी, जिसने दुनिया के सामने भारत की सदियों पुरानी परंपराओं की गरिमा को नए आयाम दिए। स्वाधीनता, स्वाभिमान और बहुल सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक लाल किला इस क्षण का साक्षी बनकर स्वयं एक संदेश देता प्रतीत हुआ कि भारतीय संस्कृति का संवाद अब वैश्विक धरातल पर और अधिक प्रभावी रूप से स्थापित हो चुका है। इस आयोजन ने यह स्पष्ट किया कि वैश्विक समुदाय अब भारत की परंपराओं को केवल ‘देखने’ की वस्तु नहीं मानता बल्कि उन्हें संरक्षित और साझा करने योग्य मानवता की विरासत के रूप में स्वीकार कर रहा है। जब विश्व मंच पर भारत की परंपरा को सम्मानित किया गया तो यह मात्र सांस्कृतिक उपलब्धि नहीं थी बल्कि उस भारतीय दर्शन, विचार और मानवीय मूल्यों की विजय थी, जिसकी जड़ें ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में निहित हैं। यह क्षण इसलिए भी ऐतिहासिक बना क्योंकि उसने दुनिया को यह विश्वास दिलाया कि भारतीय संस्कृति केवल एक राष्ट्र की पहचान नहीं, मानव सभ्यता के भविष्य के लिए मार्गदर्शक प्रकाश भी है।

परंपरा की वैश्विक पहचान

दीपावली का यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची में सम्मिलन भारत के लिए एक सांस्कृतिक उपलब्धि ही नहीं, उसकी जीवंत परंपराओं की वैश्विक पहचान का नया अध्याय है। यह भारत की 16वीं अमूर्त सांस्कृतिक विरासत बनी है, जहां पहले से कुंभ मेला, दुर्गा पूजा, गरबा, वेदपाठ, योग, रामलीला, संकीर्तन और छऊ नृत्य जैसी अनूठी परंपराएं मौजूद हैं। यह श्रृंखला सिद्ध करती है कि भारतीय संस्कृति कोई संग्रहालय में सुरक्षित अतीत नहीं बल्कि एक सक्रिय, संप्रेषणशील और सतत विकसित होती धरोहर है, जो समाज के साथ बदलती हुई भी अपनी मूल आत्मा को बनाए रखती है। दीपावली का नामांकन दस्तावेज इस जीवंतता और बहुलता का उत्कृष्ट प्रमाण है। इसमें ग्रामीण कुम्हारों के दीयों से लेकर शहरी कलाकारों की रंगोलियों तक, मिठाईकारों की परंपराओं से लेकर प्रवासी भारतीय समुदायों के अनुभवों तक, विविध सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को शामिल किया गया। यूनेस्को ने दीपावली को केवल धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि समुदायों की सहभागिता, सामाजिक अर्थव्यवस्था की सक्रियता और आध्यात्मिक प्रतीकवाद की विशिष्ट विरासत मानते हुए स्वीकार किया। भारत ने इस प्रक्रिया के माध्यम से यह सिद्ध किया कि कोई परंपरा तभी वास्तविक अर्थों में जीवित रह सकती है, जब उसे समाज के प्रत्येक वर्ग का सहयोग, सहभागिता और संरक्षण प्राप्त हो। यही सामूहिकता दीपावली को वैश्विक पहचान दिलाने में निर्णायक बनी।

प्रकाश की दार्शनिकता

दीपावली का दर्शन दीयों की बाहरी रोशनी से आगे बढ़कर मनुष्य की आंतरिक चेतना को उजागर करता है। इसकी मूल भावना अंधकार पर प्रकाश की विजय, दुर्बलता पर आत्मबल की प्रतिष्ठा और अज्ञान पर ज्ञान की उत्कट आकांक्षा में निहित है। यह पर्व समाज के लिए केवल उत्सव नहीं, आत्म-स्मरण का ऐसा क्षण है, जब व्यक्ति और समुदाय दोनों अपने भीतर के प्रकाश को पहचानने और पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया से गुजरते हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में दीपावली के स्वरूप भिन्न हैं किंतु इन विविधताओं में भी इसका दार्शनिक संदेश समान रूप से प्रखर रहता है। उत्तर भारत में यह राम के वनवास से लौटने और अयोध्या में आशा के पुनरुत्थान का प्रतीक है। गुजरात में यह व्यापारिक नववर्ष की शुरुआत के रूप में समृद्धि और नए संकल्पों का संकेत देती है। दक्षिण भारत में नरकासुर-वध की कथा के माध्यम से यह विजय, साहस और आत्मबल की स्मृति बनकर उभरती है जबकि महाराष्ट्र में बलि प्रतिपदा सामुदायिक सौहार्द और सामाजिक एकजुटता का उत्सव है। इन सभी भिन्न अभिव्यक्तियों के बावजूद दीपावली का केंद्रीय संदेश अटूट है कि अंधकार कितना भी व्यापक क्यों न हो, एक दीपक की छोटी-सी लौ भी उम्मीद का नया क्षितिज खोल सकती है और हर हृदय में प्रकाश का संवहन कर सकती है।

लोक जीवन की अर्थव्यवस्था

दीपावली को सही अर्थों में समझना पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों से आगे बढ़कर उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आयामों को देखना आवश्यक है। यह त्योहार किसान के लिए फसल कटाई के समय का संकेत है, व्यापारी समुदाय के लिए नए वर्ष और नए व्यवसायिक चक्र की शुरुआत का प्रतीक है और कारीगरों, शिल्पकारों तथा छोटे उद्यमियों के लिए वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण रोजगार अवसर बनकर आता है। कुम्हारों के दीये, पुष्प विक्रेताओं की मालाएं, मिठाई वालों के व्यस्त दिन, दीपक और सजावट सामग्री बनाने वाले ग्रामीण कारीगरों की बढ़ती मांग, वस्त्रकारों और सुनारों की दुकानों पर उमड़ती भीड़, ये सभी मिलकर दीपावली को जनजीवन की आर्थिक धुरी में बदल देते हैं। हर वर्ष दीपावली से पूर्व का सप्ताह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत सक्रिय रहता है, जिसमें अरबों रुपये का व्यापार होता है। सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस लेन-देन में छोटे कारोबारियों, हस्तशिल्प आधारित उद्योगों और पारंपरिक उद्यमों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यही कारण है कि यूनेस्को के दृष्टिकोण में दीपावली एक जीवंत परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरती है। इसकी जीवंतता केवल सांस्कृतिक नहीं, आर्थिक और सामाजिक संरचना के उस संतुलन में निहित है, जिसमें आध्यात्मिकता, आजीविका और सामुदायिक सहभागिता बेहतरीन रूप से एक-दूसरे को पोषित करते हैं।

सतत विकास और दीपावली

दीपावली का स्वरूप केवल धार्मिक या आध्यात्मिक नहीं है बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आयामों के माध्यम से सतत विकास लक्ष्यों से गहराई से जुड़ा है। यह पर्व गरीबी उन्मूलन, लैंगिक समानता, सम्मानजनक कार्य और आर्थिक वृद्धि तथा सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण जैसे कई लक्ष्यों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में सशक्त करता है। ग्रामीण भारत में मिट्टी के दीयों, हस्तशिल्प और पारंपरिक सजावट सामग्री का उत्पादन लाखों परिवारों के लिए आजीविका का प्रमुख स्रोत है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक होती है। इससे न केवल उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ती है बल्कि स्थानीय कौशल और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को भी संरक्षण मिलता है। दूसरी ओर, शहरी भारत में ग्रीन क्रैकर्स, प्राकृतिक सजावट सामग्री, और मिट्टी के दीयों का पुनःप्रयोग जैसे पर्यावरण-अनुकूल दीपावली की दिशा में बढ़ते कदम इस त्योहार की जिम्मेदारीपूर्ण अनुकूलनशीलता को दर्शाते हैं। परंपरा और आधुनिकता के इस संतुलन ने दीपावली को केवल सांस्कृतिक ऊर्जा का स्रोत नहीं बल्कि टिकाऊ विकास का भी प्रेरक बना दिया है। इस प्रकार, दीपावली समुदायों को जोड़ते हुए, स्थानीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करते हुए और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करते हुए एक ऐसी जीवंत विरासत के रूप में उभरती है, जो सतत विकास के मूल दर्शन को साकार करती है।

परंपरा और पर्यावरण का संगम

दीपावली ने पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह स्वयं को पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील और उत्तरदायी बनाया है, वह किसी भी जीवंत परंपरा की वास्तविक शक्ति को दर्शाता है। आधुनिक समय में जब प्रदूषण, संसाधनों का क्षरण और पर्यावरणीय असंतुलन गंभीर चिंताएं बन चुके हैं, तब पारंपरिक उत्सवों का सतत और जिम्मेदार रूप में विकसित होना अत्यंत आवश्यक है। दीपावली ने इस दिशा में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाए हैं। पटाखों के स्थान पर ग्रीन क्रैकर्स का उपयोग, मिट्टी के पारंपरिक दीयों की पुनर्वापसी, प्राकृतिक और इको-फ्रैंडली सजावट सामग्री की ओर झुकाव तथा स्वच्छ-दिवाली अभियानों की व्यापक सामाजिक स्वीकृति यह दर्शाती है कि परंपराएं समय के अनुसार अपने स्वरूप को रूपांतरित करने में सक्षम हैं। यह आत्म-संशोधन न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है बल्कि इस बात का भी संकेत है कि भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति सजग रहते हुए आधुनिक चुनौतियों का समाधान निकालने का सामर्थ्य रखता है। यूनेस्को ऐसी परंपराओं को ही ‘अमूर्त विरासत’ की श्रेणी में आदर्श मानता है, जो समाज के बदलावों को आत्मसात करती हैं, समुदायों में नई चेतना जगाती हैं और फिर भी अपनी आत्मा, अपनी मूल भावना और अपने सांस्कृतिक प्रतीकों को अडिग बनाए रखती हैं। दीपावली का यह पर्यावरण-संवेदी रूप परंपरा और आधुनिकता के सुंदर संगम का प्रेरक उदाहरण है।

अयोध्या का दीपोत्सव

वर्ष 2025 में अयोध्या का दीपोत्सव भारत की सांस्कृतिक चेतना का ऐसा जीवंत दृश्य था, जिसने पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। सरयू के तट पर प्रज्वलित 26.17 लाख दीपों का अद्भुत प्रकाश-सागर न केवल गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ बल्कि भारत की सामूहिक सहभागिता, परंपरागत आस्था और सांस्कृतिक जीवंतता का प्रतीक भी बन गया। यह दृश्य केवल दीयों की चमक का विस्तार नहीं था बल्कि उस आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रस्फुटन था, जिसमें एक पूरे राष्ट्र की स्मृतियां, आस्थाएं और उत्साह एक साथ प्रज्वलित होते दिखाई दिए। अयोध्या की गलियों से लेकर सरयू के तट तक फैली वह रोशनी इस बात की गवाही दे रही थी कि दीपावली भारत के लिए मात्र एक पर्व नहीं, सांस्कृतिक आत्माभिव्यक्ति का माध्यम है। यह परंपरा को आधुनिकता के साथ जोड़ते हुए दुनिया को संदेश देती है कि भारतीय सभ्यता अपनी जड़ों में जितनी गहरी है, उतनी ही व्यापकता से वैश्विक मंच पर संवाद भी करती है। दीपोत्सव का वह दृश्य एक सांस्कृतिक घोषणा थी कि भारत की परंपराएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक, उतनी ही प्रेरणादायी और उतनी ही जीवंत हैं, जितनी सदियों पहले थी। अयोध्या उस रात सचमुच ‘प्रकाश की राजधानी’ बन गई थी और दीपावली अपनी पूर्ण प्रतीकात्मकता के साथ जगमगा उठी थी।

संरक्षण की नई चुनौती

किसी भी परंपरा का यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होना उसकी यात्रा का अंत नहीं बल्कि एक नई और गहन जिम्मेदारी की शुरुआत है। दीपावली के संदर्भ में यह जिम्मेदारी और भी व्यापक हो जाती है क्योंकि यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, सामुदायिक जीवन, लोक अर्थव्यवस्था, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक सहभागिता का समन्वित स्वरूप है। ‘कम्युनिटी-ड्रिवन कंजर्वेशन’ यूनेस्को का स्पष्ट सिद्धांत है अर्थात् जिस समुदाय से परंपरा उत्पन्न हुई है, उसके संरक्षण का नेतृत्व भी वही समुदाय करे। यदि परंपरा का संचालन बाहरी ताकतों, अत्यधिक व्यावसायीकरण या सांस्कृतिक उपभोगवाद के हाथों में चला जाए तो उसकी आत्मा धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है। इसीलिए दीपावली को उसके वास्तविक स्वरूप में सुरक्षित रखना आज की सबसे बड़ी चुनौती है। इसके लिए राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर ठोस संरक्षण योजनाओं का निर्माण अनिवार्य है। पारंपरिक कारीगरों, कुम्हारों और हस्तशिल्पकारों के उत्पादों को सरकारी और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाना आवश्यक होगा ताकि उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके। शिक्षा संस्थानों में दीपावली के सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अर्थों को सम्मिलित कर नई पीढ़ी को इस विरासत से परिचित कराया जा सकता है। साथ ही पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों के माध्यम से उत्सव को हरित और टिकाऊ बनाना भी समय की मांग है। सामुदायिक अभियानों में लोगों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा ताकि दीपावली की यह विरासत केवल संरक्षित ही नहीं, जीवंत भी बनी रहे और आने वाली पीढ़ियों तक अपने असली स्वरूप में पहुंच सके।

सांस्कृतिक नीति का नया मार्ग

दीपावली को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में प्राप्त वैश्विक सम्मान ने भारतीय सांस्कृतिक नीति के लिए नए आयाम खोल दिए हैं। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय द्वारा यह स्पष्ट संकेत दिया गया है कि इस उपलब्धि के आधार पर सांस्कृतिक पर्यटन, अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान, पारंपरिक कला-शिल्प के प्रोत्साहन और स्थानीय कलाकारों के आर्थिक सशक्तिकरण की नई योजनाएं विकसित की जाएंगी। यह परिवर्तन दर्शाता है कि भारत अब केवल अपने अतीत का संरक्षक भर नहीं, वैश्विक सांस्कृतिक नेतृत्व की दिशा में सक्रिय रूप से आगे बढ़ रहा है। यह निर्णय इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कोई भी परंपरा तभी टिकाऊ और प्रासंगिक बनी रहती है, जब वह ज्ञान, अर्थव्यवस्था और लोकजीवन से गहराई से जुड़ी हो। दीपावली का सामाजिक-आर्थिक तंत्र, उसकी कलात्मक अभिव्यक्तियां, उसकी आध्यात्मिक चेतना और उसकी सामुदायिक सहभागिता भारतीय संस्कृति की समग्रता को परिभाषित करती हैं। यूनेस्को की मान्यता ने भारत को यह अवसर दिया है कि वह अपनी पारंपरिक विरासत को वैश्विक स्तर पर नए सिरे से प्रस्तुत करे और सांस्कृतिक कूटनीति को विकास के नए औजार के रूप में उपयोग करे। इससे भारत की सांस्कृतिक साख न केवल बढ़ेगी बल्कि यह भी सिद्ध होगा कि भारतीय परंपराएं आधुनिक विश्व में भी उतनी ही आवश्यक, उतनी ही प्रेरक और उतनी ही जीवंत हैं।

मानवता के लिए प्रकाश का संदेश

यूनेस्को द्वारा जब दीपावली को ‘मानवता की अमूर्त धरोहर’ घोषित किया गया तो यह निर्णय किसी एक संस्कृति, राष्ट्र या समुदाय का सम्मान भर नहीं था बल्कि यह उस सार्वभौमिक मूल्य की स्वीकृति थी, जिसे मनुष्य ने सदियों से प्रकाश के प्रतीक में महसूस किया है। दीपावली केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, मानव चेतना का ऐसा उत्सव है, जब करुणा, आशा, सह-अस्तित्व और पारस्परिक सद्भाव की अग्नि प्रज्वलित होती है। यह पर्व याद दिलाता है कि संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं, वर्तमान की कर्मभूमि और भविष्य की दिशा है। आज जब दुनिया विभिन्न विभाजनों, संघर्षों और असमानताओं से जूझ रही है, तब दीपावली का संदेश और भी प्रासंगिक हो उठता है। यदि इस परंपरा की आत्मा को जीवित रखना है तो आवश्यक है कि प्रकाश का यह प्रतीक मात्र दीयों की लौ तक सीमित न रहे; यह प्रकाश समाज के प्रत्येक हाशिए पर मौजूद व्यक्ति तक पहुंचे, हर समुदाय को समान गरिमा मिले और हर जीवन में आशा की किरण जग सके। दीपावली का वास्तविक अर्थ तभी साकार होगा, जब यह मानवता के बीच समावेशिता, न्याय और सह-अस्तित्व का पुल बनकर उभरे, एक ऐसा प्रकाश, जो केवल घरों को नहीं, दिलों और समाजों को भी आलोकित करे।

सार्वभौमिक संदेश बनकर उभरेगी दीपावली

बहरहाल, दीपावली का यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में सम्मिलन भारत के लिए विरासत संरक्षण और सांस्कृतिक नेतृत्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह केवल एक परंपरा की वैश्विक पहचान नहीं, उस यात्रा का आरंभ है, जिसमें भारतीय संस्कृति अपनी जड़ों के साथ-साथ आधुनिक विश्व की अपेक्षाओं और चुनौतियों को भी आत्मसात करती है। यह निर्णय सिद्ध करता है कि संस्कृति अतीत का गौरव होने के साथ-साथ भविष्य का मार्गदर्शन भी है और वह केवल स्मृति नहीं, ऐसा प्रकाश है, जो अंधकार को दूर करने के साथ-साथ आशा, आत्मविश्वास और सामूहिकता की चेतना भी जगाता है। आज भारत के सामने एक अनूठा अवसर है कि वह दीपावली के इस वैश्विक आलोक को मानवता के सहयोग, पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास के मार्ग में बदल दे। यदि दीपावली केवल उत्सव न रहकर सामाजिक परिवर्तन, सांस्कृतिक संवाद और सामूहिक प्रगति का माध्यम बन सके तो यही इसका वास्तविक उत्सव होगा, संस्कृति का, सभ्यता का और नागरिकता का। तब प्रत्येक दीप केवल घरों की दहलीज को नहीं, मानव हृदयों को भी आलोकित करेगा, और दीपावली विश्व के लिए एक सार्वभौमिक संदेश बनकर उभरेगी।

 

Topics: दीपावलीसभ्यतालाल किलापाञ्चजन्य विशेषसांस्कृतिक कूटनीतियूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासतलाल किलेसंस्कृतिसांस्कृतिक विरासतयोगेश कुमार गोयलदीपोत्सव
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सूबेदार बलदेव तिवारी से कांपते थे अंग्रेज। (चित्र प्रतीकात्मक और एआई द्वारा निर्मित)

महायोद्धा सूबेदार बलदेव तिवारी : राजा शंकर शाह और रघुनाथ के बलिदान का लिया प्रतिशोध

RSS Chief Dr Mohan Bhagwat Statement Gen Z Youth Protests Mumbai Panchjanya

“प्रदर्शन करने वाले Gen Z युवा देशद्रोही नहीं”: मुंबई में RSS सरसंघचालक जी ने कहा- “व्यवस्था सुधार के लिए संवाद जरूरी”

Uttarakhand NCC Expansion DG Lieutenant General Virendra Vats Meets CM Pushkar Singh Dhami

“सीमांत क्षेत्रों तक पहुंचेगा NCC”: सीएम धामी से मिले एनसीसी महानिदेशक, उत्तराखंड में खुलेगी नई अकादमी!

left wing media propaganda on yogi government ad spending busted

“मोदी बनाम योगी” के फर्जी नैरेटिव में उलझा वामपंथी पोर्टल: आंकड़ों की आड़ में छिपाई योजना प्रचार की सच्चाई!

7 अगस्त का पंचांग

7 अगस्त पंचांग: शुक्रवार की तिथि, नक्षत्र, ग्रहों की स्थिति और लग्नारंभ समय

ओडिशा: पुलिस ने 42 बांग्लादेशी नागरिकों को वापस बांग्लादेश भेजा, घुसपैठ के खिलाफ अभियान को बड़ी सफलता

PM Modi का वीडियो हटाने पर घिरा Meta! Cambridge Analytica और Facebook Papers के बाद फिर उठे सवाल

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कटक में जगद्गुरु कृपालु विश्वविद्यालय का किया उद्घाटन, युवाओं को सशक्त बनाने पर दिया जोर

Sambhal Violence

संभल हिंसा पर आयोग की रिपोर्ट में बड़ा दावा, ‘पहले से रची गई थी साजिश’

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