भारत के ताजा तिमाही जीडीपी आंकड़े, जो सरकारी अनुमान 7 प्रतिशत से अधिक हैं, ने एक बार फिर वैश्विक निराशावादियों को विनम्र, लेकिन ठोस संदेश दिया है कि भारत की ‘अर्थव्यवस्था की मृत्यु’ की अफवाहें बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई थीं। विकसित अर्थव्यवस्थाएं जहां मंदी से जूझ रही हैं और उभरते बाजार भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं में फंसे हुए हैं, वहीं भारत ने न केवल अपनी विकास गति को कायम रखा है, बल्कि उसमें नवीन ऊर्जा का संचार भी किया है।

संस्थापक एवं निर्देशक, बिल्ड इंडिया फाउंडेशन
बुनियादी ढांचे पर सरकार का निरंतर ध्यान इस प्रगति के केंद्र में है। हाल के बजटों में सार्वजनिक पूंजीगत व्यय में 30 प्रतिशत से अधिक की वार्षिक वृद्धि की गई है, जिसके स्पष्ट परिणाम धरातल पर दिख रहे हैं। राज्यों को जोड़ने वाले नए हाईवे, आधुनिक हवाईअड्डे, रेलवे का अभूतपूर्व आधुनिकीकरण, बंदरगाहों का विस्तार और समर्पित फ्रेट कॉरिडोर-इन सभी ने निर्माण, लॉजिस्टिक्स तथा सहायक क्षेत्रों में नई जान फूंक दी है।
वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं आजकल एक मूडी किशोर की तरह व्यवहार कर रही हैं-अनिश्चित, अप्रत्याशित और जरा-सी बात पर बाधित होने वाली। ऐसे अस्थिर माहौल में भारत का घरेलू पूंजीगत व्यय चक्र अर्थव्यवस्था के एक समझदार वयस्क की तरह स्थिरता प्रदान कर रहा है।
विनिर्माण क्षेत्र ने इस तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो और फार्मा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के बूते विनिर्माण के सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। 2 लाख करोड़ से अधिक की उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं ने कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है और वैश्विक आपूर्ति शृंखला के विविधीकरण से भारत को अनुकूल लाभ मिल रहा है। कारखानों में चहल-पहल अब केवल मंत्री-निरीक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि वहां वास्तविक उत्पादन लगातार जारी है। क्षमता उपयोग 74 प्रतिशत से ऊपर है और कमोडिटी (वस्तु) की कीमतों में नरमी ने उद्योगों को काफी राहत दी है।
इतना ही नहीं,जीएसटी सुधारों का प्रभाव भी दिख रहा है। जीएसटी को अर्थव्यवस्था के लिए ‘घातक’ बताने वाले आलोचक अब असहज महसूस कर रहे हैं, क्योंकि आवश्यक और व्यापक उपभोग की वस्तुओं पर जीएसटी दरों में की गई कटौतियों ने महंगाई के दबाव के बावजूद उपभोग को बढ़ावा दिया है। अभी मासिक जीएसटी संग्रह औसतन 1.6-1.7 लाख करोड़ पर स्थिर है। चुनिंदा वस्तुओं पर दरों में कमी ने अनुपालन में वृद्धि, कर-आधार का विस्तार किया है और उपभोक्ता विश्वास को सुधारा है। यानी कम कर स्लैब, अधिक कर संग्रह के समीकरण ने आलोचकों को आश्चर्यचकित किया है।
इस तिमाही के मजबूत जीडीपी आंकड़े वार्षिक वृद्धि दर को और ऊपर ले जाने की क्षमता रखते हैं। उद्योग और सेवा क्षेत्र, दोनों में गतिशीलता बनी हुई है और सरकारी पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे पूरे वर्ष की आर्थिक वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत से 7.2 प्रतिशत के दायरे में रहने का अनुमान है। वैश्विक मानकों के अनुसार, यह प्रदर्शन न केवल अच्छा है, बल्कि असाधारण माना जा सकता है।
अमेरिकी टैरिफ नीतियों के बीच आर्थिक मजबूती भारत के लिए रणनीतिक रूप से भी फायदेमंद है। मजबूत घरेलू अर्थव्यस्था भारत को व्यापार वार्ताओं में आत्मविश्वास देती है। मजबूत विनिर्माण भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखला का भरोसेमंद विकल्प बनाता है, जिसकी प्रशंसा अमेरिका भी करता है। वहीं, सशक्त कर संग्रह यह सुनिश्चित करता है कि भारत टैरिफ में रियायत मांगने वाला कमजोर पक्ष नहीं बनेगा।
जिन आलोचकों ने भारत की अर्थव्यवस्था की ‘शोकसभा’ समय से पहले ही आयोजित कर दी थी, उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि ‘मरी हुई अर्थव्यवस्था’ आखिर कैसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था में बदल गई? शायद अर्थव्यवस्था ने उनकी नकारात्मक रिपोर्ट पर ध्यान ही नहीं दिया।
कुल मिलाकर, इस तिमाही की जीडीपी हर केवल विकास नहीं, बल्कि आर्थिक परिपक्वता भी दर्शाती है। इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश ने रीढ़ को मजबूत किया, विनिर्माण वृद्धि ने नई ऊर्जा भरी, जीएसटी सुधारों ने प्रवाह बेहतर किया और भू-राजनीतिक संतुलन ने पूरी व्यवस्था को स्थिर रखा। भारत की अर्थव्यवस्था सिर्फ जीवित नहीं है। यह दौड़ रही है, खिंचाव कर रही है और कभी-कभी तेज दौड़ भी लगा रही है।

















