भारत में ईसाइयों की एक प्रमुख प्रतिनिधि और केन्द्रीय मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री, राजकुमारी अमृत कौर ने नेहरू जी को 9 अक्टूबर 1952 को एक पत्र के द्वारा बिहार और मध्यप्रदेश में भारतीय और विदेशी ईसाई मिशनों और मिशनरियों के प्रति भेदभाव बरतने की शिकायत की थी। राजकुमारी जी ‘आल इंडिया कॉन्फ्रेंस ऑफ क्रिस्चियन असोशिएशन’ के पहले अध्यक्ष राजा सर हरनाम सिंह की बेटी थीं। हरनाम सिंह कपूरथला के राजा महाराजा जगजीत सिंह के चाचा थे। राजकुमारी विश्व के विभिन्न ईसाई मिशनरी संगठनों में सक्रिय थीं इस कारण उन्हें ‘डेम ऑफ़ ग्रेस ऑफ़ दि आर्डर ऑफ़ सेंट जॉन ऑफ़ जेरूसलम’ की उपाधि प्राप्त थी।
राजकुमारी जी 1947 से 1957 तक, समय-समय पर अन्य मंत्रालय भी सँभालने के साथ, स्वास्थ्य मंत्री रहीं। भारतीय ईसाई तथा विदेशी मिशनरी अपनी कोई भी मांग नेहरूजी तक पहुंचाने के लिए उनके माध्यम का उपयोग करते थे। 1952 में की गई शिकायत के अतिरिक्त उन्होंने 1955 में उत्तर प्रदेश में मेरठ में ईसाइयों को धमकाए जाने की शिकायत की। इस पर नेहरूजी ने राजकुमारी जी के दो पत्र मेरठ के मजिस्ट्रेट को कार्यवाही के लिए प्रेषित किये थे।
नेहरू का 1952 में लिखा गया पत्र
1952 में राजकुमारी जी द्वारा उपरोक्त शिकायत किये जाने पर नेहरू जी ने मुख्यमंत्रियों को आदेश और ज्ञान देने के लिए लगभग पाक्षिक तौर पर लिखे जाने वाले पत्रों में से एक, 17 अक्टूबर 1952 को लिखे, पत्र में इस प्रकार आदेश दिया, “मुझे विदेशी और भारतीय, दोनों ईसाई मिशनों और मिशनरियों से उनके प्रति कुछ राज्यों से भेदभाव पूर्ण व्यवहार की शिकायत मिली है। यह सुनने में आया है कि यदाकदा उनके प्रति कई तरह का उत्पीड़न भी किया जाता है। मुझे उम्मीद है कि आपकी सरकार इस तरह का भेदभाव और उत्पीड़न नहीं हो इस पर विशेष ध्यान देगी। मुझे मालूम है कि अभी तक ईसाई मिशनों और मिशनरियों के विरुद्ध अतीत के पूर्वाग्रह का दुष्प्रभाव अवशेष है।
मिशनरियों का ही किया बचाव
अतीत में, उनमें सुदूर से कई, दक्षिण को छोड़कर, जहाँ वे मूल निवासी थे, विदेशी ताकत का प्रतिनिधित्व करते थे और कभी-कभी कमोबेश उसके एजेंट की तरह भी काम करते थे। मुझे मालूम है कि उनमें से कुछ ने उत्तर-पूर्व में अलगाववादी और विघटनकारी आंदोलनों को प्रोत्साहित किया था। वह चरण समाप्त हो गया है। यदि अभी भी कोई विदेशी या भारतीय व्यक्ति उस तरह का बर्ताव करता है तो निश्चित ही हमें उसके खिलाफ़ माकूल कदम उठाना चाहिए। किन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए भारत में बड़ी संख्या में ईसाईयत के अनुयाई हैं और दक्षिण भारत में 2000 वर्ष पूर्व ईसाइयों का आगमन हुआ था। यह अन्य मतों (रिलीजन्स) की तरह ही भारतीय परिदृश्य का अंग है।
हमारी धार्मिक निष्पक्षता और अल्पसंख्यकों के संरक्षण की नीति भेदभावपूर्ण व्यवहार और उत्पीड़न से प्रभावित या दूषित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने निस्संदेह सामाजिक क्षेत्र में भारत की बड़ी सेवा की है और अभी भी कर रहे हैं। अक्सर उनमें से अनेकों ने जनजाति इलाकों में वहां के लोगों के लिए अपना जीवन समर्पित किया है। मेरी लालसा है कि ऐसे भारतीय हों जो जनजातीय समुदाय की इस तरह सेवा करने के इच्छुक हों। मुझे पता है कि ऐसे कुछ भारतीय हैं जो अब ऐसा काम कर रहे हैं किन्तु मेरी इच्छा है कि अधिक लोग इस तरह का काम करें। यह ध्यान देने की बात है कि ईसाई समुदाय अधिकांशतः गरीब है और आर्थिक रूप से कहीं कहीं पिछड़े और दलित वर्गों के समकक्ष है।
मतांतरण के पक्ष में हूं : नेहरू
“हम अपने संविधान के द्वारा न केवल सबको अपना-अपना रिलिजन मानने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं बल्कि सबको अपने रिलिजन के प्रचार की भी छूट देते हैं। व्यक्तिगत रूप से में मतांतरण किए जाने को उचित नहीं मानता हूं और यह भारत के इस मामले में जियो और जीने दो के दृष्टीकोण से मेल नहीं खाता। किन्तु में दूसरे लोगों के आड़े नहीं आना चाहता यदि उनका मतांतरण का काम अन्यथा आपत्तिजनक नहीं है। विशेषकर में किसी के भी द्वारा, चाहे वह मिशनरी हो या कोई ओर, ऐसी किसी भी यथार्थ में की गई किसी भी प्रकार की सेवा के पक्ष में हूँ। एक प्रश्न उठता है कि हमें किस सीमा तक केवल ईसाईयत के प्रचार के लिए आने वाले विदेशियों को बढावा देना चाहिए। अक्सर ये विदेशी मिशनरी विदेशों में असभ्य बुतपरस्त लोगों के मतांतरण के निमित्त धन जुटाते हैं। में नहीं चाहता कि ऐसा कोई यहां आए जो मुझे असभ्य बुतपरस्त के रूप में देखता हो। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि मुझे किसी के द्वारा बुतपरस्त कहे जाने पर आपत्ति है। किंतु में किसी ऐसे विदेशी का आना पसंद नहीं करूंगा जो हमें तिरस्कार की नजर से देखता हो या जो अपने देश में हमारे बारे में अप-प्रचार करता हो। किन्तु यदि कोई विदेशी यहाँ समाज सेवा के लिए आना चाहता हो तो में उसका स्वागत करूंगा।”
नेहरू की तानाशाही
ध्यान से पढ़ने पर हमें नेहरू जी का तानाशाही तरीके से अपना विचार थोपना स्पष्ट समझ आयेगा। पाठक आकलन करें कि पत्र की भाषा सुस्पष्ट है या गोलमाल? पत्र के कतिपय वाक्यांश ध्यान देने योग्य हैं। जैसे अतीत के कृत्य और विदेशी ताकत का प्रतिनिधित्व, कमोबेश उनके एजेंट की तरह काम करना, उत्तर-पूर्व में अलगाववादी और विघटनकारी आंदोलनों को प्रोत्साहन, कभी-कभी राजनैतिक दृष्टि से आपत्तिजनक तरीक़े से व्यवहार, वह चरण समाप्त हो गया आदि। क्या भारत के स्वतंत्र होते ही इन मिशनरियों का ह्रदय परिवर्तन हो गया? क्या मिशनरियों द्वारा अधिकतर निःस्वार्थ सेवा की जा रही थी? नेहरूजी ने विदेशी मिशनरियों द्वारा विदेशों में असभ्य बुतपरस्त लोगों के मतांतरण के निमित्त धन जुटाने की बात कही। कौन नहीं जानता कि असभ्य बुतपरस्तों के निमित्त धन भेजने के पीछे एक मात्र कारण साम्राज्यवाद था। जो विदेशी मिशनरी यहाँ समाजसेवा के लिए आना चाहता है, उसका स्वागत किया जाना उचित होता।
MP के मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल ने लिया था मिशनरियों के खिलाफ एक्शन
मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री, दूरदर्शी पंडित रविशंकर शुक्ल (1877-1956) ने, नेहरुवादी धारा के विपरीत जाते हुए मिशनरियों की आपत्तिजनक गतिविधियों की जांच के लिए 1954 में नियोगी समिति का गठन किया था। समिति की रिपोर्ट 1956 में प्रकाशित हुई। इसका निष्कर्ष था कि मिशनरियों द्वारा विदेशी धन के बल पर चिकित्सा और शिक्षा की आड़ में तथा प्रलोभन के द्वारा वनांचल में रहने वाले सीधे-साधे और ग़रीब लोगों का मतांतरण किया जा रहा है और इन गतिविधियों पर रोक के लिए कई क़ानूनी उपाय सुझाए। तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट में सुझाये उपायों को संविधान की 25वीं धारा के विरुद्ध माना तथा समिति को राज्य की पहल मानकर इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। समिति की सिफारिशों के पालन में कुछ राज्यों में ‘जबरन और कपट-पूर्वक मतांतरण’ के विरुद्ध कानून बने जिससे समिति की जाँच के निष्कर्ष के आधार पर कई सैद्धांतिक ढांचा बना।
वर्तमान में 2010 में बने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में 2020 में भारी फ़ेरबदल किये गए। वर्तमान में जो बिल संसद में प्रस्तुत किया गया है उसका उद्देश्य 2020 में संशोधित किये गए कानून की कमियों को दूर करना है। अद्यतन प्रस्तावित (अपडेटेड) नियमों का उद्देश्य विदेशों से प्राप्त धन के परिग्रहण पर निगाह रखना और उसके मतांतरण, प्रचार साधनों के द्वारा गलत बयान करके राष्ट्र विरोधी राय बनाने (नैरेटिव बिल्डिंग) और कुछ समूहों या व्यक्तियों को गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए धन पहुँचाने आदि को रोकना है।
किसी भी देश में गैर सरकारी संगठनों को धन भेजने वाले देश या प्रतिष्ठान सामान्यतया किसी निहित उद्देश्य, या स्वार्थ के लिए करते ऐसा हैं। कई बार विदेशी धन प्राप्त करने वाले गैर सरकारी संगठन विकास परियोजनाओं में रूकावट उत्पन्न करते हैं, जिससे राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पाद में एक वर्ष में 2 से 3 प्रतिशत तक की हानि हो सकती है।
मिशनरियों के संगठनों को विदेशों से प्राप्त होने वाले धन की मात्रा बढ़ती जा रही है। इस समय प्रत्यक्ष ईसाई संस्थानों को कुल विदेशी अंशदान का लगभग 30 प्रतिशत प्राप्त हो रहा है। प्रारम्भ से ही नेहरू जी द्वारा मिशनरियों को अपनी गतिविधियों के लिए छूट दिए जाने से यह स्थिति उत्पन्न हुई है। गैर सरकारी संगठनों द्वारा मतांतरण अथवा अन्य गतिविधियां राष्ट्र की सुरक्षा के लिए ख़तरनाक हो सकती हैं और विकास को बाधित करती हैं।
(राजस्थान के सरकारी कॉलेजों में 35 वर्ष तक अध्यापन का कार्य । 18 वर्ष अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना की केन्द्रीय कार्यकारिणी में विभिन्न पदों पर रहे । कट्टरपंथी (Radical) इस्लाम विशेष रुचि का विषय।)











