असगर वजाहत का एक नाटक है, “जिसने लाहौर नहीं वेखया” अर्थात जिसने लाहौर नहीं देखा, उसने कुछ नहीं देखा! अगर पूछा जाए तो सच में, जिसने लाहौर नहीं देखा, उसने कुछ नहीं देखा। दरअसल, लाहौर को पाकिस्तान में मिलाने के लिए जो छल और हिन्दू एवं सिखों पर जो सुनियोजित अत्याचार किए गए, वह अगर किसी ने नहीं देखे, तो वास्तव में कुछ नहीं देखा।
यह कहानी है उस छल की, जिसमें वह शहर रहा, जहां पर हिन्दू और सिख समुदाय का जलवा था या कहें बहुमत था। जहां के लोगों को अंत तक यही कहा गया कि “लाहौर तो भारत में ही जाएगा” और इस कारण वे न ही वहाँ से भाग सके और न ही अपना कुछ इंतजाम कर सके। आज इस लेख में हम लाहौर की कुछ अनसुनी भयावह कहानियों को पढ़ते हैं।
ए. एन. बाली अपनी पुस्तक विभाजन विभीषिका – जो बताना जरूरी है में लाहौर के पाकिस्तान में जाने के पूरे छल को लिखते हैं। वे लिखते हैं कि लाहौर पंजाब का सबसे विवादित क्षेत्र बन गया था।
हिन्दू इस शहर से कैसे दावा छोड़ देते, क्योंकि यह उनके सबसे पुराने शहरों में से एक था और जिसकी स्थापना किसी और ने नहीं बल्कि स्वयं श्रीहरिविष्णु के अवतार श्रीराम के पुत्र लव के नाम पर हुई थी। वर्ष 1947 तक करों और भू राजस्व में 80 प्रतिशत का योदान दिया है और उनके नियंत्रण में 70% व्यापार था तथा 85% भू संपत्ति उनके समुदाय की थी। मगर वहीं मुसलमानों का दावा 1941 की जनगणना के आधार पर था, जिसके अनुसार वे जनसंख्या का 52% थे, जबकि हिन्दू और सिख केवल 48% ही थे, मगर हिंदुओं ने यह दावा किया कि ये संख्या गलत आंकड़ों के आधार पर थी।
हिन्दू बहुल लाहौर को परिसीमन से मुस्लिम बाहुल्य बनाया
ए. एन. बाली लिखते हैं कि कैसे लाहौर को परिसीमन के माध्यम से मुसलमान बाहुल्य बनाया गया था। और उसके बाद भी हिन्दू और सिखों की संख्या वहाँ पर लगभग बराबर ही थी। इसलिए लाहौर को लेकर सबसे अधिक भ्रम रहा था। ए. एन. बाली लिखते हैं कि कॉंग्रेस नेताओं की ओर से जो वक्तव्य आ रहे थे कि लाहौर की संभावना भारत में ही रहने की अधिक है और यह कि “लोग अपना घर छोड़कर बाहर न आएं, वे लोग लाहौर के विवश अल्पसंख्यक हिन्दू और सिखों के जान-माल को होने वाले नुकसान के लिए तथा उन पर होने वाले तमाम असहनीय एवं अकथनीय अत्याचारों के लिए जिम्मेदार थे, क्योंकि इनके कारण समृद्ध एवं अमीर हिन्दू और सिख लाहौर छोड़कर नहीं गए और वहीं पर रुके रहे और इन अत्याचारों का शिकार हुए। उनके दिलों में बस यही ख्याल आता था कि एक दिन जब लाहौर उनका हो जाएगा, तो वह भी अपने हमलावरों के बराबर हो जाएंगे।“
मगर दुर्भाग्य से ऐसा दिन नहीं आया।
हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार के लिए गुंडों को मुफ़्त खाना
एक बहुत ही खतरनाक बात वे लिखते हैं कि कैसे मुसलमान गुंडों को बारूद खान इलाके में मुफ़्त में हर समय खाना खिलाया जाता था। वे लिखते हैं कि “पहले यह एक हिन्दू या सिख को मारने पर 100 रुपए दिए जाते थे, बाद में यह घटकर 50 रुपए रह गया था और उसके उपरांत केवल हर इमारत के अनुसार 25 रुपए कर दिया था। पुलिस इन इलाकों में या तो जा नहीं सकती थी या फिर जाती नहीं थी। वह लाहौर के इन कुख्यात बदमाशों को गिरफ्तार करने के लिए नहीं जाती थीं, जो उनकी अपनी सूची में ही थे और जो शहर के अन्य इलाकों से भगोड़े थे।“
इतना ही नहीं सीआईडी के हिन्दू और सिख अधिकारियों की निजी ज़िंदगी भी खतरे में थी, क्योंकि उनके वरिष्ठ अधिकारी मुसलमान थे और उन्होनें कई मोहल्लों के लिए ऐसे अधिकारियों की सूची बना ली थी। हालांकि बदमाशों की सूची देने की हिम्मत किसी के पास नहीं थी।
लाहौर के कुछ प्रतिष्ठित हिंदुओं और सिखों की हत्याएं
लाहौर के प्रतिष्ठित हिंदुओं और सिखों की हत्याएं चुन-चुन कर और कई तरीकों से की जाने लगी थीं। जो भी प्रतिष्ठित लोग थे, या तो उनकी सूची बनाई गई थी या फिर अधिकारियों से उनकी सूची निकलवाई गई थी, इस पर विस्तार से चर्चा हो सकती है। मगर डॉक्टर्स, सेठ, वकील, पत्रकार आदि लोगों को चुन-चुन कर निशाना बनाया जाने लगा। जेल रोड पर रहने वाले असिस्टेंट डायरेक्टर ऑफ इंडस्ट्रीज़ श्री वीर भान ने दो ट्रक किराये पर लेकर अपना सामान चढ़वाया, मगर उनका मुसलमान ड्राइवर मजदूरों के रूप में गुंडों को ले आया। जैसे ही सामान चढ़ा वैसे ही उनकी चाकू मारकर हत्या कर दी गई और ट्रक कहाँ गया, यह पता भी नहीं चला। हालांकि इस हमले में उनकी बेटियाँ बच गई थीं।
करमबीर और संडे टाइम्स के संपादक श्री अर्जुन देव को ब्रैडलाफ़ हॉल के पास स्थित उनके घर के सामने चाकू मारकर मार डाल गया। डॉ. श्याम सुंदर ठाकुर को मोची गेट के बाहर बगीचे में चाकू घोंपकर मारा गया और उन्ही मुस्लिमों ने मारा जो उनके मोहल्ले में रहते थे और उनसे परिचित थे। श्री अर्जन देव बगाई, जो लाहौर उच्च न्यायालय में एक सफल वकील थे, उन्हें रेलवे स्टेशन जाते समय तांगे में चाकू घोंपकर मार डाल गया।
कांग्रेस के विरोधी और मुसलमानों का समर्थन करने वालों की भी हत्या
प्रोफेसर बृज नारायण मुसलमानों के दोस्त हुआ करते थे और उनके लेख कांग्रेस विरोधी बहुत चाव से पढ़ते थे। बाली लिखते हैं कि उन्हें यह विश्वास था कि उनके साथ तो लाहौर के मुसलमान कुछ गलत कर ही नहीं सकते थे। मगर उनके घर पर भी भीड़ ने हमला किया तो वे लोगों के समझाने के बाद भी भीड़ के सामने गए और उनसे कहा कि उनकी संपत्ति पर हमला न करें, मगर भीड़ ने न सुनी और उन्हें वहीं पर मारकर उनकी लाइब्रेरी में आग लगा दी।
इसी प्रकार पाकिस्तान का खुलकर समर्थन करने वाले खेलों के महान संरक्षक एस. बी. चरणजीत सिंह को उनके बंगले में मार डाला गया।
हालांकि, इससे पहले से ही हिन्दू और सिखों का पलायन लाहौर से शुरू हो चुका था, जैसे कि कई बाहरी मजदूर, कुछ परिवारों की लड़कियां और महिलाएं हिंसा की आशंका के चलते लाहौर छोड़कर जा चुके थे, मगर चूंकि बार-बार यह आश्वासन मिलता रहा कि शायद लाहौर भारत में रहे, काफी संख्या में हिन्दू अपना घर छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं थे और यही कारण था कि लाहौर को हिन्दू विहीन करने के लिए ऐसे सभी हिंदुओं पर लगातार हमले किए गए।
जब यह पता चला कि लाहौर तो पाकिस्तान में जाएगा, तो वे लोग ठगे से रह गए, जो कॉंग्रेस के नेताओं के बयानों के आधार पर लाहौर में ही रह गए थे। अब उन्हें जिन्ना के बयान पर विश्वास हुआ और उन्हें लगा कि शायद कुछ ज्यादा कर ही देना होगा, मुसलमान बहुल पाकिस्तान और लाहौर में, मगर वे रहेंगे तो अपनी ही देहरी पर, मगर उन्हें नहीं पता था कि अगला ही दिन उनके लिए क्या ला रहा था।
15 अगस्त से ही शुरू हो गई थी अत्याचारों की श्रृंखला
15 अगस्त से ही उनके साथ अत्याचारों की वह कहानी शुरू हुई, जिसकी कहीं पर थाह ही नहीं थी। ऐसे-ऐसे मुसलमान हिन्दू और सिख लड़कियों के अपहरण और बलात्कार में शामिल हुए, जिनके विषय में सोचा तक नहीं गया था। बाली लिखते हैं कि शेखपुरा में डॉ सलीमी, जिनके यहाँ हिन्दू और मुसलमान सभी इलाज के लिए जाते थे, उन्होनें ही सिविल स्टेशन हिन्दू और सिख शरीफ घरानों की महिलाओं के अपहरण में अग्रणी भूमिका निभाई थी।
बलोच सेना ने तो हर हद ही पार कर दी थी। 22 अगस्त 1947 को कर्फ्यू लगाया गया और यह घोषणा की गई कि बिना डीएम की अनुमति के कोई भी व्यक्ति शेखपुरा छोड़कर बाहर नहीं जाएगा, यह आदेश केवल शेखपुरा के ही लोगों के लिए था, मगर हकीकत में कई बाहरी लोगों को चिचोंकी-मलियन नहर के पुल से वापस कर दिया गया था और उन्हें लाहौर जाने ही नहीं दिया गया था, जबकि वे शेखपुरा से वापस आ ही नहीं रहे थे। वह शहर दरअसल, हिंदुओं और सिखों के लिए एक चूहेदानी के रूप में बदल गया था। इन चार दिनों में बलोच सेना को खुली छूट दे दी गई थी। वे शहर में किसी भी हिन्दू और सिख के घर जा सकते थे और उनके ही घरों में दूसरे तल पर रुक सकते थे। वे सेना के ट्रक लेकर कहीं भी जा सकते थे और किसी भी हिन्दू और सिख महिला को उसके घर के बाहर से उठाया सकते थे और किसी भी सम्मानजनक हिन्दू या सिख के घर में रात के लिए रुक सकते थे, फिर चाहे गृह स्वामी कितना भी विरोध क्यों न करता रहे।
25 अगस्त 1947 की सुबह कुछ गुंडों द्वारा हिंदुओं और सिखों की कुछ दुकानों को लूटकर आग के हवाले कर दिया गया। जिन अभागे हिन्दू या सिख ने वहाँ से भागने का प्रयास किया, उन्हें बलोच सेना ने अपनी गोलियों से भूनकर मार डाला।
हिन्दू-सिखों का चुन-चुनकर नरसंहार
हिन्दू और सिखों को चुनचुन कर मारा गया। 25 अगस्त को 72 घंटों के कर्फ्यू की घोषणा की गई, और उसी दौरान “बलोच आर्मी पुलिस की एक टुकड़ी, जिसका नेतृत्व सब इंस्पेक्टर सजावल खान कर रहा था, उसके साथ शेखपुरा सिखों के राम गढ़ क्षेत्र में घुसी। उस क्षेत्र के हर हिन्दू और सिख को मार डाला गया। उसी दिन शाम को मोहल्ला खंडपुरिया पर हमला किया गया। उस हमले में वहाँ से मुश्किल से दस लोग बच सके थे और उसके उपरांत तो यह हत्याकांड आम बात हो गई। बलोच आर्मी पुलिस की टुकड़ी और खून के प्यासे गुंडों के साथ किसी भी हिन्दू और सिख बाहुल्य मोहल्ले में प्रवेश करती और फिर हत्याकांड शुरू हो जाता। पहले सेना और पुलिस दरवाजों, खिड़कियों, वेनटिलटर और घर की छतों से गोलियां चलाती और फिर दरवाजा खोलकर भीड़ घर में घुसती। घायलों को मारती और महिलाओं एवं लड़कियों का बलात्कार करने के उपरांत उन्हें मार डालती, यदि कोई जिंदा मिलता तो उसे या तो मार डाल जाता या फिर सिर तन से जुदा कर दिया जाता।
फिर भी इस हमले से कुछ लोग बचने में सफल हुए और फिर वे लोग तीसरे दिन सरदार आत्मा सिंह के कारखाने में इकट्ठा हुए। वे पिछले दो-तीन दिनों से भूखे और प्यासे थे और जब वे लोग वहाँ पर नल से पानी पी रहे थे, तो देखते ही देखते उस कारखाने को भी बलोच सेना, पुलिस और गुंडों की भीड़ ने घेर लिया। उनसे कहा गया कि जो कुछ पैसा और गहने तथा हथियार भी उनके पास है, वह सब उन्हें दे दें। जब उनसे सब कुछ छीन लिया गया तो बलोचों ने उन्हें निर्मम तरीके से मारना शुरू कर दिया। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और फिर मारा गया। उसे तरह के बर्बर और जंगली कार्य शेखपुरा शाहर के सिविल लाइन के एक हिस्से में किए गए!”
लाहौर के हिन्दू और सिखों ने विभाजन की विभीषिका का जो दंश झेला, उसे सहज न ही बताया जा सकता है और न ही महसूस किया जा सकता है। वह इतना खौफनाक है कि पढ़ते हुए भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
अत्याचार इस सीमा तक था कि हिन्दू और सिखों के घरों में आग तो लगती थी, मगर पड़ोसी उसे बुझा नहीं सकते थे, क्योंकि बुझाने वालों को पुलिस की गोली का शिकार होना पड़ता था और साथ ही अगर जलने से बचने के लिए लोग अपने घरों से बाहर निलते थे तो उन्हें भी गोली का शिकार होना पड़ता था।
यह सच ही है कि जिसने लाहौर नहीं वेखया, उसने कुछ भी नहीं देखा, क्योंकि लाहौर को जिस प्रकार हिन्दू विहीन किया गया, उसकी तुलना इतिहास में कहीं और मिले!
(स्रोत- विभाजन विभीषिका – जो बताना जरूरी है (सुरुचि प्रकाशन))

















