वर्ष 1986 में जब मिखाइल गोर्बाचेव भारत आए तो मैं उन स्कूली छात्रों की टोली में शामिल था, जिसे दिल्ली में हवाई अड्डे से लौटते काफिले के स्वागत के लिए धौला कुआं के पास खड़ा किया गया था। हमारे हाथ में तिरंगे थे और सामने से गुजरती हुई सोवियत राष्ट्रपति की मोटरकेड। उस दिन बालमन में जो कौतूहल, उत्साह और हल्के से संकोच का मिला-जुला अनुभव था उसने पहली बार यह बोध कराया कि भारतीयता का आत्मविश्वास और रूसी मित्रता कितनी व्यापक पृष्ठभूमि पर टिके हैं।
यह उस उम्र की बात है जब हम वैश्विक कूटनीति जैसे शब्दों का अर्थ भी नहीं समझते थे। यह वैश्विक लामबंदियों की जोड़-तोड़ ही थी कि हमारी पीढ़ी के भारतीयों की जैसे-जैसे उम्र बढ़ी उन्होंने रूस को घटते-टूटते और मित्रों को छिटकते हुए देखा।
यह इतिहास की करवटों की कहानी है। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद लगा कि यह पुरानी मित्रता कहीं धुंधला न जाए। लेकिन 2000 में भारत रूस ने औपचारिक रूप से रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की और 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी की मास्को यात्रा ने रिश्ते को नया आधार दिया। उसी प्रतिनिधिमंडल में उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी शामिल थे। आज जब 2025 में वही नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री और वही व्लादिमीर पुतिन रूस के राष्ट्रपति के रूप में दिल्ली में आमने सामने बैठते हैं तो पिछले 24 वर्षों का पूरा कूटनीतिक सिलसिला एक धागे में पिरोया हुआ दिखता है।

बीच के वर्षों में कई उतार चढ़ाव भी आए। 2014 में क्रीमिया संकट और पश्चिमी प्रतिबंधों ने रूस को नई भू राजनीतिक स्थिति में ला खड़ा किया। 2022 में यूक्रेन संघर्ष ने इस दबाव को और बढ़ाया। इसी कालखंड में भारत ने एक कठिन संतुलन साधा। एक ओर उसने संयुक्त राष्ट्र मंचों पर युद्ध को समाप्त करने और संवाद का रास्ता अपनाने की अपील की दूसरी ओर ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए रूस से तेल आयात बढ़ाया। यह वही रणनीतिक स्वायत्तता है जिसकी जड़ें गहराई में हैं और जो केवल आज की राजनीति का परिणाम नहीं बल्कि दशकों की सोच का निष्कर्ष है।
दूसरी तरफ पश्चिमी दुनिया विशेषकर यूरोप ने इस स्वायत्तता को सहजता से स्वीकार नहीं किया। वर्ष 2025 में जब पुतिन की भारत यात्रा की तैयारियां हो रही थीं उसी समय ब्रिटेन फ्रांस और जर्मनी के राजनयिकों ने एक संयुक्त लेख लिख कर रूस के साथ भारत के समीकरण पर प्रश्न उठाए। यह केवल असहमति नहीं थी बल्कि भारतीय संप्रभुता और कूटनीतिक शिष्टाचार की सीमा रेखा को लांघने का प्रयास था। भारत किसी भी सैन्य गुट का सदस्य नहीं है न 20 वीं सदी के शीत युद्ध शिविर का और न 21वीं सदी की नई धुरी राजनीति का। ऐसे में बार-बार उसे अमेरिकी या यूरोपीय लामबंदी की दिशा में घसीटना और प्रतिबंधों की भट्ठी में उसकी स्वतंत्र नीति को झोंकने की कोशिश करना मूलतः अनुचित कृत्य है।
विदेश मंत्री एस जयशंकर की प्रत्यक्ष टिप्पणियां इसी संदर्भ में समझनी चाहिए। 2023-2024 के विभिन्न मंचों पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत अब केवल सुनने की स्थिति में नहीं बल्कि उत्तर देने की स्थिति में है। पश्चिम को यह स्वीकार करना होगा कि न तो वह आज दुनिया का अकेला केंद्र है और न बाकी विश्व उसकी शर्तों पर चलने के लिए बाध्य है। यह स्वर भावुक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक ऐसे देश का तर्कसंगत निष्कर्ष है, जो ऊर्जा बाजार से लेकर तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक शासन तंत्र तक हर जगह एक आवश्यक कड़ी बन चुका है।
फिर भी यह तस्वीर एकतरफा नहीं है। रूस के लिए भी भारत महज सहानुभूति रखने वाला मित्र नहीं बल्कि एशिया अफ्रीका और वैश्विक दक्षिण तक पहुंच का विश्वसनीय सेतु है। पश्चिमी प्रतिबंधों के दौर में भारत ने रूस के लिए स्थिर ऊर्जा बाजार की भूमिका निभाई तो रूस ने भी भारत के लिए रक्षा तकनीक अंतरिक्ष सहयोग और ऊर्जा विविधीकरण का भरोसेमंद आधार बनाया। 2024 में मास्को में हुआ 22वां शिखर सम्मेलन और अब 2025 की यह दिल्ली बैठक इसी निरंतरता का प्रमाण हैं।
भविष्य के समीकरण यहीं से निकलते हैं। एक ओर रूस चीन की निकटता और पश्चिम द्वारा रूस को अलग-थलग करने की कोशिशें हैं दूसरी ओर भारत की आवश्यकता है कि वह अमेरिका यूरोप, जापान और रूस सभी के साथ तकनीक निवेश और सुरक्षा के बहुस्तरीय रिश्ते बनाए रखे। भारत-रूस संबंध यदि इस नए वैश्विक परिदृश्य में सफल रहना चाहते हैं तो उन्हें भावनात्मक इतिहास के साथ-साथ आर्थिक विविधीकरण, हरित ऊर्जा, आर्कटिक सहयोग और आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में ठोस प्रगति दिखानी होगी।
धौला कुआं की चौड़ी सड़क पर खड़े सरकारी स्कूल के उन छात्रों के लिए गोर्बाचेव की वह काली कार केवल एक रोमांच था आज वही स्मृति यह समझने का आधार बन गई है कि कूटनीति अंततः समाजों और देशों की भौगोलिक परिधियों से परे संस्कृतियों के मेलजोल और राष्ट्रीय गरिमा की रक्षा का भी सेतु-साधन है। यह मानने का कोई कारण नहीं कि पुतिन की वर्तमान भारत यात्रा इसी गरिमा की अगली कड़ी है। यदि दोनों देश अपने पारस्परिक हितों को स्पष्ट रखते हुए विश्व व्यवस्था को बहुध्रुवीय और अधिक न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में साथ चलते रहें तो भारत रूस मित्रता आने वाले वर्षों में भी वैश्विक स्थिरता का एक महत्वपूर्ण आधार बनी रह सकती है।
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