वंदे मातरम: राष्ट्र की अस्मिता का अमर स्वर और 150 वर्ष की यात्रा
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वंदे मातरम: राष्ट्र की अस्मिता का अमर स्वर और 150 वर्ष की यात्रा

ब्रिटिश शासन इस गीत को असाधारण सावधानी और भय से देखता था। बंगाल के गवर्नर-जनरल लॉर्ड कर्ज़न की रिपोर्ट में वंदे मातरम को “सबसे खतरनाक राष्ट्रवादी प्रतीक” लिखा गया

Written byडॉ विश्वास चौहानडॉ विश्वास चौहान
Dec 8, 2025, 11:29 am IST
in भारत

वर्ष 2025 में जब राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं, भारत के प्रधानमंत्री इसे “राष्ट्र की ऊर्जा, चेतना और संकल्प का मंत्र” बताते हुए वर्षभर के उत्सव की घोषणा करते हैं, तो दूसरी ओर संसद में “वंदे मातरम्” जैसे उद्गारों को सीमित करने की बहस भी सामने आती है।

इसी बीच जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के प्रमुख मौलाना महमूद मदनी का यह कथन सामने आया, “वंदे मातरम् पढ़ने वाले लोग मुर्दा क़ौम होते हैं” जोकि केवल विवादास्पद बयान नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, संविधानिक मान्यताओं और न्यायपालिका द्वारा स्थापित राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा, सभी के प्रति घोर असम्मान भी है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51A(a) हर नागरिक पर यह कर्तव्य डालता है कि वह राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और सभी राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करेगा। राष्ट्रगीत इसी संवैधानिक सम्मान का अविभाज्य हिस्सा है।

एक गीत जिसने इतिहास रचा : रचना और प्रकाशन 

वंदे मातरम् का जन्म 1875 में हुआ, जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे पहली बार संस्कृत-प्रधान बांग्ला में लिखा। बाद में यह गीत उपन्यास आनंदमठ के 1882 के संस्करण में प्रकाशित हुआ। इस गीत की प्रारंभिक पंक्तियाँ—
“वंदे मातरम्, सुजलां सुफलाम्, शस्य श्यामलाम्…”

भारतभूमि को देवी, शक्ति और मातृस्वरूप में देखने वाली भारतीय परंपरा का सांस्कृतिक घोष है।

ब्रिटिश शासन इस गीत को असाधारण सावधानी और भय से देखता था। बंगाल के गवर्नर-जनरल लॉर्ड कर्ज़न की रिपोर्टों (Government Intelligence Records, 1905–1907) में Vande Mataram slogans को “सबसे खतरनाक राष्ट्रवादी प्रतीक” लिखा गया। यह स्पष्ट प्रमाण है कि एक साहित्यिक रचना औपनिवेशिक सत्ता की पहली चिंता बन चुकी थी।

राष्ट्रीय मंच पर उदय और स्वतंत्रता संग्राम का युद्धघोष

इस गीत ने राष्ट्रीय मंच पर पहली बार तब दस्तक दी जब 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे अपने स्वर में प्रस्तुत किया। यही क्षण था जब वंदे मातरम् मात्र साहित्यिक रचना नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का अमर गीत बन गया।

बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक से लेकर 1947 तक स्वतंत्रता आंदोलन का लगभग कोई ऐसा चरण नहीं था जहाँ यह गीत न गूँजा हो। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, खुदीराम बोस, अशफाकउल्ला खाँ, बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारियों ने जेलों, अदालतों और फाँसी की काल-कोठरियों में इसे अंतिम प्रण की तरह दोहराया। महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, श्री अरबिंदो, भीकाजी कामा जैसे नेताओं ने इसे राष्ट्रीय एकता का घोष माना।

1905 का बंग-भंग और वंदे मातरम् की ऐतिहासिक विजय

1905 में लॉर्ड कर्ज़न ने “प्रशासनिक सुविधा” का बहाना बनाकर बंगाल को दो हिस्सों, पूर्वी (Muslim-majority) और पश्चिमी (Hindu-majority), में बाँटने की घोषणा की। भारतीय जनता ने इसे तुरंत ब्रिटिश साम्राज्यवाद की “Divide and Rule” नीति के रूप में पहचान लिया।

स्वदेशी आंदोलन, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों का उदय और राजनीतिक सभाओं के केन्द्र में वंदे मातरम् था। वही गीत जिसने हिंदू, मुस्लिम और सिख युवाओं को एकजुट कर दिया। रवींद्रनाथ टैगोर ने राखी-बंधन का अनूठा कार्यक्रम आयोजित कर बंगाल की एकता का संदेश दिया।

इतिहास में यह दुर्लभ क्षण था जब एक साहित्यिक गीत राजनीतिक प्रतिरोध की रीढ़ बन गया। अंततः 1911 में दिल्ली दरबार में बंग-भंग रद्द करना पड़ा। यह वंदे मातरम् की भावना की विजय थी।

1937 का विवाद : पाठ पर बहस और राजनीतिक दबाव

1911 में बंग भंग की असफलता से सबक अंग्रेजों ने भारत मे फूट डालने का जो जेहादी बीज बोया ,उसने सबसे पहला प्रहार उसी वंदे मातरम पर किया जिसके कारण अंग्रेज बंग भंग नही कर पाए थे , फलस्वरूप 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति के समक्ष यह प्रश्न उठाया गया कि गीत के बाद के पदों में लक्ष्मी, दुर्गा और शक्ति के रूपकों के कारण मुस्लिम समाज के कुछ वर्गों में आपत्ति है। जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने समाधान निकाला कि राष्ट्रीय कार्यक्रमों में केवल पहली दो पंक्तियाँ ही गाई जाएँगी, क्योंकि वे पूर्णतः राष्ट्रवादी और गैर-धार्मिक थीं।

यह निर्णय तत्कालीन तनाव कम करने में सहायक हुआ, परंतु बाद की राजनीति में इसे “वंदे मातरम् के टुकड़े करना” कहा गया। प्रधानमंत्री जी ने अब 2025 में इस निर्णय को “विभाजनकारी सोच” की शुरुआत बताते हुए कहा कि “जो मानसिकता तब गीत में दरार डाल रही थी, वही आज भी चुनौती है।”

संविधान सभा में वंदे मातरम् (1950) : विधिक सम्मान

स्वतंत्रता के बाद प्रश्न उठा कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का दर्जा किसे मिले। 24 January 1950 को संविधान सभा के अंतिम सत्र में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने यह ऐतिहासिक घोषणा की—

“जन-गण-मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का स्थान दिया जाता है। वंदे मातरम् के पहले दो अन्तरे , जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महान भूमिका निभाई, राष्ट्रगान के समान ही सम्मानित होंगी।”
(Constituent Assembly Debates, Vol. XII, pp. 404–406, 1950)

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद सहित सभी प्रमुख मुस्लिम सदस्यों ने प्रारंभिक दो अंतरों को पूर्णतः राष्ट्रवादी माना। संविधान सभा में किसी ने यह नहीं कहा कि वंदे मातरम् “धर्म विशेष” का गीत है। यह तथ्य ऐतिहासिक रूप से निर्णायक है।

न्यायपालिका का दृष्टिकोण : सम्मान अनिवार्य, गायन वैकल्पिक

भारतीय न्यायपालिका ने भी कई अवसरों पर वंदे मातरम् की गरिमा को स्पष्ट किया।

(1) Bijoe Emmanuel v. State of Kerala (1986) 3 SCC 615
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान अनिवार्य है, परंतु किसी नागरिक को गायन के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों राष्ट्रीय विरासत का हिस्सा हैं।

(2) Aruna Roy v. Union of India (2002) 7 SCC 368
कोर्ट ने कहा कि वंदे मातरम् शिक्षा, प्रेरणा और राष्ट्रनिर्माण का स्रोत है। किसी धार्मिक आपत्ति के आधार पर इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

(3) Madras High Court Full Bench (2017)
न्यायालय ने वंदे मातरम् को “राष्ट्रीय धरोहर” बताया और कहा कि इसके सम्मान से राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है।

(4) Delhi High Court, Union Government Affidavit (2022)
केंद्र सरकार ने आधिकारिक रूप से कहा कि “Vande Mataram and Jana Gana Mana stand on the same footing and deserve equal respect.”

इन सभी निर्णयों का सार यही है कि वंदे मातरम् भारत की संवैधानिक चेतना का सम्मानित प्रतीक है।

वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, राष्ट्र की आत्मा है

हम कह सकते है कि वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, राष्ट्रीय आत्मा है, क्योंकि वंदे मातरम् का 150 वर्षीय इतिहास बताता है कि कोई गीत केवल शब्द नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मकथा भी होता है। 1905 की एकता, 1937 की बहस, 1950 की संवैधानिक स्वीकृति, 1986 और 2002 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और 2025 की राजनीतिक बहसें, ये सभी दर्शाती हैं कि यह गीत सदैव सक्रिय रहा, कभी प्रश्न के रूप में, कभी उत्तर के रूप में। इन 150 वर्षों में भारत बहुत बदल गया, परंतु इस गीत की ध्वनि आज भी उतनी ही तीव्र है। यह केवल स्वाधीनता का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, कर्तव्य और संकल्प का भी आह्वान है। आज आवश्यकता है कि भारत के नागरिक, मजहब या रिलीजन, भाषा, जाति, विचार की सीमाओं से ऊपर, एक स्वर में कहें कि वंदे मातरम् का सम्मान राष्ट्र की मर्यादा है। यह गीत भारत की मिट्टी से जुड़ने, राष्ट्र की शुचिता समझने और मातृभूमि के प्रति समर्पण का पाठ पढ़ाता है।

जो राष्ट्र अपनी मातृभूमि को “माँ” मानता है, वह कभी पराजित नहीं होता। और जो राष्ट्रगीत मातृभूमि की वंदना करता है, वह किसी राजनीतिक दल या समूह का नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीय नागरिकों की शाश्वत आत्मा का आध्यत्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा राष्ट्रीय प्रतीक भी है।

वंदे मातरम्, इसलिए नहीं कि यह गीत है; वंदे मातरम् इसलिए कि यह भारत मां की आराधना है।

Topics: पीएम मोदीराष्ट्रगीतवंदे मातरमपाञ्चजन्य विशेषसंसद में बहसवंदे मातरम पर बहसवंदे मातरम पर विवादराष्ट्रगीत पर विवाद
डॉ विश्वास चौहान
डॉ विश्वास चौहान
संयोजक जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र , मध्यप्रदेश ( प्राध्यापक विधि , शासकीय स्टेट लॉ कॉलेज भोपाल, मध्य प्रदेश ) [Read more]
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