संचार साथी: साइबर अपराध का भयावह सच और डिजिटल सुरक्षा का सबसे बड़ा कवच
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संचार साथी: साइबर अपराध का भयावह सच और डिजिटल सुरक्षा का सबसे बड़ा कवच

संचार साथी एप जनहित में एक स्वाभाविक और आवश्यक कदम। इसे नागरिकों को स्पैम कॉल, फर्जी नंबर, साइबर धोखाधड़ी, बैंक फ्रॉड और अंतरराष्ट्रीय जालसाजी से बचाने के लिए तैयार किया गया है

Written byडॉ विश्वास चौहानडॉ विश्वास चौहान
Dec 3, 2025, 10:58 pm IST
inभारत

भारत आज अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सन्दर्भों में उस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ तकनीक केवल सुविधा का साधन नहीं रही, बल्कि सुशासन, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था और नागरिक सुरक्षा का आधार बन चुकी है। स्मार्टफोन के प्रसार से लेकर UPI के वैश्विक विस्तार तक, डिजिटल रूप से विकसित भारत एक ऐसी डिजिटल क्रांति का प्रतीक है जिसने नागरिक को सशक्त, त्वरित और सुरक्षित सेवाएँ प्रदान की हैं।

इसी डिजिटल अवसंरचना के क्रम में संचार साथी ऐप का आगमन जनहित में एक स्वाभाविक और आवश्यक कदम था, एक ऐसा मंच जो नागरिकों को स्पैम कॉल, फर्जी नंबर, साइबर धोखाधड़ी, बैंक फ्रॉड और अंतरराष्ट्रीय जालसाजी से बचाने हेतु तैयार किया गया है, किंतु विडंबना यह है कि इसका वास्तविक उद्देश्य समझने से पहले ही यह राजनीतिक दुष्प्रचार और भ्रमों का केंद्र बना दिया गया। सरकार ने भी स्पष्ट कर दिया है कि इसे इंस्टॉल करने (प्री इंस्टालेशन) की शर्त जरूरी नहीं है।

संचार साथी एप की संरचना और निजता-सुरक्षा

संचार साथी की संरचना और उद्देश्य को जानना आवश्यक है। इस एप की कार्य प्रणाली पूरी तरह उपयोगकर्ता नियंत्रित है। कोई भी डेटा तभी ऐप तक पहुंचेगा जब नागरिक स्वयं किसी संदिग्ध नंबर, स्पैम कॉल या धोखाधड़ी वाले संदेश को रिपोर्ट करेगा। यह शिकायत आधारित मॉडल पारदर्शिता और निजता के सिद्धांतों पर आधारित है, जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 और संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत भारत के नागरिकों को प्रदत्त निजता अधिकार का पूर्ण सम्मान करता है।

साइबर अपराध की भयावह पृष्ठभूमि

संचार साथी ऐप की प्रासंगिकता तब और स्पष्ट होती है जब हम देश में पिछले एक दशक के साइबर अपराधों की भयावहता को देखते हैं। 2015 के पश्चात मोबाइल बैंकिंग और UPI की लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही अपराधियों ने तकनीक का दुरुपयोग कर नए फ्रॉड मॉडल विकसित किए।

राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर 2022 में 10,29,026 मामले दर्ज हुए, जिनमें अधिकांश वित्तीय धोखाधड़ी से संबंधित थे। 2023 में इन अपराधों में 31 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। 2024 में भारत ने साइबर अपराधों में कुल 22,845 करोड़ रुपये गंवाए, जो 2023 की तुलना में तीन गुना से अधिक है। पिछले दस वर्षों में साइबर वित्तीय धोखाधड़ी का अनुमानित नुकसान 31,000 से 35,000 करोड़ रुपये के बीच आँका गया है, यह राशि कई मुस्लिम बहुल पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान या अफगानिस्तान के वार्षिक बजट से भी अधिक है।

अपराध के अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय नेटवर्क

साइबर लूटपाट के संकट को और गंभीर बनाता है अपराध का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप। सुरक्षा एजेंसियों ने पिछले वर्षों में पाकिस्तान, बांग्लादेश, खाड़ी देशों और दक्षिण पूर्व एशिया में सक्रिय कॉल सेंटर आधारित गिरोहों के व्यापक नेटवर्क का पता लगाया, जो स्पूफिंग तकनीक (spoofing technology) के माध्यम से भारतीय नंबर जैसा दिखा कर OTP, KYC, बैंकिंग लिंकिंग और कस्टमर केयर के बहाने ठगी करते हैं।

भारत के भीतर भी इस्लामिक अपराधियों का अड्डा बने मेवात (हरियाणा, राजस्थान), झारखंड का जामताड़ा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली NCR का बेल्ट और देश के कुछ अन्य क्षेत्र संगठित साइबर अपराध मॉड्यूल के रूप में लंबे समय से सक्रिय हैं। जहां पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए दबिश देना भी चुनौती बन जाता है ।

इन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ये अपराध एक मजहबी गैंग आधारित और तकनीक समीक्रित नेटवर्क का परिणाम प्रतीत हैं, जिनमें अवैध कॉल सेंटर, डिजिटल नकली पहचान, मनी म्यूल और फर्जी बैंक लिंकिंग की बड़ी श्रृंखला शामिल है।

संचार साथी की तकनीकी उपयोगिता और वैश्विक तुलना

वर्तमान समय में संचार साथी ऐप की भूमिका केवल उपयोगी नहीं, बल्कि अत्यधिक अनिवार्य हो जाती है। यह ऐप उपयोगकर्ता को बताता है कि उसके नाम पर कितने सिम सक्रिय हैं, संदिग्ध नंबरों की रिपोर्ट दर्ज करने देता है, और लाखों नागरिकों द्वारा रिपोर्ट किए गए धोखाधड़ी नंबरों की सामूहिक सूची के आधार पर वास्तविक समय में चेतावनी देता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक देशों में इसी प्रकार की सेवाएँ Truecaller, Whoscall और Nomorobo जैसी कंपनियाँ वर्षों से प्रदान कर रही हैं। भारत का मॉडल इससे भी अधिक पारदर्शी है, क्योंकि यह न तो किसी व्यावसायिक कंपनी द्वारा चलाया जाता है और न ही विज्ञापनों, निजी डेटा या प्रोफाइलिंग पर आधारित है। यह पूरी तरह सरकारी, सुरक्षित और सार्वजनिक हित पर आधारित केंद्रित प्रणाली है।

तकनीकी सुधारों पर राजनीतिक अविश्वास की परंपरा

संचार साथी एप को लेकर भी दुष्प्रचर किए गए। यह राजनीतिक दुष्प्रचार हमारे राष्ट्रीय इतिहास की उस प्रवृत्ति की याद दिलाता है जब हर तकनीकी सुधार को प्रारंभ में संदेह और विरोध के घेरे में रखा गया।

  • आधार को कभी निगरानी तंत्र कहा गया था, जबकि आज वह करोड़ों नागरिकों को DBT के माध्यम से सीधा लाभ पहुँचाने की रीढ़ है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने K.S. Puttaswamy बनाम भारत संघ में आधार की संवैधानिक वैधता को मान्यता दी।
  • GST को वन नेशन, वन ट्रबल कहा गया था, पर आज वही कर संरचना देश की सबसे संगठित और पारदर्शी प्रणाली है।
  • स्वच्छ भारत अभियान का उपहास उड़ाया गया था, किंतु UNICEF की रिपोर्ट बताती है कि देश में खुले में शौच की प्रथा में 450 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
  • उज्ज्वला योजना को राजनीतिक जुमला कहा गया, पर 9 करोड़ महिलाओं को धुएँ से मुक्ति दिलाने वाला वही कार्यक्रम था जिसने ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य और जीवन स्तर में क्रांतिकारी सुधार किया।
  • कोविन प्लेटफार्म को डेटा चोरी का माध्यम कहा गया, पर वही विश्व का सबसे सफल वैक्सीन प्रबंधन मॉडल बना।

तकनीक बनाम राजनीति, मूल्यांकन का वास्तविक पैमाना

इतिहास का यह क्रम बताता है कि भारत में तकनीक का विरोध अक्सर तथ्यों पर नहीं, बल्कि राजनीतिक भावनाओं पर आधारित होता है। संचार साथी भी उसी अनुचित विरासत का नया अध्याय है। यह ऐप नागरिकों की सुरक्षा और आर्थिक संरक्षण के लिए बनाया गया है, पर इसे निगरानी और जासूसी के बहाने राजनीतिक विवाद की आग में झोंक दिया गया।

सुरक्षित इंटरनेट और डिजिटल नागरिक अधिकार

संचार साथी का वास्तविक संदेश यह है कि तकनीक का उपयोग नागरिकों की सुरक्षा, पारदर्शिता और आर्थिक संरक्षण के लिए भी हो सकता है। डिजिटल भारत का अर्थ केवल इंटरनेट सुविधाएँ नहीं, बल्कि सुरक्षित इंटरनेट है। नागरिक तभी सशक्त होगा जब उसे यह भरोसा होगा कि उसके फोन पर आने वाली फर्जी कॉल, बैंक धोखाधड़ी और विदेशी हैकरों के जाल से उसकी रक्षा के लिए एक मजबूत, सुरक्षित और विश्वसनीय तंत्र मौजूद है।

निर्णय का आधार, अफवाह नहीं, तथ्य

आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज अफवाहों नहीं, सत्य के आधार पर निर्णय करे। संचार साथी न तो किसी पर निगरानी करता है और न किसी की निजता पर चोट पहुँचाता है। यह सुरक्षा का वह डिजिटल कवच है जो बढ़ते साइबर अपराधों के बीच नागरिक को सतर्क, सक्षम और संरक्षित बनाता है। देश के लिए यह ऐप केवल तकनीकी परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल विश्वास का स्रोत है।

ये भी पढ़ें संचार साथी ऐप मोबाइल में प्री-इंस्टॉल अनिवार्य नहीं, जानिए क्या है नया नियम.?

Topics: संचार साथी एप अपडेटसाइबर अपराधडिजिटल सुरक्षासंचार साथीसंचार साथी एप
डॉ विश्वास चौहान
डॉ विश्वास चौहान
संयोजक जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र , मध्यप्रदेश ( प्राध्यापक विधि , शासकीय स्टेट लॉ कॉलेज भोपाल, मध्य प्रदेश ) [Read more]
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