खुदीराम बोस : 'मेरे पास भारत मां को देने के लिए कुछ नहीं था, सिवाए मेरे प्राणों के', सोने-चांदी की डिबियों में सहेजी गई भस्म
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खुदीराम बोस : ‘मेरे पास भारत मां को देने के लिए कुछ नहीं था, सिवाए मेरे प्राणों के’

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कदाचित् खुदीराम राम बोस ऐसी हुतात्मा थे, जिनके अंतिम संस्कार के उपरांत एक चुटकी भस्म को प्राप्त करने के लिए हजारों स्वाधीनता के दीवाने टूट पड़े थे। यह भस्म सोने-चांदी और हाथी दांत की डिबियों में सहेजी गई थी। खुदीराम बोस की भस्म के ताबीज़ बनाकर बालकों और तरुणों को पहनाया गया था ताकि क्रांतिकारियों की सेना तैयार हो सके।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Dec 3, 2025, 05:23 pm IST
inभारत, विश्लेषण

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कदाचित् खुदीराम राम बोस ऐसी हुतात्मा थे, जिनके अंतिम संस्कार के उपरांत एक चुटकी भस्म को प्राप्त करने के लिए हजारों स्वाधीनता के दीवाने टूट पड़े थे। यह भस्म सोने-चांदी और हाथी दांत की डिबियों में सहेजी गई थी। खुदीराम बोस की भस्म के ताबीज़ बनाकर बालकों और तरुणों को पहनाया गया था ताकि क्रांतिकारियों की सेना तैयार हो सके। खुदीराम बोस क्रांति के अग्रदूत थे,जिनके पुरुषार्थ से न केवल बंगाल,वरन् भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वाधीनता की अग्नि ज्वालाएँ प्रज्ज्वलित हुईं।

‘एक बार विदाई दे माँ,
घूरे आसी..
हंसी हंसी पोरबो फांसी देखबे भारतवासी! “-

ओ माँ!मुझे एक बार विदा दो तनिक घूमकर आता हूँ..
हँसता हँसता फांसी के फंदे में चढ़ जाऊंगा और सारे भारतवासी देखेंगे!

महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस की ये पंक्तियाँ जहाँ एक मार्मिक संवेदना उत्पन्न करती हैं तो दूसरी और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध स्वदेश के लिए सर्वस्व अर्पित करने की प्रेरणा देती हैं। सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के उपरांत महारथी खुदीराम बोस ही प्रथम क्रांतिकारी थे जो सबसे कम उम्र 18 वर्ष 8 माह 8 दिन में फाँसी पर चढ़ा दिये गये थे। ये वही बंगाल है, जहाँ से राष्ट्रवाद की भावना प्रबल हुई थी, परंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बंगाल बिखर रहा है। इसलिए स्वाधीनता के अमृत काल में महान् क्रांतिकारी खुदीराम बोस के बलिदान की गाथा जन-जन तक पहुंचना ही चाहिए ताकि बंगाल अपनी विरासत को अक्षुण्ण रख सके।

स्वाधीनता संग्राम के क्रांतिकारी रणबांकुरे कौन थे?

वे लोग कोई और ही थे। कौन थे? जिन्हें केवल एक प्रेम, देश प्रेम था। जिन्हें केवल एक धुन राष्ट्र धुन थी और जिनका केवल एक लक्ष्य था भारत मां की स्वतंत्रता! फिर चाहे स्वयं का शरीर बेड़ियों में जकड़ कर कोड़ों से क्यों ने उधेड़ दिया, जाए लेकिन तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें गाते हुए फांसी पर झूल जाने वाले कई नामों को हम जानते भी नहीं। जिन्हें जानते हैं उन्हें भी प्रकारांतर से कभी आतंकवादी, लुटेरा डकैत और फासिस्ट कहा गया। इसी कड़ी में खुदीराम बोस भी आते हैं। 18 साल 8 माह 8 दिन की उम्र में फांसी का फंदा चूम लिया। इस उम्र में जब आज के अधिकतर नौजवान यारी-दोस्ती और मौज-मस्ती को ही जीवन का ध्येय और पर्याय समझ रहे होते हैं तब एक समय में इसी उम्र का नौजवान हाथ में गीता लेकर भारत माता की जय बोलते हुए फांसी के फंदे पर झूल गया।

अंग्रेजों की दासता स्वीकार नहीं

पं. बंगाल के मिदनापुर जिले में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस धर्मात्मा कायस्थ थे। उनकी पत्नी लक्ष्मीप्रिया देवी भी एक हाथ से धैर्य-धर्म को थामें रखतीं और दूसरे हाथ में स्वदेश प्रेम की डोर लिए चलतीं। यह शुभ संस्कारों का ही प्रभाव था कि 3 दिसम्बर 1889 के दिन जब बोस दंपती के घर बालक ने जन्म लिया तो उसका नाम रखा खुदीराम अर्थात् शुभ लक्षणों वाला यह बालक खुद्दारी की परिभाषा सार्थक करने वाला था। तो फिर वह अंग्रेजों की दासता को कैसे स्वीकार कर लेता।

जैसे शुक्ल पक्ष का चंद्रमा एक-एक दिन करके बढ़ता रहता है, यह बालक भी एक-एक वर्ष बढ़ता गया और हर उम्र के साथ उसमें देश को स्वतंत्र करा लेने की जिजीविषा बढ़ती गई। यह जिजीविषा एक दिन इतनी बढ़ी की नौवीं कक्षा के छात्र खुदीराम बोस ने पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े। परंतु यह केवल प्रारंभ था, बालक बोस को अभी लंबी दूरी तय करनी थी।

खुदीराम बोस में क्रांतिकारी बदलाव

स्वदेशी आंदोलन जारी तो था, लेकिन बोस के विचारों में केवल इतना होना ही पर्याप्त नहीं था। यह आवश्यक था कि समग्र जनता में चेतना आए और वह घरों से निकल पड़ें और ब्रिटिश शासन को जड़ से उखाड़ फेकें। स्वदेशी आंदोलन में अनेक ऐसे ही क्रांतिकारियों का साथ बोस को मिला और मां के सपूतों का कारवां बढ़ चला। सन् 1906 में अंग्रेज सिपाही को मुक्का मारने के साथ ही खुदीराम बोस में क्रांतिकारी बदलाव आया। मिदनापुर में एक औद्योगिक तथा कृषि प्रदर्शनी लगी हुई थी। खुदीराम ने इस प्रदर्शनी में आए लोगों को सोनार बांग्ला जिसे कि सत्येंद्रनाथ ने लिखा था। यह बेहद ज्वलंत विषय पर लिखा गया पत्रक था। एक पुलिस वाले ने उन्हें यह पत्र बांटते देखा तो पकड़ने दौड़ा। तेजतर्रार खुदीराम बोस ने सिपाही के मुंह पर घूंसा मार दिया और पत्रक को लेकर वहां से आसानी से भाग निकले। प्रकरण पर अभियोग चलाया गया, लेकिन गवाह न मिलने पर बोस निर्दोष छूट गए।

सन् 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन कर दिया गया।लॉर्ड कर्जन इसे अंजाम देने वाला था, जिसके विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए थे। इन क्रांतिकारियों के दमन के लिए मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को भेजा गया। किंग्सफोर्ड के दमनकारी तरीके बेहद क्रूर थे। उसने कई निर्दोषों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। अंग्रेजी सरकार ने इस दरिंदे को बदले में सम्मान देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश बना दिया। युगांतर समिति ने बदले की योजना बनाई।

किंग्सफोर्ड को सजा देने के लिए आगे आए

बंगाल में क्रांतिकारियों की एक समिति युगांतर इस पूरी दमनकारी नीति से रोष में थी। बोस पहले ही इससे जुड़ चुके थे। एक गुप्त बैठक में तय हुआ कि किंग्सफोर्ड को उसके किए की सजा तो मिलनी ही चाहिये और तब दो नाम क्रमशः प्रफुल्लकुमार चाकी और खुदीराम बोस के तय हुए। खुदीराम को एक बम और पिस्तौल दी गई। प्रफुल्लकुमार को भी एक पिस्तौल दी गई। अब दोनों को अपना लक्ष्य साधने के लिए रवाना किया गया। किंग्सफोर्ड को भी अपने विरुद्ध हो रही इस योजना की जानकारी कहीं से मिल गई थी। दोनों ही क्रांतिकारी बेहद सतर्क थे,सबसे पहले दोनों ने किंग्स फोर्ड के बंगले की निगरानी की। बघ्घी और घोड़े की पहचान की, खुदीराम तो किंग्स फोर्ड के कार्यालय तक भी हो आए थे। अगले दिन योजना के अनुसार दोनों अपनी-अपनी जगह तैनात हो गए। 30 अप्रैल 1908. को दोनों क्रांतिकारी किंग्सफोर्ड के बंगले के बाहर जमे हुए थे। रात साढ़े आठ बजे क्लब से एक बघ्घी निकली, खुदीराम बोस उसके पीछे भागने लगे।

रास्ते में अंधेरा था, उन्होंने निशाना साधकर आगे जा रही बघ्घी पर बम फेंक दिया। यह सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद हिंदुस्तान में किया गया पहले बम विस्फोट के तौर पर देखा जा सकता है। इतिहासकारों के अनुसार , इसकी आवाज तब तीन मील दूर तक सुनी गई और फिर कुछ दिनों बाद तो लंदन तक में सुनी गई। लेकिन सौभाग्य से उस दिन किंग्सफोर्ड बच गया क्योंकि उसकी बघ्घी क्लब से कुछ देर बाद निकली थी।

नंगे पैर 24 मील चले

खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार दोनों ही रातों – रात नंगे पैर 24 मील भागते चले गए और वैनी रेलवे स्टेशन जाकर रुके। अंग्रेज अफसर भी चुप नहीं बैठे थे। वैनी स्टेशन पर उन्हें घेर लिया गया। प्रफुल्लकुमार चाकी ने युगांतर का कोई भेद न खुल जाए इसलिए खुद को गोली मारकर वीरगति का मुख चूमा। इधर खुदीराम बोस गिरफ्तार कर लिए गए। कई बार अंग्रेजों को छकाने वाले खुदीराम को अब अंग्रेज नहीं छोड़ने वाले थे, इसलिए 11 अगस्त 1908 को उन्हें फांसी दे दी गई। खुदीराम बोस की वीरगति का असर भारत के नौजवानों पर ऐसा पड़ा कि बोस क्रांतिकारी वीरता के पर्याय बन गए। उनका नाम लेकर नौजवान स्वाधीनता की कसमें खाने लगे और बंगाल में लड़के खुदीराम नाम लिखी किनारी की धोती पहनने लगे थे। यह धोती स्वदेशी और स्वतंत्रता आंदोलन का पर्याय बन गई।

सबसे कम उम्र के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जिन्हें फांसी दी गई

आज जो हम तिरंगा लहरा रहे हैं और उसकी छांव के नीचे खड़े हैं, इसके भगवा रंग में वीर अमर बलिदानी खुदीराम बोस का लहू शामिल है। सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में सबसे कम 13 वर्ष की उम्र में महान् वीरांगना मैना बाई का बलिदान हुआ था। यद्यपि 1872 में कूका आंदोलन में 68 सेनानी शहीद हुए थे जिसमें 13 वर्ष का बालक जिसका 50 वां नं वह लुधियाना के डिप्टी कमिश्नर कावन की दाढ़ी पकड़ ली थी और तब तक नहीं छोड़ी जब तक उसके हाथ नहीं काट दिए गए फिर उसका बलिदान हुआ, यह उस समय तक का सबसे कम उम्र में बलिदान था परंतु दुर्भाग्य है कि बड़े नामों के आगे इस बालक का नाम ज्ञात नहीं है जो शोध का विषय है तथापि अब 12 वर्षीय महारथी बाजी राऊत का नाम सबसे कम उम्र में बलिदान देने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में दर्ज है (सन् 1938)। उपरोक्तानुसार अज्ञात महारथी बालक को तोप के मुंह बांधकर उड़ाया गया था और महारथी बाजी राऊत गोलियों से भून दिया गया था। अतः फांसी की सजा के दृष्टिकोण से, महारथी खुदीराम बोस सबसे कम उम्र के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जिन्हें फांसी दी गई थी।

फांसी के समय खुदीराम बोस के हाथ में गीता थी और चेहरे पर विलक्षण आभा के साथ मुस्कुराहट थी। उनके अंतिम उदगार न केवल मर्मस्पर्शी हैं,वरन् मातृभूमि के लिए सर्वस्व अर्पित कर देने की पराकाष्ठा के उच्चतम मानक हैं,
“मैं बहुत गरीब हूं,
मेरे पास भारत मां को देने के लिए कुछ नहीं था,
सिवाए मेरे प्राणों के,
जिसे आज मैं दे रहा हूं”…

Topics: रणबांकुरेआनंद सिंह राणाभारत मातागीताहुतात्माभारतीय स्वाधीनता संग्रामखुदीराम बोसक्रांति के अग्रदूतफांसी के फंदे
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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