क्या महात्मा ज्योतिबा फुले हिंदू धर्म विरोधी थे? मिशनरी, वामपंथी और सेक्युलर नैरेटिव का सच जानें
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क्या महात्मा ज्योतिबा फुले हिंदू धर्म विरोधी थे? मिशनरी, वामपंथी और सेक्युलर नैरेटिव का सच जानें

महात्मा ज्योतिबा फुले की पुण्यतिथि 28 नवम्बर पर सादर समर्पित

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Nov 28, 2025, 06:48 pm IST
inभारत
महात्मा ज्योतिबा फुले

महात्मा ज्योतिबा फुले

क्या महात्मा ज्योतिबा फुले हिंदू धर्म विरोधी थे? मिशनरी, वामपंथी और सेक्युलर नैरेटिव का सच जानें। इस लेख में चर्चा करेंगे कि कैसे फुले ने ईसाई या इस्लाम न अपनाकर हिंदू धर्म सुधारक के रूप में सामाजिक समरसता का सेतु बनाया।

पिछले कई दशकों से मिशनरियों, वामपंथियों, तथाकथित सेक्युलरों और अब जय भीम-जय मीम के कथित विद्वानों ने महात्मा ज्योतिबा फुले को हिंदू धर्म विरोधी बताया, लेकिन यह सच है क्या? यदि यह सच है तो ज्योतिबा फुले ने हिंदू धर्म क्यों नहीं छोड़ा? क्यों उन्होंने ईसाई, इस्लाम या अन्य मत स्वीकार नहीं किया? उत्तर स्पष्ट है कि ज्योतिबा फुले हिन्दू धर्म सुधारक थे। वे हिन्दू धर्म में आई विसंगतियों को दूर करना चाहते थे, इसलिए वे हिन्दू पुनरुद्धार के पुष्य नक्षत्र के रुप में शिरोधार्य किए जाते हैं।

आधुनिक भारत के महान् चिंतक, लेखक, समाज सेवक, सुधारक एवं वंचितों के मसीहा महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म 11अप्रैल सन् 1827 पुणे में हुआ।कोल्हापुर के पास ही एक पहाड़ी पर देवता ज्योतिबा का मंदिर है इन्हें जोतबा भी कहते हैं।यह हिन्दू धर्मावलंबियों का पवित्र तीर्थ है। वस्तुतः भगवान् शिव के तीनों स्वरूपों को ज्योतिबा (जोतिबा) देवता के नाम से अभिव्यक्त किया गया है इन्हें भैरव का पुनर्जन्म भी माना गया है।ये बहुत से मराठों के कुल देवता हैं। जिस दिन महात्मा फुले का जन्म हुआ उस दिन जोतबा देवता का उत्सव था इसलिए उनका नाम जोतिबा (ज्योतिबा) रखा गया। उनके पिता का नाम गोविंद राव फुले, माता का नाम विमला बाई एवं धर्मपत्नी का नाम सावित्री बाई फुले था।

महात्मा ज्योतिबा फुले (ज्योतिराव गोविंदराव फुले) 19वीं सदी के महान् समाज सेवक एवं सुधारक थे। उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज में प्रकारांतर से उत्पन्न की गईं विसंगतियों दूर करने के लिए सतत संघर्ष किया। ईसाइयों ने ज्योतिबा फुले को कन्वर्जन के लिए उकसाया और अपने सांचे में ढालने का प्रयास किया परंतु ईसाइयत उन्हें कभी प्रभावित न कर सकी क्योंकि हिंदुत्व उनका मूलाधार था।

धर्म के खिलाफ जेहाद पुकारने वाले ज्योतिबा के सारे कार्यों के पीछे एक आस्तिक्य बुद्धि थी। न उन्होंने हिन्दू धर्म त्याग की बात की और न धर्म परिवर्तन किया, न कराया। कुछ बातों में इस्लाम और ख्रिस्ती मिशनरियों के प्रभाव के कारण उनके धर्म का सेवा भाव उन्हें आकर्षित करता था। लेकिन इनमें से किसी भी धर्म को अपनाने की बात उन्होंने सोची ही नहीं थी।धर्म की नींव निकाल लेंगे तो जिस समाज के उत्थान के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वह समाज भहराकर गिर पड़ेगा इसे वे जानते थे।(भारतीय समाज क्रांति के जनक महात्मा जोतिबा फुले-डॉ. मु. ब. शहा, पृष्ठ क्रं. 102) इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म का परित्याग नहीं किया और ना ही किसी और को करने के लिए कहा।

कथित सेकुलरों ने रचा षड्यंत्र

यह विडंबना है कि तथाकथित सेक्युलरों वामियों,और मिशनरियों ने षड्यंत्र पूर्वक सदैव ज्योतिबा फुले को ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद के विरोधक रूप में प्रचारित किया, परंतु हम देख सकते हैं कि वे इनमें से किसी के अंध विरोधक नहीं थे। उनका मूल उद्देश्य था सनातन में आई विकृति को स्वच्छ करना। जोतिबा फुले सामाजिक समरसता के पक्षधर थे, वे कहते थे कि ब्राह्मण हो या शूद्र सब एक जैसे हैं-

“मांग आर्यामध्ये पाहूँ जाता खूण। एक आत्म जाण। दोघां मध्ये।।
दोघे ही सरीखी सर्व खाती पिती। इच्छा ती भोगती सार खेच।
सर्व ज्ञाना मध्ये आत्म ज्ञान श्रेष्ठ। कोणी नाही भ्रष्ट। जोनीम्हणे।। “
(महात्मा फुले, समग्र वांग्मय, पृष्ठ 457) अर्थात महार, मांग और आर्यों में कोई भेद नहीं। दोनों में एक ही आत्मा का निवास है। दोनों समान ढंग से खाते-पीते हैं। उनकी इच्छाएं भी समान होती हैं। जोति यह कहता है कि सारे ज्ञान में आत्मज्ञान श्रेष्ठ हैं तथा कोई भी भ्रष्ट नहीं है, इसे जान लो।

वस्तुतः जोतिबा शोषक वृत्ति के विरोधी थे ना कि ब्राह्मण जाति के, जब उनसे राष्ट्र की एकता की बात उठी तो उन्होंने निःसंकोच यह कहा कि देश सुधार के लिए हम ब्राह्मणों को और मांगों को एक पंक्ति में बिठाएंगे। सदाशिव बल्लाल गोवंडे नाम का जोतिबा के एक ब्राह्मण साथी थे, दोनों की गहरी दोस्ती थी। अछूतों के लिए पहली पाठशाला सन् 1848 में जब पुणे की बुधवार पेठ में खुली तब पाठशाला खोलने के लिए जोतिबा के मित्र सखाराम यशवंत परांजपे और सदाशिवराव गोवंडे का योगदान उल्लेखनीय है। आठ – नौ माह चलने के बाद स्कूल बंद हो गया तब जूनागंज पेठ में सदाशिवराव गोवंडे जी की जगह पर ही स्कूल शुरु हुआ। यहां भी विष्णुपंत शत्तै नाम के एक ब्राह्मण ने शिक्षा देना आरंभ किया था।

देखा जाए तो ज्योतिबा के विरोध में यदि कुछ ब्राह्मण थे तो दूसरी ओर उनके इस क्रांतिकारी कार्य में श्री बापूराव मांडे, पंडित मोरेश्वर शास्त्री, मोरो विट्ठल बालवेकर, सखाराम बलवंत परांजपे, बाबाजी, मानाजी डेनाले आदि ब्राह्मण समुदाय से ही आते हैं।

ज्योतिबा फुले और नारी शिक्षा

अछूतोद्धार नारी-शिक्षा, विधवा विवाह और किसानों के हित के लिए ज्योतिबा ने उल्लेखनीय कार्य किया है। आधुनिक भारत की उन्नीसवीं शताब्दी में जोतिबा की धर्मपत्नी सावित्रीबाई फुले ने प्रथम भारतीय महिला शिक्षक के साथ प्रथम बालिका स्कूल की नींव रखी थी, तो वहीं ज्योतिबा ने विधवाओं के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।

बाल हत्या प्रतिबंधक गृह सन् 1863 में शुरू किया गया, यहां कोई भी विधवा आकर जचगी करा सकती थी, उसका नाम गुप्त रखा जाता था। ज्योतिबा ने इस बाल हत्या प्रतिबंधक गृह के बड़े-बड़े पोस्टर्स सर्वत्र लगवाए थे। उन पर लिखा था “विधवाओं! यहाँ अनाम रहकर निर्विघ्न जचगी कीजिए। अपना बच्चा साथ ले जाएं या यहीं रखें आपकी मर्जी पर निर्भर रहेगा। अन्यथा अनाथ आश्रम उन बच्चों की देखभाल करेगा ही।”

सत्यशोधक समाज भारतीय सामाजिक क्रांति के लिये प्रयास करनेवाली अग्रणी संस्था बनी। महात्मा फुले ने लोकमान्य तिलक ,आगरकर, न्या. रानाडे, दयानंद सरस्वती के साथ देश की राजनीति और समाज को नवीन दिशा दी।

विधवा विवाह की वकालत की

24 सितंबर 1873 को उन्होंने सत्य शोधक समाज की स्थापना की । वह इस संस्था के पहले कार्यकारी व्यवस्थापक तथा कोषपाल भी थे। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य समाज में वंचितों और दलितों पर पर हो रहे शोषण तथा दुर्व्यवहार पर अंकुश लगाना था । महात्मा फुले ने अपने जीवन में हमेशा बड़ी ही प्रबलता तथा तीव्रता से विधवा विवाह की वकालत की। उन्होंने उच्च जाति की विधवाओं के लिए सन् 1854 में एक घर भी बनवाया था। अपने खुद के घर के दरवाजे सभी जाति और वर्गों के लोगों के लिए हमेशा खुले रखे।

‘गुलामगिरी’पुस्तक को लेकर गलत नैरेटिव खड़ा किया गया

ज्योतिबा फुले महान् लेखक थे, उन्होंने ‘गुलामगिरी’, ‘तृतीय रत्न ‘,’ छत्रपति शिवाजी ‘,’ किसान का कोड़ा ‘सहित कई पुस्तकें लिखीं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गुलामगिरी पुस्तक को जय भीम, जय मीम, मिशनरियों, वामपंथियों और तथाकथित सेकुलरों ने हिंदू धर्म के विरुद्ध एक घातक उपकरण के रूप में प्रयोग किया और कर रहे हैं, परंतु वे भूल जाते हैं, इस पुस्तक का मूल उद्देश्य क्या था ? वस्तुत: इस पुस्तक का मूल उद्देश्य था कि कलांतर में आर्य – अनार्य को लेकर हिंदू समाज में उत्पन्न सामाजिक विसंगतियों के उन्मूलन के लिए विमर्श स्थापित करना,ताकि सामाजिक न्याय का मार्ग प्रशस्त हो सके। यदि ऐसा ना होता तो महात्मा ज्योतिबा फुले,अपनी पुस्तक गुलामगिरी में हिंदू धर्म को छोड़ देने की बात करते, धर्मान्तरण के लिए कहते, और स्वयं भी धर्मांतरित हो जाते, परंतु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया, न ही लिखा और न ही कभी कहा। यही सब तथ्य सबसे बड़े प्रमाण हैं,कि महात्मा ज्योतिबा फुले हिंदू धर्म के विरोधी नहीं ,वरन सुधारक रक्षक थे।

सामाजिक समरसता का संदेश

जोतिबा फुले और सावित्री बाई फुले के कोई संतान नहीं थी इसलिए उन्होंने एक विधवा ब्राह्मण काशीबाई के बच्चे को गोद लेकर सामाजिक समरसता के उत्कृष्ट भाव साकार किया, जिसका नाम यशवंत राव रखा। यह बालक बड़ा होकर एक चिकित्सक बना और इसने भी अपने माता-पिता के समाज सेवा के कार्यों को आगे बढ़ाया। मानवता की भलाई के लिए किये गए ज्योतिबा के इन निस्वार्थ कार्यों के कारण मई 1888 में उस समय के एक और महान समाज सुधारक “राव बहादुर विट्ठलराव कृष्णाजी वान्देकर” ने उन्हें “महात्मा” की उपाधि प्रदान की।

हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए सदैव अडिग रहे

27 नवम्बर 1890 को उन्होंने अपने सभी प्रियजनों को बुलाया और कहा कि “अब मेरे जाने का समय आ गया है, मैंने जीवन में जिन जिन कार्यों को हाथ में लिया है उसे पूरा किया है, मेरी पत्नी सावित्री ने हरदम परछाईं की तरह मेरा साथ दिया है और मेरा पुत्र यशवंत अभी छोटा है और मैं इन दोनों को आपके हवाले करता हूँ ।” इतना कहते ही उनकी आँखों से आँसू आ गये और उनकी पत्नी ने उन्हें सम्भाला। 28 नवम्बर 1890 को महात्मा ज्योतिबा फुले ने देह त्याग दी और एक महान् विभूति ने इस दुनिया से अपनी अनंत यात्रा के लिए विदाई ले ली।

मध्य काल में संत कबीर की भक्ति आंदोलन में जो भूमिका थी, उसी प्रकार आधुनिक भारत के पुनर्जागरण में जोतिबा फुले की भूमिका दृष्टिगोचर होती है। जोतिबा फुले हिन्दू धर्म के रक्षणार्थ सदैव अडिग रहे, वे आधुनिक भारत के पुनर्जागरण के देदीप्यमान नक्षत्र एवं सामाजिक समरसता के सेतु थे और रहेंगे।

 

Topics: गुलामगिरी पुस्तकज्योतिबा फुले और हिंदू धर्महिंदू धर्मपाञ्चजन्य विशेषमहात्मा ज्योतिबा फुलेज्योतिबा फुले का परिचय
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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