अफज़ल से लेकर हिडमा तक : वामपंथियों का सीक्रेट ब्रेनवॉश मिशन, जानिए पर्दे के पीछे ‘लाल गैंग’ की खतरनाक प्लानिंग
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अफज़ल से लेकर हिडमा तक : वामपंथियों का सीक्रेट ब्रेनवॉश मिशन, जानिए पर्दे के पीछे ‘लाल गैंग’ की खतरनाक प्लानिंग

दिल्ली प्रदूषण के बीच छात्रों द्वारा “हर घर से हिडमा निकलेगा” जैसे नारे क्यों लगे? युवा किसके बहकावे में हैं और इस वामपंथी इकोसिस्टम को फायदा किसका?

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Nov 26, 2025, 10:10 pm IST
inभारत, मत अभिमत

एक बार फिर युवा सड़कों पर हैं और एक बार फिर नारे लग रहे हैं। पहले ये नारे “हर घर से अफजल निकलेगा” के रूप में लग चुके हैं तो अभी ये नारे “हर घर से हिडमा निकलेगा” के लग रहे हैं। पुलिस की प्रतिक्रिया भी वही है, जो होनी चाहिए अर्थात इन प्रदर्शनकारियों को पकड़ने की। मगर प्रश्न यह उठता है कि आखिर ये नारे लगाने वाले लोग कौन हैं? कौन हैं ये युवा जो वांछित और कुख्यात नक्सली का नाम लेकर नारा लगा रहे हैं और क्या इन्हें हिडमा के विषय में कुछ पता भी है? और यह भी प्रश्न उठता है कि उनके दिमाग में यह सब कौन भरता है?

जहर की खेती कहां से हो रही है?

आखिर जहर की यह खेती कहां से हो रही है और कौन कर रहा है और इसके साथ ही यह भी प्रश्न कि इसकी फसल कौन काट रहा है? कौन है वे लोग जिन्हें इस प्रकार से छात्रों के आंदोलन से लाभ होता है? इस संबंध में कांग्रेस के युवराज का एक वाक्य याद आता है, जो उन्होनें वोट चोरी को लेकर कहा था कि जेन जेड वोट चोरी को लेकर संघर्ष करेगी तो वे उसका साथ देंगे। अर्थात कांग्रेस चाहती है कि वह सड़क पर उतरे युवाओं का साथ दे, मगर मुद्दों पर साथ देना होगा या फिर सरकार के खिलाफ? क्योंकि ये दोनों ही मामले अलग-अलग हैं। इन दिनों देश के कुछ हिस्सों में कई मामलों को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं, जैसे कि दिल्ली में स्वच्छ हवा को लेकर, देसी श्वान को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विरोध में, और ऐसे ही कई और अन्य मामलों पर।

स्वच्छ हवा के नाम पर आंदोलन और असल सवाल

स्वच्छ हवा सभी का अधिकार होता है और जब तक हवा स्वच्छ नहीं होगी, तब तक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का हल भी नहीं निकलेगा। प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा है। परंतु यह भी ध्यान रखना चाहिए प्रदर्शनकारियों को कि आखिर प्रदूषण का कारण क्या है? क्या महज प्रदर्शन करने से प्रदूषण कम हो जाएगा? क्या नारे लगाने से प्रदूषण समाप्त हो जाएगा? क्या दिल्ली सहित पूरे भारत की आबोहवा केवल “स्वच्छ हवा सबका अधिकार” जैसे नारों से साफ हो जाएगी? नहीं! जाहिर है कि ऐसा नहीं होगा।

हिडमा के समर्थन में लगे नारे — क्या युवाओं को सच पता है?

और जब यह प्रदर्शन हो रहे थे तो उसमें मारे गए दुर्दांत नक्सली “हिडमा” के समर्थन में नारे क्यों लगाए गए? क्या इन युवाओं को यह पता भी होगा कि “हिडमा” कौन है? और हिडमा ने आखिर क्या क्या कुकृत्य किए थे, क्या इन युवाओं को पता होंगे? शायद नहीं! इन्हें ऐसा कुछ भी नहीं पता होगा। तो फिर यह प्रश्न उठता है कि इतनी कम उम्र में ऐसा क्या हुआ है कि ये युवा अपने ही देश की पुलिस, सेना और सरकार के खिलाफ नारे लगा रहे हैं।

पराली, पंजाब सरकार और चयनित क्रांति

यदि वायु प्रदूषण की बात की जाए तो पराली जलाना इस समय प्रदूषण का सबसे बाद कारण है, और पराली किस राज्य में सबसे ज्यादा जलाई जाती है, वह भी सभी को पता है, मगर पंजाब सरकार के खिलाफ आवाज नहीं उठती है और “हर घर से हिडमा निकलेगा? जैसे नारे कथित क्रांति के आकाश पर छा जाते हैं?

वामपंथी वायरस — युवाओं पर सवार होने वाला परजीवी

वामपंथी वायरस से पीड़ित ये छात्र यह तक भूल गए हैं कि वे एक लोकतान्त्रिक देश के निवासी हैं, जहां पर आंदोलन तो कर सकते हैं, मगर वाणी की भी एक मर्यादा होती है और आजादी की भी एक सीमा होती है। आजादी चाहना गलत नहीं है, मगर यह भी तो तय होना चाहिए कि आजादी आखिर किससे चाहिए? और क्या जिनके समर्थन में ये लोग नारे लगा रहे हैं, वे लोग किसी भी प्रकार की आजादी आदि दे रहे थे?

प्रदूषण की समस्या नई नहीं — न क्रांति नई

वैसे प्रदूषण की समस्या न ही नई है और न ही इस सरकार के कारण पैदा हुई है? इस बार अवश्य दीपावली पर पटाखे चलाने की अनुमति सर्वोच्च न्यायालय ने दे दी थी, तो उसे लेकर ये लोग यह कह सकते हैं कि एक दिन के कारण प्रदूषण बढ़ गया होगा, मगर ऐसा शायद ही है। परंतु पिछली सरकार के समय तो पटाखे भी प्रतिबंधित थे, मगर प्रदूषण भी इतना ही रहा था, तो पिछले वर्ष ये आंदोलन क्यों नहीं हुए? क्या पिछले वर्ष तक स्वच्छ हवा अधिकार नहीं था? जैसे ही भाजपा सरकार कहीं भी आती है, वामपंथी ईकोसिस्टम सक्रिय होता है और फिर वह मुद्दों की और उन कंधों की तलाश में रहता है, जिनपर रखकर वह बंदूक चला ले।

युवाओं को मोहरे बनाकर चलने वाला एक बेहद खतरनाक खेल

और कथित क्रांति की रूमानियत में खोए हुए युवाओं से बढ़कर उन्हें अपना हथियार कौन मिलेगा और वे लपक लेते हैं न केवल मौके को, बल्कि साथ ही युवाओं को भी। वे युवाओं को कथित क्रांति का रूमानी सपना दिखाते हैं और उन्हें यह एक ऐसे अंधेरे संसार में ले जाते हैं, जहां से बाहर आने का रास्ता भी सहज नहीं होता, क्योंकि दुर्दांत अपराधियों के पक्ष में नारे लगाकर युवा पुलिस के हत्थे चढ़ेंगे और फिर साल-दर-साल वे पुलिस और न्यायालय के चक्कर लगाते रहेंगे और इसी बीच किसी और मुद्दे पर युवाओं की नई खेप इस वायरस का शिकार होगी और शिकारी अपने बच्चों का और अपना जीवन और कैरियर बचाते हुए एक बार फिर इन वामपंथी शिकारियों का शिकार होती रहेगी।

कब टूटेगा यह सिलसिला?

यह सिलसिला कब टूटेगा यह नहीं पता, परंतु यह बात सत्य है कि वामपंथी वायरस इस सीमा तक परजीवी और खतरनाक है कि यह देश के युवाओं के कंधों पर चढ़कर अपने आप को मजबूत करता है और युवाओं को जेल हो जाए या फिर उन्हें पुलिस की लाठियां झेलनी पड़ें, उसे परवाह नहीं है। दुर्भाग्य की बात तो यही है कि इस वायरस से पीड़ित इन युवाओं को भी यह नहीं पता चल पाता है कि कथित क्रांति की आड़ में वे कब देश और धर्म के विरोध में चले जाते हैं और जब उन्हें होश आता है तो उनके हाथ पछतावा ही रहता है।

वायरस को फैलाने वाले हमेशा बच निकलते हैं

इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि जो इस वायरस को भड़काने वाले हैं, जो इस वायरस को फैलाते हैं, वे फिर से अपने बिल में जाकर नए मुद्दों और नए शिकार का इंतजार करने लगते हैं। इनके लिए देश की युवा शक्ति केवल इनकी स्वार्थ सिद्धि के लिए है और कुछ नहीं!

Topics: Congress Politicsछात्र आंदोलनPolitical Narrative IndiaLeft Ecosystemहिडमा विवादवामपंथी इकोसिस्टमGen-Z protestDelhi Pollution ProtestHidma SlogansStudent Protest IndiaAfzal SlogansUrban Naxal DebateYouth Radicalisation
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