भारत का संविधान बड़े स्पष्ट शब्दों में शुरू होता है—“We The People of India”, यानी “हम भारत के लोग”। इसका अर्थ साफ है कि यह संविधान केवल भारत के नागरिकों के लिए है, किसी भी अन्य देश के लोगों के लिए नहीं। इसलिए जब देश में घुसपैठ बढ़ती है, तो यह सिर्फ जनसांख्यिकीय समस्या नहीं रहती, बल्कि संविधान में निहित न्याय, समानता और समान अवसर जैसे मूलभूत आदर्शों पर सीधा प्रहार बन जाती है।
आज जब SIR (Special Intensive Revision) अभियान के जरिए देश में मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण जारी है, तो यह प्रक्रिया न सिर्फ घुसपैठियों की पहचान कर रही है, बल्कि भारत के वास्तविक नागरिकों—मूल निवासियों—के वोट देने के अधिकार को और मजबूत बना रही है। यह काम वही सरकार कर सकती थी जो वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर देशहित में काम करने की इच्छाशक्ति रखती हो।
अनुच्छेद 326 और मतदान अधिकार की संवैधानिक भावना
बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान का अनुच्छेद 326 साफ कहता है कि भारत में मतदान का अधिकार सिर्फ भारत के नागरिकों को है। SIR अभियान उसी संवैधानिक भावना को सशक्त बना रहा है। इतिहास साक्षी है कि 1950 में डॉ. अंबेडकर ने स्वयं मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का समर्थन किया था। इसलिए आज की यह प्रक्रिया न केवल संवैधानिक है बल्कि बाबा साहेब के विचारों का सम्मान भी है।
बाबा साहेब, सर्वधर्म समभाव और कांग्रेस की तुष्टिकरण राजनीति
भारतीय संविधान की मूल धारा है—“सर्व धर्म सम भाव”, यानी न तो किसी धर्म का पक्षपात और न किसी के प्रति भेदभाव। शासन पूरी तरह न्याय, समान व्यवहार और समान अधिकार पर आधारित हो। लेकिन दुर्भाग्य से, कांग्रेस पार्टी ने दशकों तक धर्म आधारित तुष्टिकरण को अपनी राजनीति का मुख्य आधार बनाया। स्वयं बाबा साहेब अंबेडकर ने कांग्रेस की इस नीति का तीखा विरोध किया था।
अपने ऐतिहासिक इस्तीफा पत्र में अंबेडकर ने नेहरू की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति को एक प्रमुख कारण बताया था। उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा-
“प्रधानमंत्री नेहरू का पूरा समय मुसलमानों की सुरक्षा के लिए लगा होता है… क्या सिर्फ मुसलमान ही सुरक्षा के मोहताज हैं.?”
(स्रोत: Dr. Ambedkar – Writings & Speeches, Volume 13)
1951 में जालंधर का अंबेडकर का भाषण और कांग्रेस की नीति पर प्रहार
27 अक्टूबर 1951 को जालंधर में अंबेडकर ने कहा था कि नेहरू किसी भी काल्पनिक मुस्लिम उत्पीड़न की बात सुनकर तुरंत विचलित हो जाते हैं और सक्रिय हो जाते हैं। यह बयान साफ करता है कि बाबा साहेब कांग्रेस की झुकावपूर्ण नीतियों से कितने ज्यादा असंतुष्ट थे।
माओवादी मानसिकता और कांग्रेस
माओवादी विचारधारा मूल रूप से भारतीय संविधान को नहीं मानती। वे लोकतंत्र, चुनाव और संवैधानिक मार्ग को नकारते हैं। दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी सार्वजनिक रूप से संविधान की प्रति लहराती है लेकिन व्यवहार में वही संविधान की आत्मा “निष्पक्षता और समानता” को कमजोर करती नजर आती है। दोनों की कार्यप्रणाली अलग है पर प्रभाव एक- देश की संवैधानिक व्यवस्था पर चोट।
विकासवाद की नई संवैधानिक परिभाषा
हाल के बिहार चुनाव परिणाम इस बात का प्रमाण हैं कि अब जनता जाति और तुष्टिकरण आधारित राजनीति को नकार रही है। साथ ही इन नतीजों ने यह स्पष्ट किया कि 21वीं सदी का भारत संविधान की असली परिकल्पना—विकासवाद—को ही स्वीकार करता है। आज का मतदाता सजग है। वह विकास, सुरक्षा, शिक्षा और पारदर्शी शासन को प्राथमिकता देता है। यही संविधान की आत्मा को सही मायने में सुरक्षित रखता है।
कांग्रेस और बाबा साहेब अंबेडकर
कांग्रेस ने सात दशक तक अपने परिवार के नेताओं के जन्मदिन मनाए, लेकिन कभी संविधान दिवस मनाने की जरूरत महसूस नहीं की। यह दिन उस उपेक्षा की याद भी दिलाता है जो बाबा साहेब के साथ कांग्रेस ने बरसों तक की।
कांग्रेस की उपेक्षा का दर्द पूरी तरह दस्तावेज़ों में दर्ज है-
- नेहरू अंबेडकर को ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन नहीं बनाना चाहते थे; उनकी जगह ब्रिटिश आइवर जेनिंग्स का नाम आगे बढ़ाया गया।
- 1952 और 1954 के चुनावों में कांग्रेस ने अंबेडकर को हराने के लिए पूरी ताकत लगाई। नेहरू ने खुद चुनाव प्रचार किया।
- 1952 में 78,000 वोट रद्द करवा दिए गए — यह तथ्य धनंजय कीर की जीवनी में दर्ज है।
- नेहरू ने अंबेडकर के कड़े विरोध के बावजूद धारा 370 लागू की; अंबेडकर ने इसका मसौदा तैयार करने से साफ इनकार कर दिया था।
- अंबेडकर को योजना आयोग से दूर रखा गया, जबकि वे अर्थशास्त्र के विद्वान थे।
- इस्तीफे के बाद उन्हें संसद में बोलने तक नहीं दिया गया।
- अंबेडकर को हराने वाले कजरोलकर को पद्म भूषण, और बाबा साहेब को लंबे समय तक कोई सम्मान नहीं।
- कांग्रेस बाबा साहेब को संविधान सभा में भेजना ही नहीं चाहती थी।
- इस्तीफा पत्र सार्वजनिक रिकॉर्ड से गायब कर दिया गया।
- समाधि के लिए जमीन तक नहीं दी गई।
- कश्मीर में संविधान लागू नहीं किया गया — अंबेडकर के बनाए संविधान को कांग्रेस ने अपूर्ण रखा।
- NCERT की किताब में अंबेडकर को नेहरू द्वारा चाबुक दिखाते कार्टून तक छपा।
- और नेहरू का बयान — “अंबेडकर के जाने से कैबिनेट पर कोई असर नहीं।”
इतिहास यह सब दर्ज रखता है।
संविधान दिवस पर राष्ट्रीय संकल्प – घुसपैठिया मुक्त भारत
आज संविधान दिवस पर जब देश अपने महान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर को नमन कर रहा है तो , तो यह समझना जरूरी है कि घुसपैठ केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अत : “घुसपैठिया मुक्त भारत” अभियान से जुड़कर देश को सुरक्षित, स्थिर और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित बनाने में अपना योगदान दें।











