पुणे से लेकर पूर्णिया तक राजनीति में वंशवाद का सूर्य अस्त हो रहा है। बिहार का चुनाव भारत की राजनीति में कमोबेश वैसी ही घटना है, जैसी 2014 का लोकसभा चुनाव। देश की राजनीति ने वह करवट ली है, जो आने वाले समय में पूरे देश की क्षेत्रीय राजनीति को बदलकर रख देने वाली है। ऐसे समय में जबकि भारत के ठीक बगल में नेपाल और बांग्लादेश में जेन-जी के नाम पर तरुणाई को भड़का कर तख्तापलट हो गए।
ऐसे समय में जब भारत का विपक्ष कांग्रेस के नेतृत्व में लगातार हार के बाद जेन-जी को ऐसी ही हिंसा के लिए भड़काने का भरसक प्रयास कर रहा है, बिहार चुनाव एक बड़ा और दूरगामी संदेश लेकर आया है। यह जेन-जी छुटकारा तो चाहती है, लेकिन वंशवाद से, उन थोपे गए नेताओं से, जो एक परिवार का वारिस होने के अलावा कोई अन्य कोई योग्यता नहीं रखते। बिहार चुनावों का संकेत और संदेश बहुत साफ है। आप फलां के पुत्र हैं, बस इस विशेषता के चलते आप हमारा वोट नहीं ले सकते।
भारत की विकास यात्रा को यदि देखेंगे, तो पाएंगे कि परिवारवाद ने कैसे देश की जगह कुछ परिवारों का विकास किया। आजाद भारत छोटी छोटी पारिवारिक रियासतों में बंट सा गया। हर सूबे में कुछ परिवार सत्ता पर काबिज होते रहे। मंडल और सामाजिक न्याय के वादे पर सवार होकर परिवारवाद के खिलाफ लड़ने निकलने वाले तथाकथित समाजवादी भी सत्ता पाते ही राजनीतिक सामंत बन गए। जातीय वोटबैंक को परिवार के हितसाधन का जरिया बना लिया गया।
बिहार में वंशवाद की हार
इन वंशवादी शहजादों के बोल देखिए। “ई बिहार है… ज्यादा गर्मी न खाएं। चुनाव के बाद सब ठंडा दिया जाएगा।” यह दंभपूर्ण गुंडानुमा चुनौती बिहार चुनाव के दौरान खूब गूंजी। यह धमकी और कोई नहीं, राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के बड़े पुत्र तेजस्वी यादव जारी कर रहे थे। कक्षा नौ में शिक्षा छोड़ देने वाले तेजस्वी की अकेली योग्यता, जिसके दम पर वह मुख्यमंत्री की कुर्सी की दावेदारी कर रहे थे, लालू पुत्र होना ही है। पूरे चुनाव के दौरान उनकी गुंडा टोलियों की बाइक यात्राएं, उनके समर्थकों की लाठियों को तेल पिलाने वाले वीडियो वायरल होते रहे। इन तमाम घटनाओं ने बिहार की जनता के दिल में लालू प्रसाद यादव के जंगलराज वाली सिहरन पैदा कर दी।
सोशल मीडिया के इस दौर में, जब हर छोटी बड़ी चीज कैमरे की नजर में है और तुरंत वायरल होती है, यह कैसा राजनीतिक नेतृत्व इन परिवारों ने तैयार किया है, जो आज भी अस्सी के दशक की मतपेटी लूट टाइप गुंडा राजनीति की नुमाइश से बाज नहीं आ रहा! वे ऐसा कर सकते हैं, इसलिए कि इनकी राजनीति का डीएनए यही है। एक समूह की गुंडागर्दी, मुस्लिमों को सांप्रदायिकता का छद्म भय दिखाकर इन्होंने जो समीकरण तैयार किया था, उसे यह अजेय मान बैठे थे।
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल को 75 सीट मिली थीं। इस चुनाव में वह 25 पर सिमट बैठी। महागठबंधन की पुरानी विधानसभा में संख्या 110 सीट थीं, जो गिरकर 35 आ गईं। हर चुनाव से पहले और बाद में नाभिकीय बमनुमा सुरसुरी छोड़ने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी की पार्टी इस चुनाव में 19 से गिरकर छह सीटों पर रह गई। भाकपा (माले) की पिछली विधानसभा में 12 सीटें थीं, इस बार दो हैं। बिहार में गठबंधन की कमान दो राजनीतिक परिवारों के वारिसों के हाथ में थी और जनता, खासकर जेन जी ने उन्हें बुरी तरह ठुकरा दिया। उनकी लठैत राजनीति, जातीय व सांप्रदायिक समीकरण और संविधान के नाम पर दुष्प्रचार व हर संवैधानिक संस्था पर सवाल उठाने की राजनीति को जनता ने नकार दिया।
परिवारों में बिखराव
वंशवाद पर बड़ी चोट इसलिए भी कि लालू परिवार के तमाम सदस्य चुनाव से पहले सत्ता की आहट देखकर इस मलाई में हिस्सेदारी के लिए ताल ठोकने लगे। लेकिन तेजस्वी खुद को लालू का इकलौता उत्तराधिकारी मानते हैं और उन्होंने सत्ता में किसी भी हिस्सेदारी से इंकार कर दिया। उनके भाई तेज प्रताप चुनाव से पहले ही अलग हो गए। बहन रोहिणी भी नाराज थी। रोहिणी ने ही लालू प्रसाद यादव को अपनी किडनी दी थी। चुनाव में हार के बाद यह कलह जगजाहिर हो गई।

रोहिणी ने एक्स पर पोस्ट करके बताया कि उनके साथ क्या हुआ। परिवार से अलग होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह सवाल संजय, रमीज और तेजस्वी से पूछिए। जब संजय और रमीज का नाम लिया जाएगा, तो आपको घर से निकाल दिया जाएगा। आपको बदनाम किया जाएगा। आपको गाली दिलवाई जाएगी। आपके ऊपर चप्पल उठाकर मारी जाएगी। फिलहाल लालू कुनबा बिखर चुका है। लालू की दो अन्य बेटियां चंदा और राजलक्ष्मी भी माता पिता का घर छोड़ चुकी हैं।
हरियाणा से महाराष्ट्र तक वंशवाद का ह्रास
हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी यही सब देखने में आया। कांग्रेस बहुत निश्चिंत थी। वहां कांग्रेस का वंशवादी नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हाथ में था। उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर अपने पिता का नाम लेते रहे, लेकिन यह बात ढकी छिपी न थी कि भूपेंद्र अपनी राजनीतिक बैटन बेटे दीपेंद्र को सौंपना चाहते थे। 2014 और 2019 के चुनाव में हार चुके हुड्डा पर से आला कमान का विश्वास न डिगा। हालांकि कांग्रेस की दलित नेता कुमारी शैलजा ने चुनाव के बीच में अपनी दावेदारी ठोकी, लेकिन सब जानते थे कि कांग्रेस के लिए हरियाणा में जो भूपेंद्र सिंह हुड्डा कहें, वह सही।
आखिरकार कांग्रेस हारी और इसका कारण नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में भाजपा का विकास कार्य तो था, पर साथ ही हरियाणा की जनता ने बदलाव की आहट होते हुए भी कांग्रेस से हाथ खींच लिए। भजनलाल परिवार आदमपुर सीट हार गया। 56 साल का वर्चस्व टूटा। भजनलाल के पोते भव्य विश्नोई चुनाव हार गए। चौटाला परिवार की मिल्कियत समझी जाने वाली ऐलानाबाद सीट से अभय चौटाला हारे।
इससे पहले महाराष्ट्र में शरद पवार और उद्धव ठाकरे के रूप में वंशवादी राजनीति को वहां की जनता ने नकार दिया। दोनों पार्टियों को करारी हार मिली। महाराष्ट्र में ‘इंडि’ गठबंधन पूरी तरह से वंशवादी मुखौटा था। इसमें राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे और शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले मैदान में थीं। उत्तर प्रदेश के हालात से आप वाकिफ हैं। समाजवादी पार्टी की कमान विरासत में पाने वाले अखिलेश यादव दो विधानसभा चुनाव हार चुके हैं। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर और बादल परिवार सत्ता से बाहर है। मध्य प्रदेश में कमलनाथ और उनके बेटे के नेतृत्व में कांग्रेस की हार हुई है। ओडिशा में तो नबीन पटनायक ने निर्विवाद नेता के रूप में राज किया, लेकिन 2024 के चुनाव में उन्होंने अपनी विरासत एक करीबी आईएएस अधिकारी को सौंपने का प्रयास किया तो 24 साल से चली आ रही उनकी सत्ता चली गई।
बदलाव की यह बयार बहुत तेज है। बिहार की सीमाएं पश्चिम बंगाल से लगती हैं। वहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने उत्तराधिकारी के रूप में अभिषेक बनर्जी को तैयार कर रही हैं। साथ ही झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन वंशवाद की मशाल थामे मुख्यमंत्री हैं। तो क्या बिहार के इन नतीजों की आहट इन दोनों राज्यों की ओर जाने वाली है? साथ ही तमिलनाडु की बात किए बगैर वंशवाद की राजनीति पर चर्चा पूरी नहीं हो सकती। वहां एम. करुणानिधि के बेटे स्टालिन मुख्यमंत्री हैं। यदि वंशवाद के खिलाफ जेन जी और जनमानस में एक मत बन चुका है, तो इन राज्यों में भी इसका असर जरूर नजर आएगा।
















