सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी भारतीय इतिहास के अत्यंत उथल-पुथल भरे दौर में अवतरित हुए। औरंगजेब के शासनकाल में जबरन कन्वर्जन और पांथिक असहिष्णुता चरम पर थी और देश की आध्यात्मिक व सांस्कृतिक एकता को गंभीर संकट में डाल दिया था। मुगल साम्राज्य में बड़े पैमाने पर हिंदुओं का जबरन कन्वर्जन किया जा रहा था। विशेषकर कश्मीरी हिंदुओं पर भयंकर अत्याचार हुए। मंदिर तोड़े गए और उन्हें कन्वर्जन के लिए बाध्य किया गया। अंततः अपनी आस्था और धर्म की रक्षा के लिए कश्मीरी हिंदू आनंदपुर साहिब पहुंचे और गुरु तेग बहादुर जी से मार्गदर्शन और सहायता की प्रार्थना की।

कुलपति, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा
गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी हिंदुओं को आश्वासन दिया कि वे दिल्ली जाकर मुगल बादशाह से इस पर बात करेंगे। साथ ही, कश्मीरी हिंदुओं से कहा कि वे अपने हाकिम को सूचित करें कि यदि गुरुजी अपना धर्म बदलकर इस्लाम स्वीकार कर लेते हैं, तो वे भी कन्वर्जन कर लेंगे। लेकिन यदि गुरुजी अडिग रहते हैं, तो उन्हें अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता प्रदान की जाए। दिल्ली की यात्रा के दौरान गुरुजी और उनके अनुयायियों को गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी अटूट आस्था और साहस को तोड़ने के लिए उन्हें मार्ग में अमानवीय यातनाएं दी गईं, परंतु गुरुजी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे। काजी द्वारा चलाए गए झूठे मुकदमे में उन्हें इस्लाम कबूल करने को कहा गया, पर उन्होंने दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया। गुरुजी के सामने ही उनके तीन शिष्यों भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला की निर्ममता से हत्या कर दी गई, परंतु गुरुजी शांतचित्त होकर ईश्वर का स्मरण करते रहे।
दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु तेग बहादुर ने धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। यह बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-स्रोत बना, जिससे उन्होंने भय और स्वार्थ के बजाय विवेक, साहस और नैतिक कर्तव्य का पालन करना सीखा। उनका जीवन प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सच्ची वीरता अस्त्र-शस्त्र या सत्ता में नहीं, वरन् आत्मबल, त्याग, न्यायप्रियता और दूसरों के अधिकारों की रक्षा में निहित होती है। उनके इस सर्वोच्च बलिदान के सम्मान में उन्हें ‘हिंद दी चादर’(भारत की ढाल) के रूप में सदैव स्मरण किया जाता है। उन्होंने अत्याचार के विरुद्ध खड़े होकर सिद्ध किया कि दूसरों की रक्षा ही सच्चा आध्यात्मिक कर्तव्य है। मानवाधिकारों की सार्वभौमिक अवधारणा से बहुत पहले गुरु महाराज ने अपने बलिदान के माध्यम से यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता, समानता और मानव गरिमा मन की पवित्रता में निहित हैं। उन्होंने विश्व को सिखाया कि ईश्वरीय ज्योति सभी में समान रूप से विद्यमान है।
गुरु तेग बहादुर जी ने बाल्यावस्था में शस्त्र विद्या, धर्मग्रंथों का अध्ययन, ध्यान व आत्म-अनुशासन की शिक्षा प्राप्त की। युद्धकला में निपुण होने के बावजूद उनका स्वभाव गंभीर, विचारशील और आध्यात्मिक था। 1633 ई. में उनका विवाह माता गूजरी से हुआ। गुरु साहिब अपने पिता के नेतृत्व में कुछ युद्धों में शामिल हुए। 13 वर्ष की आयु में करतारपुर के युद्ध में असाधारण वीरता के कारण उन्हें ‘तेग बहादुर’ की उपाधि दी गई। वे सिख इतिहास में आस्था, नैतिकता और सभ्यतागत मूल्यों को पुनर्परिभाषित करने वाली महान विभूति हैं। उन्होंने सिख पंथ को न्याय, मानवीय गरिमा व अंतःकरण की स्वतंत्रता का धर्म बना दिया। उनके उपदेशों और बलिदान ने सिख पंथ को क्षेत्रीय सीमाओं से उठाकर सार्वभौमिक नैतिक धर्म के रूप में स्थापित किया। उन्होंने गुरु अर्जन देव की बलिदानी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अंतरात्मा की स्वतंत्रता व नैतिक साहस का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके भजनों में यह दर्शन स्पष्ट झलकता है। वे कहते हैं, ‘‘किसी से डरो मत, किसी को भयभीत मत करो, इस प्रकार तुम ज्ञान प्राप्त करोगे।’’ (श्री गुरुग्रंथ साहिब, अंग 1427)
गुरु साहिब ने यह शिक्षा दी कि आध्यात्मिक बोध और नैतिक साहस सत्य के दो अविभाज्य आयाम हैं। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में 15 रागों, 56 सबदों और 57 श्लोकों में संकलित उनकी बाणी मानवता को शाश्वत मार्गदर्शन प्रदान करती है। इन सबदों में उन्होंने संसार की अस्थिरता पर चिंतन किया और मनुष्य को अहंकार, लोभ तथा क्षणिक सुखों से ऊपर उठने की प्रेरणा दी। उनके उपदेश सिखाते हैं कि सुख-दुःख, सफलता-विफलता व जीवन-मृत्यु के द्वंद्वों के बीच समभाव बनाए रखना ही सच्ची अध्यात्मिकता का सार है।
यह शिक्षा आध्यात्मिक अनुशासन और नैतिक साहस के संतुलन का संदेश देती है तथा ‘संत सिपाही’ के आदर्श को स्थापित करती है। 1665 ई. में गुरु तेग बहादुर जी के मार्गदर्शन में स्थापित श्री आनंदपुर साहिब ने सामाजिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता के केंद्र के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही स्थान आगे चलकर गुरु गोबिंद सिंह जी के नेतृत्व में खालसा पंथ की पवित्र जन्मभूमि बना। गुरु जी की विरासत केवल सिख पंथ की पहचान तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने समग्र मानवता को आलोकित किया। उनका जीवन इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि सच्चा धर्म सभी सांप्रदायिक सीमाओं से परे है। उनका संदेश युगों-युगों तक गूंजता रहेगा, ‘‘दूसरों की स्वतंत्रता की रक्षा उसी प्रकार करो जैसे अपनी स्वतंत्रता की करते हो, इसी में ईश्वर का सच्चा मार्ग निहित है।’’

















