श्री गुरु तेग बहादुर  : धर्म, त्याग और बलिदान के प्रतीक
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श्री गुरु तेग बहादुर  : धर्म, त्याग और बलिदान के प्रतीक

गुरु तेग बहादुर का जीवन और त्यागपूर्ण बलिदान एक आदर्श प्रेरणा है। उन्होंने धर्म, मानवता और देशभक्ति के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। अपनी यात्रा के दौरान वे जहां-जहां गए, वहां लोगों में जागरूकता और नैतिक मूल्यों का संचार हुआ। उनका योगदान धर्म-रक्षा, सामाजिक सुधार और मानवता की सेवा का प्रतीक है

Written byडॉ. राम प्रकाशडॉ. राम प्रकाश
Nov 24, 2025, 09:16 am IST
inभारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति
मुगल आक्रांता औरंगजेब के अत्याचारों से त्रस्त हिंदुओं ने गुरु तेग बहादुर से रक्षा के लिए गुहार लगाई थी

मुगल आक्रांता औरंगजेब के अत्याचारों से त्रस्त हिंदुओं ने गुरु तेग बहादुर से रक्षा के लिए गुहार लगाई थी

मातृभूमि के पावन स्थलों की यात्रा की परंपरा प्राचीन काल से ही भारतीय मनीषियों में रही है। नवम् गुरु तेग बहादुर को यह यात्रा-वृत्ति आदिगुरु नानक और उनके पिता, छठे गुरु हरगोबिंद जी से विरासत में मिली थी। बाल्यकाल में उन्होंने अपने पिता के साथ पंजाब के उन पवित्र स्थलों की यात्रा की जहां, पूर्व-गुरुओं के वंशज निवास करते थे। तरनतारन, खडूर, उरौली, करतारपुर जैसे स्थानों पर गुरु तेग बहादुर ने गुरु अंगददेव, गुरु अमरदास और गुरु रामदास के वंशजों से मिलकर आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त की। इसके बाद बकाला के वनवास काल में भी उन्होंने माता नानकी, पत्नी गुजरी, साले कृपालचंद के साथ भारत के विभिन्न हिस्सों की यात्राएं कीं। सिख इतिहासकार सरदार फौजासिंह के अनुसार उनका यह देशभ्रमण संवत् 1713 से 1730 तक चला। गुरु तेग बहादुर के 11 वर्षों के गुरुआई काल (संवत् 1721 से 1732) का अधिकतर समय इसी यात्रा में बीता। आनंदपुर में वे मात्र 3-4 वर्ष ही रहे, जहां उन्होंने संगत समागम के लिए सुव्यवस्था की।

उनकी इस व्यापक यात्रा से पश्चिमोत्तर भारत से लेकर पूर्वोत्तर तक की जनता में जागृति आई। विशेष रूप से असम यात्रा के दौरान, उन्होंने दो विरोधी हिंदू योद्धाओं, अंबर नरेश रामसिंह और असम नरेश चक्रध्वज के बीच शांति स्थापित कराई। उनके प्रति कामरूप के राजा रामराय, सैफाबाद के सूबेदार सैफुद्दीन और ढाका के सूबेदार शाइस्ता खान जैसे शासकों की गहरी श्रद्धा दिखाती है कि उस युग में पंजाब व आसपास के क्षेत्र की हिंदू जनता गुरु तेग बहादुर को अपने संरक्षक और उद्धारक के रूप में मानती थी।

गुरुजी की संगत और पंगत

गुरु तेग बहादुर ने भाद्रपद 1722 विक्रमी संवत् (अगस्त, 1665) में आनंदपुर से प्रस्थान किया। उस समय आनंदपुर धाम निर्माणाधीन था। इसलिए गुरुजी ने कुछ अनुभवी स्वयंसेवकों को निर्माण की देखरेख के लिए वहीं छोड़ा और प्रमुख शिष्यों के साथ यात्रा पर निकले। भाई दयालदास, मतिदास, सतीदास और गुरदित्ता उनके मुख्य सहयोगी थे। वे किसी स्थायी स्थान पर न रुककर हर पड़ाव पर तंबू लगाकर शिविर बनाते और पंगत लंगर करते थे। समयानुसार गुरु प्रवचन, सत्संग और धर्म-चर्चा भी होती थी। एक अग्रिम दल अगले ठिकाने पर पहुंचकर व्यवस्था करता था।

पहले दिन गुरुजी कीरतपुर से आठ मील दूर एक छोटे उजाड़ गांव में रुके, जहां पानी दूर से लाना पड़ता था। उन्होंने भाई कृपालचंद को वहां तुरंत कुआं खुदवाने का आदेश दिया। गुरुजी के ठहरने के दौरान सभी ग्रामवासियों को पंगत में भोजन कराया गया और कुछ ही दिनों में गांव में मंगलमय वातावरण बन गया। लोग वर्ग भेद भूलकर सत्संग दीवान में आकर धर्म-संदेश से तृप्त होकर लौटते थे। इसके बाद, नवम् गुरु ने बूनड़, राजपुरा और रोपड़ में थोड़े समय के लिए प्रवास किया, फिर वे नवाब सैफुद्दीन के शासन वाले सैफाबाद पहुंचे, जो गुरु का परम भक्त था। नवाब ने नगर के निकट एक बड़े उद्यान में गुरुजी के लिए शिविर की व्यवस्था की। कुछ दिन निवास के बाद उद्यान में दीवान आयोजित हुआ, जहां आसपास के गांवों की जनता ने भक्ति का आनंद लिया।

एक पखवाड़े के बाद गुरुजी का काफिला धार्मिक स्थलों की ओर बढ़ा। यहां गुरुजी के यात्रा-प्रवास के साथ एक विशेष प्रसंग भी जुड़ा है। उन्होंने धमधान नामक स्थान पर पड़ाव डाला, जहां में धूमधाम से दीपावली मनाई। इसके बाद कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन गुरु नानकदेव का जन्मोत्सव बनाया जाने लगा। इसी बीच, 8 नवंबर, 1665 को मुगल सेनापति आलम खां रुहेला ने औरंगजेब के आदेश पर नवम गुरु को बंदी बना लिया। औरंगजेब गुरुजी की बढ़ती लोकप्रियता से आशंकित था। इसलिए उन्हें दिल्ली बुलाकर मारना चाहता था। उस समय नरेश जयसिंह के पुत्र युवराज रामसिंह भी वहीं थे। रामसिंह ने उन्हें अपनी देखभाल में रखा और गुरुजी के आचरण-व्यवहार की जिम्मेदारी लेकर बादशाह के निर्णय को स्थगित करवा दिया।

रामसिंह ने एक माह तक उन्हें अपने पास रखा। इसके बाद गुरुजी कैथल (हरियाणा) पहुंचे, जहां गुरु नानक के निर्वाण दिवस पर एक बढ़ई के घर संगत और पंगत हुई, जिसमें भाई गुरदित्ता ने वाणी-पाठ किया। फिर वे पेहवा पहुंचे, जहां आदिगुरु नानक और छठे गुरु हरगोबिंद के स्मृति गुरुद्वारे थे। गुरुजी ने मंदिरों के दर्शन कर बराना के लिए प्रस्थान किया, जहां उन्होंने लोगों के कई विवाद सुलझाए और सबको आनंदित किया। इसके बाद वे ऐतिहासिक तीर्थ कुरुक्षेत्र गए, जहां विभिन्न जातियों की संगत ने पवित्र सरोवर के घाट पर पंगत लगाकर सहभोज किया। यह जन-एकात्मता का अद्भुत दृश्य था। यमुना के किनारे कई दिन यात्रा करने के बाद उन्होंने दिल्ली में प्रवेश किया। दिल्ली में ठेकेदार लक्खीराम ने गुरुजी और उनके समूह का सत्कार किया। अंबर नरेश जयसिंह और रामसिंह भी उस समय सपरिवार दिल्ली में थे और उन्होंने नवम् गुरु का स्वागत किया।

तीर्थ स्थलों पर प्रवास

दिल्ली के बाद गुरुजी ने उत्तर प्रदेश की यात्रा शुरू की। उनका प्रथम ठहराव मथुरा था, जहां श्रीकृष्ण की जन्मभूमि पर पहुंच कर वे कृतज्ञ हुए। कुछ समय वे वृंदावन में भी रहे। उनका अगला पड़ाव आगरा था, जहां उन्होंने एक वृद्ध भक्तिन, माई जस्सी की कुटिया में रहे। उनकी स्मृति में आज भी वहां ‘माईथान’ नामक गुरुद्वारा है। आगरा से वे इटावा, कानपुर, फतेहपुर होते हुए मार्च 1666 में प्रयाग पहुंचे। प्रयाग में श्रद्धालुओं ने उनके लिए एक पक्का घर बनवाया था, जहां नवम गुरु ने कई दिन एकांत में चिंतन और ध्यान किया। वहां से उन्होंने मिर्जापुर और प्रसिद्ध तीर्थ काशी की यात्रा की। काशी में श्रद्धालु भाई जवाहरीमल के नेतृत्व में संगत ने गुरुजी की सेवा की।

यहीं उन्होंने उत्तर प्रदेश के गुरु-स्थानों का सुव्यवस्थित संगठन किया। काशी की जनता, जो शैव, वैष्णव, शाक्त आदि विभिन्न वर्गों की थी और जातिवाद से विभाजित थी, गुरुजी की ‘संगत’ और ‘पंगत’ व्यवस्थाओं से एकजुट हुई। यह सांस्कृतिक और जातीय एकता का सुंदर दृश्य था। गुरुजी को यहां पर्याप्त धन और मूल्यवान उपहार प्राप्त हुए, जिन्हें उन्होंने गरीबों और जरूरतमंदों में बांट दिया। लगभग दो सप्ताह के काशी प्रवास के बाद गुरुजी बिहार की सीमा में पहुंचे। लेकिन उनका घोड़ा ‘श्रीधर’ काशी में बीमार हो गया। यह घोड़ा नवाब सैफुद्दीन ने उन्हें भेंट किया था। गुरुजी ने अपने विश्वासपात्रों को रोककर उसकी देखभाल का आदेश दिया। बिहार में उनका पहला पड़ाव सासाराम में हुआ, जहां भक्त फत्तूशाह ने उनके लिए एक भवन बनवा रखा था। वहां दो सप्ताह रहने के बाद गुरुजी बोधगया, नालंदा और राजगृह होते हुए मई 1666 में पटना (पाटलिपुत्र) पहुंचे। बिहार, बंगाल, आसाम की यात्रा के दौरान उन्होंने काशी के भाई जवाहरीमल और अन्य प्रमुख सिख शिष्यों को ‘हुक्मनामे’ (आदेश-पत्र) भेजे, जो ऐतिहासिक महत्व के हैं।

सबसे लंबा प्रवास पटना में

गुरुजी का पाटलिपुत्र प्रवास सबसे लंबा चार माह (आषाढ़ से आश्विन) तक रहा, क्योंकि वर्षा ऋ तु में जंगलों एवं नदियों के कारण यात्रा कठिन थी। यह स्थान पहले से ही बुद्ध, महावीर, अशोक और चंद्रगुप्त जैसे महापुरुषों के कारण ऐतिहासिक था। यहां गुरु नानक भी आए थे। उनका यह प्रवास पाटलिपुत्र के के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय साबित हुआ। इसी दौरान उनकी पत्नी गूजरी गर्भवती थीं। यहीं उनके पुत्र गुरु गोबिंद सिंह का जन्म हुआ। इस प्रवास में गुरुजी ने उत्तर प्रदेश और बिहार के गुरुस्थानों की स्थायी व्यवस्था की और भाई दयालदास को इसका प्रमुख प्रतिनिधि नियुक्त किया।

पटना प्रवास के दौरान ही उन्हें शाहजहां की मृत्यु की सूचना मिली, जिसे उसके बेटे औरंगजेब ने जेल में डाल दिया था। साथ ही, उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज और औरंगजेब के बीच संघर्ष की खबरें भी मिलीं। उधर, भारत के दूरस्थ पूर्वी क्षेत्रों से प्राप्त निमंत्रणों के चलते नवम गुरु ने माता नानकी, पत्नी गूजरी और कुछ शिष्यों को पटना में रहने को कहा और 1666 के अंत में भाई गुरदित्ता (बाबा बुड्ढा के पुत्र), भाई मतिदास और भाई सतीदास के साथ बंगाल-असम की यात्रा पर निकले। वहां की जनता बहुत समय से उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। उन्होंने लगभग पांच वर्ष तक इन प्रदेशों में रहकर वहां की जनता में सांस्कृतिक समन्वय और भावात्मक एकता का संदेश फैलाया। इतिहासकारों के अनुसार, ढाका के भक्त भाई बुलाकीदास और कामरूप के राजा रामराय ने कई दिनों तक पाटलिपुत्र में रहकर उन्हें अपने प्रदेश में आने का अनुरोध किया था।

अंततः 1666 के अंत में नवम् गुरु की यह ऐतिहासिक यात्रा शुरू हुई। यात्रा के इस चरण में वे पटना से मुंगेर, भागलपुर, साहबगंज, कांतनगर और राजमहल होते हुए उस समय के प्रसिद्ध सूफी केंद्र मालदा पहुंचे। उन्होंने बंगाल में सूफी संतों के साथ गहरा सांस्कृतिक संवाद स्थापित किया। उधर, पाटलिपुत्र से लगभग एक वर्ष बाद उनका दल गोदावरी, गोपालपुर और पवना होते हुए ढाका पहुंचा। ढाका उस समय पूर्वी भारत का प्रमुख व्यापारिक, औद्योगिक, धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र था, जो हस्तकौशल और प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन पीने के पानी की कमी एक गंभीर समस्या थी। गुरु नानक ने सौ वर्ष पहले वहां पीने के पानी का कुआं खुदवाया था, जो आसपास के लोगों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं था। नवम गुरु ने इस सेवा को पुनर्जीवित किया। वहीं 22 दिसंबर, 1666 को उन्हें पाटलिपुत्र में पुत्र गुरु गोबिंद राय के जन्म की खबर मिली।

सपरिवार आनंदपुर वापसी

गुरुजी का ढाका प्रवास (1667-1668) सत्संग, कीर्तन और भक्ति के कार्यक्रमों में व्यस्त रहा। इस दौरान उन्होंने सिल्हूट, चिटगांव, सोनदीप की यात्राएं कीं और कामरूप (असम) के राजा रामराय के राज्य में भी समय बिताया। वहां से लौटते समय वे नोआखली और चांदपुर आदि होते हुए लगभग पांच वर्ष की उत्तर-पूर्व भारत यात्रा के बाद संवत् 1727 के वैशाख शुक्ल पक्ष में ढाका लौटे। वहां कुछ समय रहने के बाद उन्होंने जगन्नाथपुरी की यात्रा की। इस क्रम में पहले वे कलकत्ता, फिर कटक और भुवनेश्वर होकर जगन्नाथपुरी पहुंचे, जहां सागर तट पर शिविर लगाकर सत्संग और पंगत का आयोजन करते रहे। पुरी में उन्हें उत्तर भारत से औरंगजेब के बढ़ते अत्याचारों की खबर मिली, जिसमें ‘सिपह-ए-दीन’ नामक हिंदुओं के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा था। काशी, प्रयाग और हरिद्वार जैसे तीर्थ स्थलों पर औरंगजेब की विशेष कुदृष्टि थी। इस खबर से दुखी होकर गुरुजी ने मद्र देश और सिहल-द्वीप की यात्रा स्थगित करके सीधे पटना लौटने का निर्णय लिया, जहां उनका परिवार था। उन्होंने अपने पुत्र गोबिंद राय को देखा भी नहीं था। पुरी से पटना पहुंचने पर 5 वर्षीय पुत्र ने दादी नानकी, माता गूजरी और श्रद्धालु संगत के साथ नगर के बाहर ‘नवाब के बाग’ में पिता का स्वागत किया। गुरु और पुत्र की यह पहली मुलाकात अत्यंत उल्लासित और हृदयस्पर्शी थी।

औरंगजेब के अत्याचारों के कारण पटना पहुंचने के तुरंत बाद ही उन्होंने परिवार के साथ आनंदपुर जाने का निश्चय किया। कुछ विश्वस्त शिष्यों के साथ पंजाब की ओर चल पड़े और बाद में परिवार से मिलने की योजना बनाई, ताकि दोनों दल एक साथ आनंदपुर पहुंच सकें। लगभग एक सप्ताह बाद परिवार उनसे मिला। वे गंगा के दक्षिण तट होते हुए काशी पहुंचे, जहां ब्राह्मणों पर मुगलों के अत्याचारों को देखकर उनसे रहा नहीं गया, लेकिन वे रुके नहीं। गंगा के उत्तरी तट से होकर मुरादाबाद, दिल्ली, कुरुक्षेत्र और सैफाबाद से होते हुए संवत् 1728 के चैत्र मास में वापस आनंदपुर पहुंचे।

‘चक नानकी’ के रूप में प्रारंभ हुआ निर्माण कार्य अब पूर्ण हो चुका था, जिसमें विशाल भवन, दुर्ग, जलकूप, सरोवर और लंगर की व्यवस्था थी। गुरुदेव ने आते ही बालक गोविन्दराय की शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था की। मुगल अत्याचारों के कारण विद्वान ब्राह्मण, शास्त्रज्ञ और कलाकार आनंदपुर की ओर आने लगे, जिससे यह एक सांस्कृतिक संगम बन गया। बालक गोबिंद राय को इन सभी संस्कृतियों और विद्वताओं से ज्ञान प्राप्त हुआ और वे भारतीय संस्कृति के सच्चे स्वरूप से परिचित हुए।

आनंदपुर में लगभग एक वर्ष तक विभिन्न प्रबंध करने के बाद गुरुजी ने उत्तर भारत के पिछड़े और उपेक्षित मालवा तथा बांगड़ क्षेत्रों की यात्रा की, जहां औरंगजेब के अत्याचार अधिक थे। उन्होंने बिना शस्त्र यात्रा की और हिंसा का प्रचार न करते हुए गांव-गांव जाकर लोक में आत्मबल, सेवा और नैतिकता का संदेश दिया। इस दौरान उन्होंने पीने के पानी के कुएं खुदवाए और ग्रामीणों को दुधारू गायें उपलब्ध करवाईं। उनके इस अभियान से वहां की निराश जनता में नई स्फूर्ति आई। उनकी सादगी और सेवा-भावना से जनता प्रेरित हुई और आध्यात्मिक बल बढ़ा। कुल मिलाकर गुरु तेग बहादुर की यात्रा धर्म प्रचार, सामाजिक सेवा और कल्याणकारी कार्यों का प्रतीक थी।
(डाॅ. राम प्रकाश की पुस्तक ‘राष्ट्र-गौरव : गुरु तेग बहादुर’ के संपादित अंश)

परोपकार के कार्य

गुरु तेगबहादुर से पूर्व सिख गुरुओं ने जन-कल्याण और परोपकार के अनेक कार्य किए। गुरु नानकदेव के समय कुएं, सरोवर और प्याऊ बनवाकर यात्रियों के लिए स्वच्छ पानी की व्यवस्था की गई। जरूरतमंदों को निःशुल्क खाना खिलाने के लिए ‘लंगर की प्रथा’भी दशगुरु परंपरा के केंद्र में थी। बीमार और दिव्यांगों की सेवा के लिए धर्मशालाएं और चिकित्सालय खोले गए, जहां नि:शुल्क दवाएं मिलती थीं। कठिन समय में समाज के गरीब तबके को शासकीय करों से मुक्ति दिलवाने सहित कई अन्य परोपकारी कार्य सिख गुरुओं की प्राथमिकता रहे। गुरु तेग बहादुर ने इन जन-कल्याणकारी परंपराओं को आगे बढ़ाया।

कर्मयोगी साधक

गुरु तेग बहादुर अधिक समय तक पिता के पास नहीं रह पाए। उनके पिता और छठे गुरु हरगोबिंद ने अमृतसर के पास कीरत पुर को अपना कार्यक्षेत्र बनाया, जहां दुर्ग-निर्माण और योजना पूरी हुई। लेकिन कुछ समय बाद ही उन्हें अपने जीवन के अंतिम समय का आभास हुआ तो अपने पौत्र व बड़े पुत्र गुरदित्ता के सुपुत्र हरिराय को गुरु पद के लिए मनोनीत किया। फिर पत्नी गूजरी को गुरु तेग बहादुर के साथ ननिहाल बकाला भेज दिया। यहीं से उनके जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ। यह ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम का अनूठा संगम था। बकाला में उन्होंने तपस्या, ध्यान और आत्म-साधना की। यह समय उनकी अंतर्मुखी साधना का काल था, जिसमें वे सादगी और संयम के साथ एकांतवास में रहे। सामाजिक और धार्मिक जगत से दूर, उनके मुखमंडल पर दिव्य तेज, वाणी में गंभीरता और मन में गहरी शक्ति झलकने लगी। आसपास के लोग उन्हें ‘बाबा तेगा’ कहते थे। बकाला में उन्होंने 22 वर्ष, 9 माह और कुछ दिन की एकांत साधना की। इन दो दशकों में गुरु परिवार कठिन उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरा। तब माता नानकी और गूजरी ने उनसे कर्मक्षेत्र में पदार्पण करने का अनुरोध किया। इस बीच, उन्हें नौंवा गुरु घोषित किया गया, जिसमें एक व्यापारी और धर्मनिष्ठ श्रद्धालु सेवक मक्खनशाह ने विशेष भूमिका निभाई। देखते-देखते बकाला का साधना गृह गुरु दरबार में बदल गया। पंथ के केंद्र अमृतसर में ईर्ष्यालु प्रतिस्पर्धियों ने जब गुरु तेग बहादुर के लिए बंद कर दिए तो उन्होंने विलासपुर के पास जमीन खरीद कर अपनी माता के नाम पर ‘चक ननकी ’ नामक नया केंद्र स्थापित किया,जो बाद में ‘आनंदपुर साहिब’ नाम से विख्यात हुआ।

Topics: बलिदानमुगल आक्रांता औरंगजेबपाञ्चजन्य विशेषश्री गुरु तेग बहादुरShri Guru Tegh Bahadurडॉ. राम प्रकाश धर्मत्यागत्रस्त हिंदु
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देवभूमि से वीरभूमि: सैन्य धाम देहरादून – बलिदानियों का स्मारक और प्रेरणा स्थल

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