विश्व इतिहास में स्वधर्म, स्वदेश, मानवीय मूल्यों और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर का स्थान अद्वितीय और कालजयी है। इसी कारण उन्हें ‘सृष्टि की चादर’, ‘हिंद दी चादर’, ‘भारत की ढाल’ और ‘मानवता के पिता’ जैसी उपमाएं दी गई हैं।

इतिहास संकलन समिति, महाकाैशल प्रांत
सिखों के नौवें गुरु, तेग बहादुर जी का जन्म वैशाख कृष्ण पंचमी को (सिख नानकशाही पंचांग, संवत् 557) अमृतसर में गुरु हरगोबिंद और माता नानकी के यहां 1 अप्रैल, 1621 को हुआ। यहीं अब गुरुद्वारा ‘गुरु के महल’ है। उनके बचपन का नाम ‘त्यागमल’ था। गया। वे बाल्यावस्था से ही संत स्वभाव, विचारवान, उदार और निर्भीक थे। गुरु हरगोबिंद जी जब पहली बार पुत्र से मिलने आए तो उनके साथ तीन अनुयायी भी थे, जिन्होंने बालक के साहस और परोपकार के लिए परमशक्ति से प्रार्थना की। भाई गुरदास जी, बाबा बुड्ढा जी और भाई विधी चंद जी ने उनके व्यक्तित्व में साहस, चिंतनशीलता व विनयशीलता के गुण भरने में अहम भूमिका निभाई। गुरु तेग बहादुर साहिब ने धर्म व जनकल्याण के लिए अनेक आदर्शों का पालन किया। 1632 ई. में मात्र 11 वर्ष की आयु में उनका विवाह बीबी गूजरी जी से हुआ था। हिंदुत्व व मानवता रक्षा के लिए गुरुजी ने 11 नवंबर, 1675 को सर्वोच्च बलिदान दिया, जिसे नानक शाही पंचांग में तिथि के अनुसार 24 नवंबर निर्धारित किया गया है। भारत की अस्मिता के लिए दिए गए उनके बलिदान को इन शब्दों में याद किया जाता है, ‘वे झुके नहीं, बलिदान स्वीकार किया।’
अप्रतिम योद्धा
अप्रैल 1635 में करतारपुर में लड़ाई छिड़ गई। एक तरफ मुगल फौजदार पैदे खां की अगुआई में मुगल आक्रांताओं की सेना थी, तो दूसरी ओर गुरु हरगोबिंद सिंह एवं उनके अनुयायी थे। तब त्यागमल मात्र 14 वर्ष के थे। पिता से अनुमति लेकर वे युद्ध के लिए निकल पड़े। 26 अप्रैल, 1635 को इस युद्ध में पैदे खां मारा गया और सिखों ने विजय प्राप्त की। इस युद्ध में अदम्य साहस और वीरता का प्रदर्शन करने पर त्यागमल को ‘तेग बहादुर’ की उपाधि दी गई। इसके बाद पिता ने उन्हें लंबी साधना के लिए प्रेरित किया। 1644-64 तक, यानी 20 वर्ष तक वे बाबा बकाला में तप में लीन रहे।
30 मार्च, 1664 को गुरु तेग बहादुर ने नौवें गुरु के रूप में गद्दी संभाली। 22 नवंबर, 1664 को वे श्री दरबार साहिब, अमृतसर के दर्शनार्थ गए और 16 जून, 1665 को आनंदपुर में ‘चक नानकी’ की नींव रखी। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित उनकी वाणी में 56 सबद और 57 श्लोक शामिल हैं, जिन्हें भोग (पाठ समाप्ति) का श्लोक भी कहा जाता है।
1658 ई. में औरंगजेब बादशाह बना और शरियत लागू करने का फरमान सुनाया। उसने हिंदुओं के मंदिरों और पाठशालाओं को तोड़ने का आदेश दिया, लेकिन गुरु तेग बहादुर ने इन फरमानों को मानने से इनकार किया। 1666-69 तक वे देश के विभिन्न क्षेत्रों, विशेषकर पटना के आसपास धर्म प्रचार करते रहे। वे जहां भी गए, निराश-हताश हिंदू जनता में आशा और उत्साह का संचार हुआ। बड़े-बड़े संत-महात्मा, सूफी-औलिया, राजा और नवाब, सभी उनके संपर्क में आकर श्रद्धा से झुक जाते थे। इस बीच, औरंगजेब के अत्याचार बढ़ते गए। उसका उद्देश्य हिंदू धर्म को मिटाकर इस्लाम फैलाना था।

हिंदुओं पर अत्याचार
अपने शासनकाल में औरंगजेब ने मथुरा, गुजरात, उड़ीसा, बनारस, बंगाल, राजस्थान, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए। हिंदुओं पर जजिया कर फिर से लगाया, जिसे अकबर ने समाप्त कर दिया था। उसने अधिकारियों को हिंदुओं का जबरन कन्वर्जन कराने और उनके धार्मिक प्रतीकों, जैसे तिलक और जनेऊ को हटाने का आदेश दिया था। उसका आदेश था कि हर दिन सवा मन जनेऊ (लगभग 46 किलो) हिंदुओं के गले से उतारकर (उनका कन्वर्जन कर या मार कर) उसके सामने पेश किए जाएं। अनेक हिंदू इस्लाम कबूलने को मजबूर हुए, क्योंकि विरोध करने वालों को मार दिया जाता था। इसी नीति के तहत काशी, हरिद्वार, प्रयाग और कश्मीर में हिंदुओं पर कन्वर्जन के लिए अमानवीय अत्याचार किए जा रहे थे।
जब गुरु तेग बहादुर पूर्वांचल क्षेत्र की यात्रा के बाद आनंदपुर लौटे, तब 25 मई, 1675 को पीड़ित हिंदुओं के प्रतिनिधियों ने उनके समक्ष उपस्थित होकर रक्षा की याचना की। इसमें कश्मीर के 500 हिंदू पंडित थे, जिनके मुखिया किरपा राम थे। उन्होंने गुरुजी को औरंगजेब के अत्याचारों से अवगत कराया और मदद की गुहार लगाई। जिस समय यह बातचीत चल रही थी, उसी समय गुरुजी के पुत्र बालक गोबिंद राय जी आ गए।
उन्होंने पूछा, ‘पिताजी आप क्या सोच रहे हैं?’ गुरुजी बोले, “औरंगजेब हिंदू धर्म को मिटाना चाहता है। उसने हिंदुओं को मुसलमान बनाने का हुक्म दे दिया है। वह समझता है कि इस्लाम ही सच्चा मजहब है।” बालक गोबिंद ने फिर पूछा, ‘‘पिताजी, फिर उसके अत्याचारों को कैसे रोका जाए?” गुरुजी बोले, “किसी महापुरुष की कुर्बानी से ही औरंगजेब के जुल्म को रोका जा सकता है।” बाल गोबिंद ने सहजता से कहा, “पिताजी, आपसे बड़ा महापुरुष और कौन है ,जो इतनी बड़ी कुर्बानी दे सके।” अपने बेटे के साहसिक उत्तर से गुरुजी बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कुर्बानी देने का मन बना लिया। उन्होंने कश्मीरी पंडितों से कहा, “जाओ अपने इलाके की हाकिम इफ्तिखार खान से कहो कि वह पहले तेग बहादुर को इस्लाम कबूल करने के लिए तैयार करे, फिर हम सब मुसलमान बन जाएंगे।” यह खबर इफ्तिखार खान तथा औरंगजेब तक पहुंची। उन दिनों औरंगजेब आगरा में था। यह सुनकर वह क्रोधित हो उठा और गुरु तेग बहादुर को गिरफ्तार कर दिल्ली लाने का आदेश दे दिया, साथ ही उन पर इनाम भी घोषित किया गया।
गुरु महाराज की निर्भीकता
इस बीच, 8 जुलाई, 1675 को गुरु महाराज ने बालक गोबिंदराय (गुरु गोबिंद सिंह) को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। फिर औरंगजेब के आदेश की प्रतीक्षा किए बिना, दो-तीन दिन बाद ही तीन शिष्यों-भाई मतीदास, भाई सतीदास और भाई दयाल दास को साथ लेकर दिल्ली की ओर रवाना हो गए। चौथे शिष्य भाई गुरदित्ता को उन्होंने पांच पैसे और नारियल देकर आनंदपुर साहिब गुरु-तिलक करने भेज दिया था। लेकिन कुछ मील चलने के बाद 12 जुलाई को रोपड़ के अधिकारी मलिक नूर मुहम्मद ने तीनों शिष्यों के साथ गुरु महाराज को गिरफ्तार कर लिया। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, औरंगजेब ने नवम् गुरु की गिरफ्तारी का आदेश तब दिया था, जब वे मालवा और बांगड़ की यात्रा पर थे। बादशाह के आदेश के तहत नवम् गुरु और उनके साथियों को पहले सरहिंद भेजा गया, फिर लगभग चार माह बाद पिजरे में बंद करके उन्हें सल्तनत की राजधानी दिल्ली लाया गया। गुरु महाराज को औरंगजेब के सामने प्रस्तुत किया गया। औरंगजेब ने उन से इस्लाम कबूलने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने शांतभाव से इनकार कर दिया। इस पर मुगल आक्रांता ने पूछा, ‘क्या तुम मौत से भी नहीं डरते?’ गुरुदेव बोले- ‘डर किस बात का?’
भय काहू को देत नहीं, नहि भय मानत आन।
और, चिंता ताकी कीजिए, जो अनहोनी होय इह मारग संसार में, नानक थिर नहि कोय।
यह सुनकर औरंगजेब झल्लाया। उसने खिसियाते हुए कहा, ‘अच्छा, अगर तुम इस्लाम कबूल नहीं करते तो कोई करामात दिखाओ। हम तुम्हें छोड़ देंगे।’ इस पर गुरु महाराज ने कहा, ‘‘मैं एक साधारण मनुष्य हूं। चमत्कार मेरे हाथ में नहीं, ईश्वर के हाथ में है।’’

गुरु और शिष्यों का बलिदान
इस पर तिलमिलाए औरंगजेब ने तीनों शिष्यों को बंदीगृह से बुलवाया। तीनों को चांदनी चौक कोतवाली के सामने चौक पर एक वृक्ष के नीचे लाया गया। भाई मतीदास को गुरु महाराज के सामने बांधकर आरे से चिरवा दिया गया। भाई दयाल दास को खौलते पानी की देग में डाल दिया गया और भाई सतीदास को रुई में लपेट कर जिंदा ही जला दिया गया। यह मुगलिया बर्बरता गुरु तेग बहादुर के सामने एक ही दिन और एक ही स्थान पर हुई। लेकिन गुरुजी विचलित नहीं हुए और झुके नहीं। जब मुगल आक्रांता औरंगजेब किसी भी तरह गुरु तेगबहादुर को धर्म से डिगा न सका तो उसने उनका सिर कलम करने का आदेश दिया।
डॉ. राम प्रकाश अपनी पुस्तक ‘राष्ट्र-गौरव : गुरु तेगबहादुर’ में लिखते हैं कि इससे पहले कि गुरु महाराज का शीश कटकर भूमि पर गिरता, एक युवक फूर्ति के साथ रक्षक-पंक्ति फांदता हुआ कूदकर उस स्थान पर आ गया, जहां जल्लाद हाथ में तलवार लिए खड़ा था। उसने गुरुजी का शीश दोनों हाथों में थाम लिया और बिजली की सी गति से भीड़ को चीरता हुए अदृश्य हो गया। उस वीर युवक का नाम था-भाई जैता। उन्हें इतिहास में ‘रंगरेटे गुरु के बेटे’ के नाम से याद किया जाता है। अभी इस अनपेक्षित घटना से लोग और शासनाधिकारी उबर भी नहीं पाए थे कि दूसरी ओर से (जिधर आजकल कौड़िया पुल है) घोड़ों, ऊंटों और बैलगाड़ियों का एक बड़ा काफिला भीड़ में घुस गया। शाही ठेकेदार लक्खीशाह और उसके पुत्र नगासिया की ललकार ने सबको चौंका दिया।
दोनों काफिले के साथ आगे बढ़ रहे थे। उधर, उनके आने-जाने पर कोई रोक नहीं थी। वे धड़धड़ाते हुए कोतवाली चौक में घुसे और देखते-देखते नवम् गुरु का धड़ भी गायब हो गया। हालांकि, शाही घुड़सवारों ने उनका पीछा किया, लेकिन पिता-पुत्र ने दिल्ली के सीमावर्ती गांव रायसीना में ही जाकर दम लिया। उन्होंने बिना देरी किए गुरु महाराज की पार्थिव देह वाली सवारी को अपनी बड़ी हवेली में भीतर धकेल कर तुरंत उसे आग लगा दी। विधर्मी गुरु महाराज की पावन देह को छू भी न सके। उसी पावन स्थान पर आजकल गुरुद्वारा रकाबगंज विद्यमान है। दिल्ली के चांदनी चौक स्थित सीसगंज गुरुद्वारा वह स्थान है, जहां 11 नवंबर, 1675 को औरंगजेब ने लालकिले के प्राचीर पर बैठ उनका सिर कलम करवाया था।
यह तिथि नानकशाही जंतरी के अनुसार 24 नवंबर अवधारित है। उधर, गुरु महाराज का शीश लेकर भाई जैता सरपट घोड़ा दौड़ाते हुए आनंदपुर साहिब की ओर बढ़ रहे थे। रास्ते में एक पल भी विश्राम किए बिना वे कीतरपुर पहुंचे, जहां पूर्व सूचना पाकर माता नानकी, माता गूजरी तथा बाल गुरु गोबिंद राय सहित अन्य संगत प्रतीक्षा कर रही थी। वहां से गुरु महाराज का शीश पालकी में रखकर आनंदपुर लाया गया और विधिवत अंत्येष्टि की गई। निस्संदेह नवम् गुरु का यह बलिदान अभूतपूर्व था। धर्म की रक्षा के लिए इस सर्वोच्च बलिदान के कारण ही उन्हें ‘हिंद दी चादर’ कहा जाता है। गुरु तेग बहादुर का बलिदान मुगलों के पतन की नींव था। उन्होंने देश के लोगों में सांस्कृतिक चेतना और आत्मबलिदान की भावना जाग्रत की। उनका उपदेश था कि जन-कल्याण तभी संभव है, जब निजी स्वार्थ सीमित रखकर मानवता की सेवा की जाए व सांसारिक व आध्यात्मिक उन्नति के लिए निरंतर यत्न किए जाएं। यही ‘लोक सुखीए परलोक सुहेले’ का रहस्य है।

सिख गुरुओं का मुगलों से संघर्ष
गुरु तेग बहादुर के जन्म से लगभग 15 वर्ष पूर्व उनके पितामह गुरु अर्जुन देव को जहांगीर ने 1606 में मृत्युदंड दिया था, जिसे दशगुरु परंपरा में प्रथम बलिदान माना जाता है। उन्होंने जहांगीर के विद्रोही बेटे खुसरो को शरण व आशीर्वाद दिया था और अपने बढ़ते प्रभाव के कारण भी मुगल शासक की नाराजगी झेली। जहांगीर ने उन पर भारी जुर्माना लगाया और आदि ग्रंथ में संशोधन की मांग की, जिसे गुरुजी ने ठुकरा दिया। उन्हें लाहौर किले में कैद कर यातनाएं दी गईं। गुरु अर्जन देव को गर्म तवे पर बैठाया गया, गर्म रेत डाली गई। अंत में उन्होंने बलिदान को चुना। गुरु तेग बहादुर के पिता गुरु हरगोबिंद जी ने शाहजहां की सेनाओं से कई युद्ध किए और जहांगीर द्वारा उन्हें ग्वालियर के किले में भी बंद किया गया। मुक्त होते समय उन्होंने 52 हिंदू राजाओं-युवराजों को भी रिहा करवाया। इसी के बाद दीपावली पर ‘बंदी छोड़ दिहाड़ा’ का पर्व शुरू हुआ।
मुखलिस खान के नेतृत्व में 1628 में अमृतसर पर मुगल सेना के आक्रमण के दौरान गुरु तेग बहादुर मात्र सात वर्ष के थे। करतारपुर में पैदेखान और कालेखान ने जब गुरु हरिगोबिंद जी पर आक्रमण किया, तब वे 14 वर्ष के थे और शस्त्र विद्या में निपुण हो चुके थे। युद्ध में उन्होंने वीरता दिखाई। इसी के बाद उन्हें ‘तेग बहादुर’ की उपाधि मिली। गुरु हरि राय के समय औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को बंद बनाकर 1658 में सत्ता संभाली। गुरु हरि राय ने भी कभी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की। औरंगजेब के बुलावे पर भी दरबार में नहीं गए। गुरु गोबिंद सिंह के चारों साहिबजादों अजीत सिंह, जुज्झार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह ने भी धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दिया। 1705 में मुगल सेना ने जब गुरुजी को चारों ओर से घेरा, तब चमकौर के युद्ध में अजीत सिंह (18 वर्ष) और जुज्झार सिंह (14 वर्ष) वीरता दिखाते हुए बलिदान हुए। इसी समय सरहिंद में जोरावर सिंह (9 वर्ष) और फतेह सिंह (6 वर्ष) ने निर्भीकता से कन्वर्ट होने से इनकार किया और दीवार में जीवित चिनवाए गए।

















