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आधारहीन तर्क का खतरा !

याैन संबंध के लिए किशोरों की सहमति की आयु घटाने का प्रस्ताव केवल कानून में बदलाव नहीं होगा, बल्कि भारतीय समाज की सुरक्षा-रेखा पर सीधा प्रहार भी होगा। अगर ऐसा हुआ तो हमारे बच्चों को एक खतरनाक अनिश्चितता की ओर ढकेल देगा

Written byउदय भदौरियाउदय भदौरिया
Nov 20, 2025, 10:31 pm IST
in भारत, मत अभिमत

वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह (एमिकस क्यूरी) द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय में हाल ही में दायर की गई याैन संबंध के लिए सहमति की आयु सीमा को 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष करने की याचिका ने राष्ट्रीय स्तर पर एक गंभीर और अहम मुद्दे पर बहस छेड़ दी है। हालांकि इसके समर्थक इसे एक आधुनिक और विकासशील समाज के लिए आवश्यक सुधार मान रहे हैं, लेकिन क्या किसी ने इसके परिणामों के बारे में विचार किया? यह प्रस्ताव भारत के युवाओं के सुरक्षा हितों और कल्याण के लिए गंभीर खतरा है। याैन संबंध के लिए आयु सीमा कम करने से न केवल बच्चों को दी जाने वाली बुनियादी सुरक्षा से समझौता होगा, बल्कि कानूनी विवादों और सामाजिक व्यवस्था भी डगमगाने लगेगी। परिणामस्वरूप हमारे देश का माहौल जटिल हो जाएगा।

‘सहमति’ की उम्र कम करने के पीछे दिया गया तर्क एक खतरनाक धारणा को पोषित करता है- “परिपक्व नाबालिग”। इसके अनुसार एक किशोर में अपनी यौन इच्छाओं के संबंध में सही निर्णय लेने की समझदारी और भावनात्मक क्षमता होती है। लेकिन वास्तव में यह एक मनोवैज्ञानिक और जैविक विसंगति ही नहीं, न्यायिक विरोधाभास भी है। भारतीय बच्चों की विभिन्न चिंताओं और सुरक्षा सरोकारों के तहत यह आवश्यक है कि हम ऐसे संबंध की सहमति की उम्र 18 वर्ष ही बनाए रखें-एक पुराने कानून के तौर पर नहीं, बल्कि एक उपयुक्त सुरक्षा कवच के रूप में।

सुरक्षा कवच का सवाल

‘सहमति’ की उम्र कम करने का कानून भूचाल पैदा कर सकता है। किशोरों की सुरक्षा के लिए संतुलित और गहन विचार-विमर्श के बाद तैयार किए गए मौजूदा सुरक्षात्मक कानून—यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 और किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (जेजे अधिनियम)- के तहत उपलब्ध कराई जा रही वर्तमान सुरक्षा उत्कृष्ट कानून का उदाहरण है। पॉक्सो अधिनियम में ‘बच्चा’ एक स्पष्ट परिभाषा द्वारा निर्धारित किया गया है, जिसकी आयु सीमा 18 वर्ष से कम है। यह बाल शोषण के विरुद्ध समस्त प्रकार की सुरक्षा का कवच प्रदान करता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्तमान कानून में पहले से ही नाबालिगों के बीच के संबंधों के लिए आवश्यक सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं। पॉक्सो अधिनियम की धारा 34(1) में कहा गया है कि अपराध करने वाले बच्चों के मामले अनिवार्य रूप से किशोर न्याय अधिनियम के तहत संबोधित किए जाएं। किशोर न्याय बोर्ड बच्चों को कारावास (धारा 18, किशोर न्याय अधिनियम) के बजाय परामर्श या सामुदायिक सेवा जैसे पुनर्वास कार्यों से जोड़ने का आदेश जारी करता है। ‘सहमति’ की आयु कम करना कांटों की बाड़ तैयार करने के समान है, जो बच्चों के सुरक्षा कवच को छलनी कर देगा।

इससे उत्पन्न कानूनी जटिलताएं पॉक्सो अधिनियम को तो प्रभावित करेंगी ही, माता-पिता की संरक्षकता (कानूनी अभिरक्षा से अपहरण) के रास्ते में भी रोड़ा बनेंगी। माता-पिता के वैध संरक्षकता के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक है कि ‘सहमति’ की आयु 18 वर्ष हो। यदि इसे घटाकर 16 कर दिया गया तो यह भारतीय दंड संहिता/भारतीय न्याय संहिता के वैध संरक्षकता से अपहरण संबंधी प्रावधानों में दोष पैदा करेगा। ऐसे बदलाव कानूनी विरोधाभास पैदा करेंगे, क्योंकि इसके तहत जहां एक ओर 16 वर्ष की उम्र को किसी किशोर या किशोरी को यौन सहमति देने में सक्षम परिपक्व आयु माना जाएगा, वहीं बाल और किशोर श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 के तहत वे “किशोर” की श्रेणी में आएंगे जिन्हें आर्थिक शोषण से सुरक्षा की आवश्यकता होती है। यह असंगति सुरक्षा उपायों को कमजोर और जोर-जबरदस्ती, तस्करी और बाल श्रम के खतरे को बढ़ा सकती है।

16 साल के बच्चे को अपनी सहमति जताने की आज़ादी देने का तर्क दशकों के मनोवैज्ञानिक शोध और हमारी कानूनी व्यवस्था में अंतर्निहित विचारों की अनदेखी करता है। हमारे कानून में पहले से ही माना जाता है कि नाबालिगों में दीर्घकालिक परिणामों के संबंध में निर्णय लेने की परिपक्वता नहीं होती। 16 वर्ष का किशोर देश के भविष्य से जुड़े निर्णय लेने की प्रक्रिया में वोट नहीं दे सकता; वह कानूनी अनुबंधों पर हस्ताक्षर नहीं कर सकता, और माता-पिता की सहमति के बिना बड़ी सर्जरी नहीं करवा सकता। ऐसे में यह मानना कि वही किशोर या किशोरी यौन संबंधों के लिए सहमति देने जैसी गहरे भावनात्मक, शारीरिक और कानूनी परिणामों को समझने और संभालने में सक्षम है- एक गहरी न्यायिक विसंगति है।

पॉक्सो अधिनियम की अठारह वर्ष की आयु सीमा डिजिटल खतरों के विरुद्ध एक सुरक्षात्मक ढाल है। इन कानूनी और प्रौद्योगिकीय चुनौतियों के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर स्थितियों पर ध्यान देना भी जरूरी है। जोर-जबरदस्ती की घटनाएं, विश्वासघात और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलाया गया दुष्प्रचार गंभीर भावनात्मक परिणाम उत्पन्न करता है। पीड़ित अक्सर अवसाद, तनाव से ग्रसित हो जाते हैं और उनमें आत्मघाती प्रवृत्तियां पनपने लगती हैं। चिंता की बात यह है कि आज भारत में पंद्रह से उन्नीस वर्ष की आयु की लड़कियों में आत्महत्या की दर बढ़ती जा रही है। ऑनलाइन याैन अपराधियों का खतरा और पारिवारिक अलगाव एक पूरी पीढ़ी को बर्बादी के कगार पर धकेल रहा है। ऐसे में ‘सहमति’ की उम्र कम करना पहले से ही गंभीर बनी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझ रहे देश में एक और संकट को न्योता देने जैसे है।

नई दिल्ली के एम्स और दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित संगोष्ठी की रिपोर्ट के अनुसार, किशोर लड़कियों-विशेष रूप से अठारह वर्ष से कम आयु की लड़कियों-को गर्भावस्था के दौरान गंभीर शारीरिक जोखिमों का सामना करना पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, किशोर माताओं की प्रसव के दौरान मृत्यु की संभावना बीस वर्ष की महिलाओं की तुलना में दोगुनी होती है।

भारत में एनीमिया की भयावह समस्या के कारण यह खतरा और बढ़ जाता है, जहां लगभग साठ प्रतिशत किशोरियां आयरन की कमी से जूझ रही हैं। इसके परिणामस्वरूप मातृ रोग, कम वजन वाले शिशु और शिशु मृत्यु दर के भयावह आंकड़े सामने आते हैं। गर्भनिरोधक द्वारा इन जोखिमों को कम करने की बात भी अप्रभावी साबित हुई है, क्योंकि दस प्रतिशत से भी कम किशोरियां आधुनिक गर्भनिरोधक विधियों का उपयोग करती हैं, न ही उन्हें इसकी सही जानकारी मिलती है, न ही ये उपाय आसानी से उपलब्ध हैं। भ्रांतियां अलग से फैली हुई हैं। देखा जाए तो गर्भनिरोधक जरूरतमंदों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे रहे, बल्कि स्वास्थ्य प्रणालियों द्वारा लीपापोती के साधन बनकर रह गए हैं और किशोरियां असुरक्षित गर्भपात के बाद जीवनभर स्वास्थ्य दुष्परिणाम झेलने को विवश हैं।

प्रगति का पैमाना नहीं

‘सहमति’ की आयु कम करना प्रगति का पैमाना नहीं है। यह भ्रम और असुरक्षा की ओर लौटने जैसा है। समाधान कानूनी सुरक्षा को नष्ट करने में नहीं, बल्कि उन प्रणालियों को मजबूत करने में है, जो किशोरों को खिलने और सुरक्षित रहने का अवसर देती हैं। एक संवेदनशील और व्यावहारिक दृष्टिकोण हेतु तीन बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है-

पहला, किशोर न्याय अधिनियम के सुधार संबंधी कदम ऐसे किशोरों के लिए अनिवार्य, आलोचनारहित सकारात्मक परामर्श और पुनर्वास सुनिश्चित करें जिन्होंने ‘मित्रतापूर्ण’ संबंध बनाए हैं, उन्हें दंडित करने के बजाय मार्गदर्शन और भावनात्मक समर्थन प्रदान करें। दूसरा, भारत को नीतिगत कमियों को दूर कर किशोर स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में, जहां प्रति 100,000 लोगों पर मात्र 0.75 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, पेशेवरों की भारी कमी को दूर करना चाहिए, और किशोरियों के लिए ऐसे स्वास्थ्य क्लीनिक उपलब्ध कराने चाहिए जहां वे गोपनीयता और सम्मान के साथ उपचार प्राप्त कर सकें।

तीसरा, शिक्षा प्रणाली में व्यापक यौन शिक्षा (सीएसई) का संतुलित मॉडल शामिल किया जाना चाहिए, जो युवाओं को प्रजनन संबंधी सही जानकारी दे और अपरिपक्व उम्र में बनाए गए यौन संबंधों से जुड़े मनोवैज्ञानिक, डिजिटल और स्वास्थ्य संबंधी खतरों के प्रति जागरूक करे।

इसलिए, याैन संबंध के लिए ‘सहमति’ की उम्र अठारह वर्ष बनाए रखना पिछड़ेपन की निशानी नहीं, बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन, सुरक्षा और सम्मान के अधिकार पर आधारित एक संवैधानिक रूप से सुदृढ़ नियम है। इस सुरक्षा कवच को कमजोर करना भारत के युवाओं को ऐसे अंधे कुएं में धकेलने जैसा है जिसके लिए वे न तो भावनात्मक रूप से तैयार हैं, न ही सामाजिक रूप से।

Topics: mianपाञ्चजन्य विशेषसहमति की आयुइंदिरा जयसिंहकिशोर न्यायकिशोर न्याय बोर्डकानूनी अभिरक्षा से अपहरणसर्वोच्च न्यायालयकानूनी अनुबंधों पर हस्ताक्षरपॉक्सो अधिनियमसुरक्षा-रेखाकारावासउदय भदौरियाभारतीय दंड संहिता
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