जब मजहब का नशा सिर पर चढ़ जाता है, तो दुनिया क्या कर सकती है? उस हालत में पढ़ा-लिखा और अनपढ़-दोनों एक जैसी भाषा बोलने लगते हैं, हिंसा और कट्टरता की भाषा। शायर अकबर इलाहाबादी ने ठीक ही कहा था- “कह गए मियाँ घूरन, दुनिया रोटी, मज़हब चूरन”-यानी मजहब का चूरन इतना ताकतवर है कि वह पूरी दुनिया को पचा सकता है।
दिल्ली बम धमाकों से पहले पकड़े गए चार शिक्षित डॉक्टरों के पास विस्फोटक और AK-47 जैसे हथियार मिले। आधुनिक दौर का सबसे कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन एक इजीनियर था। और सबसे विकसित लोकतंत्रों में भी, पढ़े-लिखे और सम्पन्न लोग ISIS जैसे खूनी संगठनों में शामिल हुए।
भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में डॉ. भीमराव अंबेडकर और सरदार पटेल ने साफ कहा था कि इस्लाम और हिन्दू धर्म दो बिल्कुल भिन्न दर्शन हैं-जिनके अनुयायी एक ही देश में स्थायी रूप से शांतिपूर्वक नहीं रह सकते। यह कोई द्वेष नहीं था, बल्कि जमीनी सच्चाई का आंकलन था।
पश्चिमी देशों में बहुसांस्कृतिकता की बुनियाद हिली
उनकी स्पष्टता ने नेहरू के बहु-सांस्कृतिक और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सपनों का खोखलापन उजागर कर दिया-जो विचार तो महान थे, पर वास्तविकता से कोसों दूर। यही संघर्ष आज पश्चिमी देशों में भी देखने को मिल रहा है, जहां धर्म और संस्कृति की असमानता ने बहुसांस्कृतिकता की बुनियाद हिला दी है। यहां तक कि वे देश भी, जहां दशकों तक साम्यवादी शासन रहा और धर्म को “अफीम” कहा गया, आज मजहबी हिंसा में जल रहे हैं।
लोकतांत्रिक देशों में नीतियां
आज दुनिया-खासकर लोकतांत्रिक देश-एक बड़े चौराहे पर खड़े हैं। सवाल यह है: ऐसे लोगों से कैसे निपटा जाए जो दुनिया को मजहब से परे देखने से इनकार करते हैं और मानते हैं कि उनका रास्ता ही एकमात्र सत्य है? क्या चीन जैसा कठोर नियंत्रण मॉडल अपनाया जाए, या विक्टर ऑरबान और डोनाल्ड ट्रम्प जैसी निर्णायक नीतियां? अगर जनता की नब्ज़ को देखा जाए, तो ऑरबान और ट्रम्प इस मुद्दे पर आम नागरिकों की भावना से अधिक जुड़ते नजर आते हैं।
मजहबी उग्रवादियों पर शिकंजा
पश्चिमी देशों में आम नागरिक अब अपने ही देश में पराये होने का एहसास कर रहे हैं—अपनी सभ्यता और संस्कृति को धीरे-धीरे मिटते हुए देखते हुए। इस्लामी देशों में भी यही हकीकत दिखती है। मिस्र और अल्जीरिया में सेना ने मजहबी उग्रवादियों को कुचलकर स्थिरता और आर्थिक विकास का रास्ता खोला। जॉर्डन और मोरक्को ने आधुनिकता और मजहब में संतुलन बनाकर प्रगति की दिशा पकड़ी। वहीं, ईरान में लाखों लोग आज भी मौलवियों की तानाशाही से आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं।
संदेश बिल्कुल साफ है-जब मजहब राजनीति पर हावी हो जाता है, तो वह न केवल आस्था को बल्कि स्वतंत्रता को भी नष्ट कर देती है। और अगर लोकतंत्रों ने कट्टरता पर जल्द और सख्त कदम नहीं उठाए, तो यह काफी नुकसान पहुंचा सकती है।

















