अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन में डॉ. विद्या विन्दु सिंह का व्याख्यान: लोकसाहित्य में आत्मबोध से विश्वबोध
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अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन में डॉ. विद्या विन्दु सिंह का व्याख्यान: लोकसाहित्य में आत्मबोध से विश्वबोध

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन में पद्म श्री डॉ. विद्या विन्दु सिंह ने लोकसाहित्य के माध्यम से आत्मबोध से विश्वबोध की गहन चर्चा की। राम, कृष्ण, शिव की कथाओं से सनातन संस्कृति का आधार समझाया। आध्यात्मिक चेतना और प्रकृति का अभिन्न भाव जानें।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Nov 9, 2025, 09:17 pm IST
inमध्य प्रदेश
akhil Bhartiya sahitya Parishad Loksahitya dr Vidya vindu

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के पंचम सत्र को संबोधित करतीं पद्मश्री डॉ विद्या विन्दु

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन के तृतीय दिवस पंचम सत्र में पद्म श्री सम्मान से सम्मानित साहित्यकार डॉ विद्या विन्दु सिंह ने लोकसाहित्य के विषय पर बात की। उन्होंने कहा कि आत्मबोध से विश्वबोध इस कार्यक्रम का थीम है, लेकिन आज आत्मबोध ही नहीं रह गया है। आज जो आत्मबोध है वो उपभोक्ता बोध में बदल गया है। आत्मा का सुख भौतिक सुख सुविधाओं के फेर में फंस चुका है। लोक स्वर में आत्मचिंतन से अधिक आत्मबोध है।

लोक तो भगवान राम का उपासक है जो कि विश्व की चिंता करते हुए अपने भौतिक सुख का परित्याग करता है। लोक श्रीकृष्ण को भी पूजता है, क्योंकि वो सबके दुखों के पहाड़ को अपनी कनिष्ठिका उंगली पर उठा लेते हैं और सभी की पीड़ा को अपने में आत्मसात करते हुए मुस्कराते रहते हैं और अपनी वंशी की मधुर स्वर में सभी का आल्हादित करते हैं। किसी की भी आत्मा को किंचित मात्र भी दुख न पहुंचे यही हमारी संस्कृति का भाव है। कहते हैं न कि किसी को सुख देकर आत्मा को शांति मिलती है, और ये बोध ही पर्याप्त होता है।

लोक भगवान शिव का भी उपासक है, जो अपनी प्रिय पार्वती के साथ मंगल भाव को आत्मसात करने के लिए विश्व का भ्रमण करते हैं और समुद्र मंथन से निकले गरल को अपने गले में ही रोक लेते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उसे निगलने से उदर में मौजूद समस्त संसार को कष्ट होगा। ऐसे शिव हमारे आराध्य हैं। भगवान शिव के द्वारा क्रोध में किया गया तमस तांडव नृत्य को दुनियाभर में प्रसिद्ध है, लेकिन उनका एक अन्य नृत्य भी है, जिसे प्रेरणा कहते हैं। इसे देशी तांडव नृत्य कहा गया है, जिसमें शास्त्रीय नृत्य की समस्त गति का समावेश होता है।

भगवान शिव के इस नृत्य को आचार्यों ने योग नृत्य भी कहा है। इसमें मां त्रिपुर सुंदरी को आसन पर बैठाकर भोलेनाथ नृत्य करते हैं। भगवान शिव के इस नृत्य की विशेषता यह हैं कि इसमें वीर रस होता है और वे इसे अपनी प्रिय त्रिपुर सुंदरी की शक्ति और करुणा को पाने के लिए करते हैं। लोक साहित्य का यही आत्मबोध विश्व बोध है। ये आज सनातन संस्कृति का आधार है।

संसार भिन्न-भिन्न होकर भी अभिन्न है और यही आत्मबोध विश्व बोध है। लोक संस्कृति में प्रकृति के चर-अचर रूप में अभिन्न भाव की घोषणा अपने लोकाचारों, कहावतों, गीतों और कथाओं में की गई है। देवों-पितृों की कल्पना विभिन्न पशु, पक्षियों, वृक्षों और जड़ वस्तुओं में करके हम विश्व बोध को उजागर करते आए हैं। लोक साहित्य आध्यात्मिक चेतना, उसके अभ्यास और संकल्प में सहर्ष संलग्न रहा है। इसके लिए वह अनुभवों की कसौटी पर कसकर अभिव्यक्ति देता है। लोक मन आर्य संस्कृति की सामाजिक सांस्कृतिक विरासत के प्रति श्रद्धा रखते हुए प्रकृति का आह्वान करते हुए उसके विश्वास से मंगल की कामना करता रहता है।

इसके अलावा लोक प्रचिलत रामलीला विश्वबोध का मार्ग है। श्री राम का पूरा जीवन ही विश्वबोध की अनुभूति कराता है।

Topics: लोकसाहित्य व्याख्यानविश्वबोधDr. Vidya Vindu Singhअखिल भारतीय साहित्य परिषदFolk literature lectureसनातन संस्कृतिVishwabodhSanatan SanskritiAll India Sahitya ParishadAll India Sahitya Parishad 17th sessionSelf-Realizationआत्मबोधडॉ. विद्या विन्दु सिंह
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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