गत 15 मई को भारत के इतिहास में एक ऐसा अध्याय जोड़ा गया, जिसका संदर्भ लंबे समय तक दिया जाएगा। इस दिन मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने धार स्थित भोजशाला को माता सरस्वती का मंदिर बताया और कहा कि आगे से अब केवल हिंदू ही वहां पूजा कर सकते हैं। आम लोगों की नजर में निर्णय का सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात तो यही है। लेकिन न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला तथा न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने अपने निर्णय में भारतीय संस्कृति एवं सनातन रीतियों का संदर्भ लेते हुए जो बातें कही हैं, वह शायद इससे पहले किसी भी खंडपीठ ने नहीं कही होगी। दोनों न्यायाधीशों ने अपने निर्णय में अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन द्वारा दिए गए तर्कों के संदर्भ में यह स्वीकार किया है कि किसी मंदिर में मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा वह प्रक्रिया है जिसके प्रभाव मूर्ति के खंडित होने के पश्चात भी बने रहते हैं। निर्णय में कहा गया है, “प्राण-प्रतिष्ठा एक जीवंत प्रक्रिया है। जिस प्रकार बीज, अन्न में रूपांतरित होता है या अन्न, मनुष्य के मांस में परिवर्तित होता है उसी प्रकार पत्थर से मूर्ति बनती है और प्राण-प्रतिष्ठा उस मूर्ति को दिव्य स्वरूप प्रदान करती है।”
न्यायमूर्ति द्वय द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा को सनातन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया बताते हुए कहा गया है, “दिव्य शक्ति द्वारा इस भौतिक विश्व में रूप धारण करने के संबंध में तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है ‘आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी।’ (निराकार शून्य से वायु उत्पन्न हुई, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी)… इस प्रकार इस विश्व में सब कुछ जिसमें हम स्वयं भी शामिल हैं, उसी दिव्य ऊर्जा से उत्पन्न हुए हैं। हमारा (सनातन का) यह विश्वास है कि हमारे सहित कण-कण में वह दिव्य उपस्थित है। परंतु इस विचार के साथ उस दिव्य से तादात्म्य स्थापित करना एक सामान्य व्यक्ति के लिए दुष्कर होता है, जबकि एक प्रिय आकार के साथ इस तादात्म्य को स्थापित करना श्रद्धालु को परमानंद प्रदान करता है।” “इस परिप्रेक्ष्य में जब एक सनातनी पत्थर के विग्रह की पूजा करता है तब वह पत्थर की नहीं सीधे उस दिव्य ऊर्जा की पूजा करता है जो उसके सामने एक मूर्ति के माध्यम से प्रकट होती है। यह एक ऐसा सत्य है जिसे मूर्ति-पूजा विरोधी सामान्यतः समझ नहीं पाते।”
न्यायमूर्ति द्वय ने अपने निर्णय में प्राण-प्रतिष्ठा के पीछे छुपे विज्ञान की भी चर्चा की है। लिखा गया है, “इस अत्यंत अलौकिक प्रक्रिया को कुछ हद तक आधुनिक भौतिक शास्त्र के क्वांटम एंटैंगलमेंट सिद्धांत के माध्यम से समझा जा सकता है। क्वांटम शास्त्र के इस सिद्धांत के अनुसार दो कण, चाहे वे एक-दूसरे से कितनी ही दूर हो, आपस में व्यवहार कर सकते हैं। अर्थात् एक-दूसरे से दूर होने पर भी एक कण, दूसरे कण पर प्रभाव डाल सकता है। क्वांटम एंटैंगलमेंट की यह प्रक्रिया न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों के काल में अकल्पनीय थी, क्योंकि यह प्रक्रिया समय, दूरी एवं वास्तविकता के स्थापित सिद्धांतों से परे है।”
परमहंस नित्यानंद की योग शक्ति एवं सिद्ध चेतना का उल्लेख करते हुए पीठ कहती है, “परमहंस नित्यानंद के पास वह दुर्लभ योग्यता है जिससे वे किसी जड़ वस्तु में भी अपनी अतीन्द्रिय शक्तियों के बल पर चेतना का संचार कर सकते हैं। इस प्रक्रिया के चलते प्राण-प्रतिष्ठा के पश्चात् वह मूर्ति और मनुष्य एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं और जुड़ाव का चक्र प्रारंभ हो जाता है। इस स्थिति में वह मूर्ति नित्यानंद के अस्तित्व का ही एक अतिरिक्त हिस्सा बन जाती है और उनके बीच सतत एक चैतन्य ऊर्जा प्रवाहित होने लगती है, फिर चाहे वे दोनों पृथ्वी के दो छोरों पर ही क्यों न हों!”
पीठ आगे कहती है, “सनातन धर्म में प्राण-प्रतिष्ठा समारोह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है। इस प्रक्रिया के माध्यम से भिन्न-भिन्न तत्वों का शुद्धिकरण कर उसमें चेतना प्रवाहित की जाती है और उन्हें पूजन के योग्य बनाया जाता है।” “किसी भी वस्तु को पवित्र एवं पूजनीय बनाने के लिए प्रार्थनाएं की जाती हैं। अभिषेक के माध्यम से शक्ति और तेज को प्रतिष्ठित किया जाता है और हवन के दौरान आहुतियां समर्पित की जाती हैं। एक विशेष विधिक माध्यम से वरुण के लिए आहुतियां दी जाती हैं, जो कि इस हवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।”
यहां यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि न्यायालय द्वारा शुष्क कानूनी एवं तकनीकी प्रमाणों से परे जाकर सनातन की संस्कृति, रीति-रिवाज और विधि-विधान को भी प्राथमिकता दी गई है। एक प्रकार से न्यायालय ने यह माना है कि जिस परिसर में एक बार प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हो चुकी हो, ऊपरी तोड़-फोड़ के बावजूद दिव्य चेतना का स्तर वहां बना रहता है।

उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह सिद्ध होता है कि लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में रखी मूर्ति, निस्संदेह वाग्देवी की ही है। इस संदर्भ में एक याचिका में यह भी मांग की गई थी कि उल्लेखित मूर्ति वाग्देवी की न हो कर अंबिका की है और यह कि इस आधार पर यह परिसर जैन मंदिर घोषित किया जाना चाहिए। न्यायालय द्वारा इस संबंध में स्पष्ट किया गया कि न ऐतिहासिक साहित्य में और न ही परिसर की वास्तु कला में ऐसे कोई प्रमाण मिले हैं जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके यह मंदिर पूर्व में एक जैन मंदिर था। पीठ द्वारा यह भी माना गया कि इस परिसर में हिंदू निरंतर पूजा करते आए हैं। समय—समय पर पूजा कार्य नियंत्रित किया गया, परंतु पूर्ण रूप से बंद कभी भी नहीं हुआ। न्यायालय द्वारा यह भी कहा गया कि एएसआई द्वारा जिस तरह से संपूर्ण सर्वेक्षण किया गया वह अत्यंत संतोषजनक था तथा पूर्णतः वैज्ञानिक था।
उपरोक्त सभी तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में पीठ द्वारा यह व्यवस्था दी गई कि इस आदेश के उपरांत एएसआई का 2003 का वह आदेश जिसके अनुसार हिंदू मंगलवार को पूजा करते आ रहे थे और मुस्लिम शुक्रवार को नमाज अदा करते थे, अब प्रभाव में नहीं रहेगा। यह परिसर भोजशाला मंदिर ही है और यहां हिंदू मां वाग्देवी की मूर्ति की स्थापना कर नित्य निरंतर पूजा करने के अधिकारी हैं। मुस्लिम पक्ष इस परिसर में नमाज अदा नहीं करेगा। यदि चाहे तो मुस्लिम पक्ष सरकार को मस्जिद या प्रार्थना स्थल हेतु भूमि की मांग कर सकता है और सरकार नियमानुसार धार जिले में उन्हें उचित भूमि आवंटित कर सकती है।
इस प्रकार ऐतिहासिक साहित्य, पुरातत्त्वीय प्रमाणों और सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विशेषताओं के आधार पर उच्च न्यायालय के आदेश द्वारा यह परिसर हिंदू समाज की धार्मिक गतिविधियों हेतु पूर्ण रूपेण खोल दिया गया है। इस न्यायालयीन आदेश को देखते हुए एएसआई द्वारा भी इस संदर्भ में आवश्यक आदेश जारी कर दिए गए हैं। परिणामत: 17 मई रविवार को एक भव्य समारोह में वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच मां सरस्वती की मूर्ति भोजशाला में स्थापित की गई और पूजा का क्रम प्रारंभ कर दिया गया। 800 वर्ष के बाद यह परिसर एक बार पुनः वैदिक मंत्रों से गुंजायमान हो रहा है।

परंपरा की पुष्टि
भोजशाला पर आए निर्णय का विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता श्री आलोक कुमार ने स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय भारत की सांस्कृतिक चेतना, सत्य एवं सनातन परंपरा की महत्वपूर्ण पुष्टि है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने यह निर्णय दे दिया है कि धार की भोजशाला हिंदू मंदिर है। न्यायालय के निर्णय से भोजशाला में अब हिंदुओं को निरंतर पूजा का अधिकार मिल गया है।
मुसलमानों के लिए भी कहा गया है कि वह सरकार से मस्जिद के लिए जगह मांग सकते हैं। उन्होंने कहा कि हम यह अपेक्षा करेंगे कि भोजशाला केवल मां वाग्देवी की पूजा का स्थान न रहे, अपितु पुरातन काल की तरह संस्कृत और धर्मशास्त्रों के अध्ययन का एक वैश्विक केंद्र बने। यह काम समाज और सरकार को मिलकर करना होगा। इस स्थान की ऊर्जा से पूरे जगत में आध्यात्मिक ज्योति फैलेगी।
उन्होंने कहा कि यह फैसला पूरी न्यायायिक पद्धति का पालन करके हुआ है। न्यायालय ने उस एएसआई को जांच करने के लिए नियुक्त किया था, जो इस बारे में भारत की सबसे विशेषज्ञ संस्था है। जांच की प्रतिलिपि दोनों पक्षों को दी गयी। दोनों पक्षों को अपना मत रखने के लिए पर्याप्त समय दिया। विद्वान न्यायाधीशों ने स्वयं मौके पर जाकर उस भवन का निरीक्षण भी किया।
श्री आलोक कुमार ने यह भी कहा कि इस प्रकार से एक वैज्ञानिक विश्लेषण करवाने के बाद, सबको सुनकर और प्रत्यक्ष भवन को देखने के बाद यह निर्णय आया है। माननीय उच्च न्यायालय ने उपलब्ध ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्यों एवं सतत हिंदू उपासना की परंपरा के आधार पर यह स्पष्ट रूप से माना है कि भोजशाला देवी वाग्देवी मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर एवं संस्कृत शिक्षा का केंद्र था। यह निर्णय केवल एक स्थल से जुड़ा विषय नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और सभ्यतागत अस्मिता से जुड़ा हुआ है। यह निर्णय संतुलित है, अच्छा है।
सब लोगों को यह निर्णय स्वीकार करना चाहिए।श्री आलोक कुमार ने यह भी कहा कि यह विषय किसी की हार या जीत का नहीं है। हम सभी को न्यायालयों के आदेशों एवं संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने सभी पक्षों से शांति, सौहार्द एवं सामाजिक समरसता बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि यह निर्णय किसी समुदाय की पराजय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सत्य एवं सांस्कृतिक न्याय की पुनर्स्थापना है।
उन्होंने आशा व्यक्त की कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार एवं एएसआई इस निर्णय के अनुरूप भोजशाला मंदिर के संरक्षण, व्यवस्थापन एवं संस्कृत अध्ययन की गौरवशाली परंपरा के पुनर्जीवन हेतु शीघ्र आवश्यक कदम उठाएंगे।

















