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मातृशक्ति की विजय पताका

यह विलक्षण बात है कि भारत, जिसे माता के रूप में पूजा जाता है और मातृशक्ति का प्रतीक माना जाता है। संयोग से भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने विश्वकप जीत कर इस विचार को सजीव रूप में प्रदर्शित किया है। यह जीत केवल खेल की सफलता नहीं, नारी शक्ति की मजबूती का प्रतीक है, जो भारत की संस्कृति व समाज की आत्मा में गहराई से बसी है

Written byप्रवीण सिन्हाप्रवीण सिन्हा
Nov 9, 2025, 09:49 pm IST
in भारत, विश्व, विश्लेषण, खेल

 भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने कप्तान हरमनप्रीत कौर के नेतृत्व में 2 नवंबर, 2025 को नवी मुंबई के डॉ. डीवाई पाटिल स्टेडियम में विश्वकप फाइनल में दक्षिण अफ्रीका को 52 रन से हराकर पहली बार महिला वर्ल्डकप खिताब जीतकर इतिहास रचा। मुंबई से लेकर दिल्ली, मोगा से मेरठ और हिमाचल से हरियाणा तक पूरे देश में भारत माता की जय के जयघोष गूंजे। भारतीय टीम ने अनूठी जीत का जश्न देर रात अपने थीम सॉन्ग ‘ना लेगा कोई पंगा… हम कर देंगे दंगा… रहेगा सबसे ऊपर हमारा तिरंगा’ के साथ मनाया। यह जीत न केवल क्रिकेट की बड़ी उपलब्धि है, बल्कि महिलाओं के लिए प्रेरणा और भारत की खेल विरासत का गर्व भी है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं के पहले वनडे विश्वकप का आयोजन 1973 में, यानी पुरुषों के मुकाबले दो वर्ष पहले हुआ था। तब से अब तक कुल 13 बार महिला क्रिकेट विश्वकप का आयोजन किया गया है, जिनमें ऑस्ट्रेलिया कुल 7 बार खिताब जीत चुका है।

विश्वास न डिगा

महिला क्रिकेट टीम की यह जीत खिलाड़ियों की मेहनत, दृढ़ता और टीम भावना की जीत है। टीम ने अपने चोटिल स्टार ओपनर प्रतिका रावल के बाहर होने के बावजूद संघर्ष किया और यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। प्रतिका की जगह टीम में शामिल शेफाली वर्मा ने निर्णायक पारी खेली और दीप्ति शर्मा ने गेंद से दम दिखाया। कप्तान हरमनप्रीत कौर व कोच अमोल मजूमदार ने ‘विजेता इकाई’ बनाकर टीम को विश्व क्रिकेट के शिखर पर पहुंचाया। टूर्नामेंट के दौरान कभी प्रतिका ने इतिहास रचा तो कभी स्मृति मांधना ने स्टारडम कायम रखा।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने विश्वकप के फाइनल में 2005 और 2017 में हार के बाद निरंतर मेहनत और रणनीति से विश्व की शीर्ष टीमों को मात दी। तीन मैच हारने के बाद हार से डरने के बजाय मुख्य कोच अमोल मजूमदार ने टीम में विश्वास जगाया कि सफलता के लिए छोटी अंतिम दूरी पार करनी होगी। कोच और कप्तान ने टीम का आत्मविश्वास बढ़ाया और रणनीति से विश्व विजेता बनाया। यह जीत टीम की मेहनत, दृढ़ संकल्प और अनुशासन का परिणाम है। अमोल मजूमदार अक्तूबर 2023 में महिला क्रिकेट टीम के कोच बने और 2025 में टीम को वनडे विश्वकप जिताकर इतिहास रच दिया।

मजूमदार खुद कभी भारतीय टीम की जर्सी में नहीं खेल पाए, लेकिन प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उन्होंने 171 मैच खेले और 11,167 रन बनाए। उन्होंने अपने कॅरियर में 30 शतक भी जड़े, पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में मौका नहीं मिला। उन्होंने अपने अनुभवों और निराशाओं को सकारात्मक ऊर्जा में बदलकर टीम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। यही कारण रहा कि टीम ने न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसी मजबूत टीमों को हराया। अंतिम लीग मैच में प्रतिका रावल (122), स्मृति मांधना (109) और जेमिमा रोड्रग्स (नाबाद 76) ने शानदार बल्लेबाजी की, जबकि कप्तान हरमनप्रीत कौर (89) और जेमिमा रोड्रिक्स (नाबाद 127) ने सेमीफाइनल में मजबूत साझेदारी निभाई। फाइनल में शेफाली वर्मा, दीप्ति शर्मा और स्मृति मंधाना ने शानदार प्रदर्शन करते हुए टीम को 52 रन से जीत दिलाई।

शिखर की ओर अग्रसर

भारतीय महिला क्रिकेट टीम कड़ी मेहनत, प्रमुख खिलाड़ियों जैसे झूलन गोस्वामी, मिताली राज और कप्तान हरमनप्रीत कौर के नेतृत्व में आत्मविश्वास और रणनीति के साथ विश्व के शीर्ष पर पहुंची। 1983 के बाद पुरुष टीम की सफलता की तरह, यह जीत महिला क्रिकेट के लिए प्रेरणा व उज्जवल भविष्य की नींव साबित होगी। कप्तान हरमनप्रीत कौर की पांचवीं विश्वकप यात्रा में टीम विश्व विजेता बनी है। उन्होंने कहा, “हमने नई राह खोली है, अब इसे अगली पीढ़ी आगे बढ़ाएगी। पिछली बार विश्व कप के करीब आकर हार का दर्द सहा, अब जीत को अपनी आदत बनाना है।” इस प्रकार, 25 वर्ष में महिला क्रिकेट ने संघर्ष, समर्पण और जज्बे से विश्व विजेता बनने का सपना पूरा किया। हरमनप्रीत की यह जीत महिला क्रिकेट के लिए नई प्रेरणा है।

छोटा कद, उपलब्धि बड़ी

अमनजोत कौर की क्रिकेट यात्रा समर्पण और कड़ी मेहनत की अनूठी कहानी है। उनके पिता कारपेंटर हैं। मोहाली की गलियों में पड़ोसियों के साथ क्रिकेट खेलते हुए वे क्रिकेट की ओर आकर्षित हुईं। 2016 में 15 साल की थीं तो पिता ने उनका दाखिला अकादमी में कराया, जहां कोच नागेश गुप्ता ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें प्रशिक्षण दिया। नागेश गुप्ता ने उनकी तकनीकी कमजोरियों पर काम कर उनकी प्रतिभा निखारी और ऑलराउंडर के रूप में तैयार किया। छोटे कद ने उन्हें तेज गेंदबाजी और फुर्तीले क्षेत्ररक्षण में मदद की। उन्होंने हॉकी, फुटबॉल और हैंडबॉल जैसे खेलों से शारीरिक फिटनेस, सहनशीलता और टीम भावना विकसित की। आर्थिक तंगी व चोटों से जूझते हुए भी उनका संघर्ष अटूट रहा। इसी मेहनत व समर्पण ने उन्हें विश्वकप विजेता टीम में जगह दिलाई और नारी शक्ति का परचम लहराने में सहायक साबित हुआ। अमनजोत की गिनती प्रतिभाशाली ऑलराउंडरों में होती है।

कपड़े की गेंद से स्विंग सीखा

रेणुका सिंह ठाकुर का जन्म 2 जनवरी, 1996 में हिमाचल प्रदेश के गांव रोहरू में हुआ। जब वे तीन साल की थीं, तभी पिता का साया छिन गया। मां सुनीता ठाकुर ने उन्हें हिम्मत और समर्थन दिया। कर्ज में रहने के बावजूद रेणुका ने क्रिकेट में अपनी पहचान बनाई। बचपन में वे गांव में लड़कों के साथ कपड़े की गेंद और लकड़ी से क्रिकेट खेलती थीं। 13 की उम्र में उन्होंने घर छोड़कर धर्मशाला में हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन की महिला अकादमी में दाखिला लिया। वहां उन्होंने कोच पवन सेन के मार्गदर्शन में अपने खेल को निखारा। आर्थिक दिक्कतों और परिवार की चुनौतियों के बावजूद रेणुका ने अपनी मेहनत और जुनून से घरेलू क्रिकेट में सफलता हासिल की। 2021 में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत के लिए पहली बार टी20 खेला और अपनी तेज गेंदबाजी से टीम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज वे टीम की सर्वश्रेष्ठ स्विंग गेंदबाज हैं। रेणुका सिंह की कहानी संघर्ष, समर्पण और मेहनत की दृष्टि से प्रेरणादायक है।

बिना प्रशिक्षण बनीं गेंदबाज

क्रांति गौड़ का जन्म 11 अगस्त, 2003 को मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के छोटे से गांव गुवारा में हुआ। जनजातीय परिवार से संबंध रखने वाली क्रांति के पिता मुन्ना गौड़ पुलिस कांस्टेबल थे और माता गृहिणी। उनका परिवार तो क्रिकेट के बारे में ज्यादा जानता भी नहीं था। गांव में भी लड़कियों के लिए क्रिकेट के उचित साधन नहीं थे। गरीब परिवार में जन्मी क्रांति ने लड़कों के साथ गली क्रिकेट खेलकर खुद को निखारा। आर्थिक कठिनाइयों और संसाधनों की कमी के बीच पिता अपनी पेंशन और माता ने गहने गिरवी रखकर उन्हें आगे बढ़ाया। बिना औपचारिक प्रशिक्षण के उन्होंने मेहनत से गेंदबाजी सीखी और छोटे मैदानों में अभ्यास किया। 2021 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया और पाकिस्तान के खिलाफ मैच में प्लेयर ऑफ द मैच भी बनीं। उनकी कहानी संघर्ष, समर्पण और जुनून से भरी प्रेरणा है, जिसने उन्हें भारतीय महिला क्रिकेट टीम की विश्वकप विजेता गेंदबाज बनाया।

खेलने के लिए नहीं थे पैसे

राधा यादव मुंबई की झोपड़ी में पली-बढ़ीं । परिवार के पास राधा को क्रिकेट अकादमी भेजने के लिए पैसे नहीं थे। पिता दूध बेचकर परिवार का खर्च चलाते थे, लेकिन उनकी बेटी के सपनों को पूरा करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। कोच प्रफुल्ल नाइक ने राधा की प्रतिभा को पहचाना और अपनी फीस तक देकर उनका समर्थन किया। राधा कठिन परिश्रम और आत्मविश्वास के साथ क्रिकेट में आगे बढ़ी, गली क्रिकेट से लेकर विश्वकप तक का सफर तय किया। राधा वैसे तो बाएं हाथ की ऑर्थोडॉक्स स्पिन गेंदबाज हैं और किफायती बॉलिंग व मजबूत फील्डिंग के लिए जानी जाती हैं। लेकिन उनका बल्ला भी काम आता है। उनकी कहानी संघर्ष और मेहनत की मिसाल है, जिसने उन्हें टीम इंडिया में जगह दिलाई।

कर्ज के बावजूद परिवार नहीं हारा

एन श्री चरणी आंध्र प्रदेश के छोटे से गांव की किसान परिवार की बेटी हैं, जिनका परिवार पहले कर्ज में डूबा था। बचपन में वे बैडमिंटन, कबड्डी और खो-खो जैसे खेलों में सक्रिय थीं। स्मृति मंधाना और युवराज सिंह से प्रेरणा लेकर उन्होंने क्रिकेट को चुना। क्रिकेट में कदम रखते ही उन्होंने वर्ल्ड चैंपियन बनने का सपना देख उसपर पूरा ध्यान दिया। उनके चाचा किशोर कुमार रेड्डी ने उन्हें क्रिकेट की प्रारंभिक ट्रेनिंग दी। कड़ी मेहनत और लगन से उन्होंने घरेलू क्रिकेट में पहचान बनाई और वुमेंस प्रीमियर लीग में दिल्ली कैपिटल्स के लिए शानदार प्रदर्शन किया। अप्रैल 2025 में चरणी को वनडे टीम में चुना गया। जून 2025 में पहले ही टी20 इंटरनेशनल में चार विकेट लेकर तहलका मचा दिया। वे बाएं हाथ की ऑर्थोडॉक्स स्पिन गेंदबाज हैं और जब जरूरत पड़े तो बल्लेबाजी भी करती हैं। उनका सफर निपुणता, संघर्ष और जुनून की कहानी है।

बीसीसीआई के सार्थक प्रयास

बीसीसीआई ने महिला क्रिकेट को पुरुषों के साथ मिलाकर नई ऊर्जा दी है। अब उन्हें पुरुषों के समान मैच फीस, पुरस्कार और वार्षिक करार मिलता है। महिला प्रीमियर लीग की शुरुआत ने उन्हें विश्व स्तर की खिलाड़ियों के साथ कंधे से कंधा मिलाने का मंच दिया और प्रतिस्पर्धा को पेशेवर बनाया। 2025 विश्व कप में पुरस्कार राशि 297 प्रतिशत बढ़ाई गई, विजेता टीम को करीब 40 करोड़ रुपये मिले। बीसीसीआई ने टीम और सपोर्ट स्टाफ के लिए 51 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि भी घोषित की। महिला प्रीमियर लीग की शुरुआत ने उन्हें विश्व स्तर की खिलाड़ियों के साथ कंधे से कंधा मिलाने का मंच दिया और प्रतिस्पर्धा को पेशेवर बनाया।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने कई बाधाओं और सीमित संसाधनों के बावजूद कड़ी मेहनत, संघर्ष और दृढ़ इच्छाशक्ति से विश्व विजेता बनकर नारी शक्ति को नई ऊचाई दी है। कई खिलाड़ियों के परिवार में खेल की परंपरा रही, जबकि कुछ ने घरेलू सीमित साधनों से खुद को तैयार कर टीम में जगह बनाई। संघर्ष, कड़ी मेहनत, लगन और जीत की दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत वे भारतीय टीम का अंग बनीं। कप्तान हरमनप्रीत कौर, स्मृति मंधाना, जेमिमा रोड्रिग्स, हरलीन देओल, प्रतिका रावल, शेफाली वर्मा आदि का परिवार खेल से जुड़ा था और उनके पास उपयुक्त साधन थे। लेकिन हरमनप्रीत व दीप्ति शर्मा जैसी खिलाड़ियों को लड़कों के साथ खेल की बारीकियां सीखनी पड़ीं। इसी टीम में रेणुका ठाकुर, अमनजोत कौर, क्रांति गौड़, स्नेह राणा और रिचा घोष जैसी कई खिलाड़ी हैं जो सीमित संसाधनों वाले परिवारों से आई हैं। इस भारतीय विश्व विजेता टीम ने नारी शक्ति को एक नयी ऊंची उड़ान दी है।

#हॉकी@100 :

नई पीढ़ी को प्रेरित करने की तैयारी

भारतीय हॉकी टीम ने सौ वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस अवसर पर 7 नवंबर को नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम में भव्य समारोह आयोजित किया जाएगा। इसमें भारतीय हॉकी की गौरवशाली यात्रा को दर्शाने वाले कई विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। देश के दिग्गज हॉकी खिलाड़ियों को सम्मानित किया जाएगा और पुरुष-महिला टीमों के बीच एक 30 मिनट का प्रदर्शनी मैच भी खेला जाएगा। साथ ही, देश के 550 से अधिक जिलों में 1,400 से अधिक हॉकी मैच आयोजित किए जाएंगे, जिसमें 36,000 से अधिक खिलाड़ी भाग लेंगे, जो समानता और इनक्लूसिविटी का प्रतीक होंगे।

1925 में राष्ट्रीय हॉकी संघ का गठन हुआ और 1928 में भारत ने ओलंपिक में पहला स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद 1932 और 1936 के ओलंपिक सहित भारतीय हॉकी ने कुल आठ ओलंपिक स्वर्ण पदक और 13 ओलंपिक पदक जीते। ध्यानचंद जैसे दिग्गज खिलाड़ियों ने हॉकी को नई ऊर्जा दी और टीम को विश्व हॉकी में प्रभुत्व दिलाया। द्वितीय विश्व युद्ध के कारण 1940 और 1944 में ओलंपिक नहीं हुए, अन्यथा भारतीय टीम उसमें भी स्वर्ण पदक जीत सकती थी। 1948 में स्वतंत्रता के बाद भारतीय टीम ने लंदन ओलंपिक में ब्रिटिश टीम को हराकर भारत की प्रतिष्ठा स्थापित की। हॉकी के शताब्दी समारोह में एक विशेष फोटो प्रदर्शनी भी होगी, जिसमें भारतीय हॉकी के 100 वर्ष की यात्रा, ओलंपिक क्षण और दुर्लभ अभिलेखीय तस्वीरें प्रदर्शित की जाएंगी। इस आयोजन का उद्देश्य भारतीय हॉकी के गौरवशाली इतिहास को याद करना और नई पीढ़ी को प्रेरित करना है। केंद्रीय खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने इस अवसर को राष्ट्रीय गौरव और प्रेरणा का प्रतीक बताया है।

भारतीय हॉकी टीम की वर्तमान स्थिति उनकी निरंतर प्रगति, युवा प्रतिभाओं के उदय और वैश्विक हॉकी प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन का संकेत है। भारतीय टीम ने पेरिस 2024 ओलंपिक में ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद यह उच्च रैंक हासिल किया है, जहां उन्होंने 1972 के बाद पहली बार लगातार दो पदक प्राप्त किए। नीदरलैंड, इंग्लैंड, बेल्जियम और जर्मनी जैसे मजबूत हॉकी देशों के बाद भारत पांचवें स्थान पर है। इसके अलावा, भारत ने 2025 में हॉकी एशिया कप जीत कर आठ साल बाद महाद्वीपीय खिताब वापस पाया है। भारतीय महिला हॉकी टीम की रैंकिंग विश्व में नौवां है।

 

Topics: मातृशक्तिIndian women's cricket teamपाञ्चजन्य विशेषअमोल मजूमदारवंदे मातरम्@150महिला विश्वकप 2025विजय पताकाहॉकी शताब्दीभारतीय महिला क्रिकेट टीमहॉकी@100नारी शक्तिहरमनप्रीत कौर
प्रवीण सिन्हा
प्रवीण सिन्हा
वरिष्ठ खेल पत्रकार। साढ़े तीन दशक का अनुभव [Read more]
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