अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन के तीसरे सत्र को संबोधित करते हुए लेखक और साहित्यकार जगदीश जोशीला ने भाषा और बोली के मुद्दे पर बात की। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में मुख्य रूप से 4 भाषायी जोन हैं। इसमें आपकी बघेली, बुन्देली, मालवीय और नीमाड़ी। इन चारों जनपदों की बोलियां किसी जमाने में बोलियां थी, लेकिन आज वो लोकभाषा का परिचाय़क बन चुकी हैं।
जोशीला ने कहा कि जब तक बोली मौखिक रूप से हमारी जीव्हा पर विराजमान है, तब तक वो बोली है , लेकिन, जब उसका व्याकरण, उसकी भाषा, उसके शब्द तैयार हो जाते हैं तो वह भाषा की श्रेणी में स्वीकार की जाती है। जगदीश जोशीला जो कि लंबे वक्त से नीमाड़ क्षेत्र की बोली को एक भाषा का दर्जा देने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उन्होंने खुद को नीमाड़ का अदना सा पुत्र करार दिया। साथ ही माखनलाल चतुर्वेदी का जिक्र करते हुए कहा कि जब मैं युवावस्था का था तब चतुर्वेदी दादा से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
वह बताते हैं कि माखनलाल चतुर्वेदी की प्रेरणा से ही उन्होंने नीमाणी साहित्य का इकलौता उपन्यास लिखा। उन्होंने कहा कि उनके नीमाड़ी भाषा के लिए संघर्ष के चलते ही इसी साल भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा है। नीमाड़ी भाषा के लिए संघर्षरत रहे जगदीश जोशीला कहते हैं कि एक बार लंबी राजनीतिक यात्रा के बाद एक बार जब वो नीमाड़ की धरती पर लौटे तो ये महसूस हुआ कि यहां का आम नीमाड़ी अपनी ही भाषा और संस्कृति की अभिव्यक्ति करने के लिए संकोच करता है।
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हमने इस पर गहराई से विचार विमर्श करके इस समस्या से निपटने के लिए एक संगठन का निर्माण भी किया, लेकिन वो भी करीब 5-6 सालों में बिना किसी फंडिंग के बंद हो गया। हालांकि मैंने विभिन्न विधाओं में कम से कम 28 भाषाओं पुस्तकें भी लिखी। इस देश के 300 साल के भक्ति आंदोलन में केवल हमारे देश के नीमाड़ में ही सिंघाजी पैदा हुए और कहीं भी ऐसा नहीं हुआ।
पद्मश्री अवार्ड पर कही बड़ी बात
इस मौके पर जगदीश जोशीला ने खुद को और बाकी अन्य क्षेत्रों के लोगों को सरकार के द्वारा पद्म या पद्म विभूषण देने को लेकर कहा कि इस देश में अगर किसी सरकार ने देश के लिए वास्तविकता में काम करने वालों को किसी ने सम्मानित किया है तो वो मोदी सरकार ने किया है। क्योंकि 2014 से पहले केवल मुंह दिखाई होती थी। 2014 से पहले तो सम्मान चेले-चपाटों को देखकर दिया जाता था।

















