भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाल ही में एक बड़ा खुलासा किया है, जिसने देशभर में चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने बताया कि अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में न हो, इसके लिए कई लोगों ने अलग-अलग तरीके से प्रयास किए थे। तुषार मेहता दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे, जहाँ वरिष्ठ अधिवक्ता अनिरुद्ध शर्मा और श्रीधर पोटाराजू की किताब ‘केस फॉर राम-द अनटोल्ड इनसाइडर्स स्टोरी’ का विमोचन हुआ।
तुषार मेहता ने कहा कि इस ऐतिहासिक मुकदमे की सुनवाई को रोकने या टालने की कोशिशें अप्रत्यक्ष और सीधे, दोनों ही तरह से की गई थीं। उन्होंने बताया कि जब ये सारे प्रयास असफल हो गए, तब दो प्रसिद्ध वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही से वॉकआउट तक कर दिया। उन्होंने कहा, “ऐसा व्यवहार आमतौर पर संसद में देखने को मिलता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट में ऐसा पहली बार हुआ।” सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह मामला केवल जमीन या कानूनी विवाद नहीं था, बल्कि यह भारत की संस्कृति, इतिहास और समाज से गहराई से जुड़ा हुआ था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जजों की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने इस मामले में असाधारण धैर्य, समझदारी और विवेक का परिचय दिया। उनके अनुसार, अदालत ने न्याय की राजनीति नहीं, बल्कि न्याय की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया। र्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार और प्रसिद्ध पुरातत्वविद् के.के. मोहम्मद ने भी अपने विचार रखे। के.के. मोहम्मद पहले भी यह कह चुके हैं कि अयोध्या में हुई खुदाई में जो साक्ष्य मिले, वे साफ दिखाते हैं कि वहाँ पहले एक भव्य मंदिर मौजूद था।
इस बात से यह विवाद और भी ऐतिहासिक हो गया, क्योंकि यह सिर्फ धार्मिक मामला नहीं था, बल्कि भारत की पहचान और विश्वास से जुड़ा हुआ था। तुषार मेहता ने कहा कि अधिवक्ता अनिरुद्ध शर्मा और श्रीधर पोटाराजू की यह किताब सिर्फ तथ्यों का संग्रह नहीं है, बल्कि इसमें उस पूरी यात्रा को जीवंत किया गया है, जिसके दौरान यह मामला भारत के लिए एक ऐतिहासिक घटना बन गया। उन्होंने कहा कि यह किताब उन सभी घटनाओं और भावनाओं को सामने लाती है, जो अदालत की दीवारों के भीतर और बाहर दोनों जगह महसूस की गईं। गौरतलब है कि साल 2019 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संविधान पीठ ने इस ऐतिहासिक विवाद पर सर्वसम्मति से फैसला सुनाया था। कोर्ट ने 2.77 एकड़ भूमि राम मंदिर निर्माण के लिए हिंदू पक्ष को दी और मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में 5 एकड़ भूमि देने का आदेश दिया। इस फैसले के साथ ही सदियों पुराना विवाद खत्म हुआ और भारत के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया।
















