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एक गीत, एक आत्मा, एक भारत

पाञ्चजन्य ने 'वंदे मातरम्' की 150वीं वर्षगांठ पर भारत की विकास यात्रा का बहुपक्षीय विश्लेषण किया। इसमें एक ओर इसरो, यूपीआई, फार्मा-चिकित्सा, रेलवे और अक्षय ऊर्जा जैसे आधुनिक क्षेत्रों में प्रगति है, तो दूसरी ओर महिला क्रिकेट की उपलब्धियां। साथ ही, ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक और कम जाने-पहचाने पहलुओं को उजागर करता यह आयोजन भारत की सांस्कृतिक और तकनीकी उन्नति का अनूठा संगम है

Written byडॉ. सच्चिदानंद जोशीडॉ. सच्चिदानंद जोशी
Nov 7, 2025, 10:50 pm IST
in भारत, विश्लेषण

वंदे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यशामलां मातरम्।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीं
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं
सुखदां वरदां मातरम् ।।1।। वंदे मातरम्।
कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले।
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं
रिपुदलवारिणीं मातरम् ।।2।। वंदे मातरम्।

डॉ. सच्चिदानंद जोशी
सदस्य सचिव, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र

20 नवंबर, 1909 को कर्मयोगिन में इस अनुवाद के प्रकाशित होने से करीब 20 वर्ष पहले ‘वंदे मातरम्’ गीत भारतीय एकता की आत्मा में रच-बस चुका था। रैलियों और घरों में गुनगुनाए जाने वाले इस गीत ने लाखों लोगों के दिलों को प्रांतों और पंथों से ऊपर उठने का आह्वान किया। बंकिमचंद्र चटर्जी के शब्दों ने पूरे देश को एक साथ सपने देखने के लिए प्रेरित किया व श्री अरबिंदो के अंग्रेजी अनुवाद ने इसे नई पीढ़ियों और पूरे विश्व तक पहुंचाया, ताकि वे भारत की आजादी की पुकार सुन सकें। कर्मयोगिन में इस कविता का प्रकाशन केवल एक गीत का अनुवाद नहीं था। यह एक आंदोलन का बन गया और भारत को भेदभाव से ऊपर उठकर एक सूत्र में बांधने की शक्ति दी। लोगों ने पहली बार ‘वंदे मातरम्’ को 1896 में एक भजन की तरह सुना, जब रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में गाया। उस शाम श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो गए। गीत में विरोध की नहीं, भक्ति की ध्वनि थी। 10 साल बाद 1905 में जब बंगाल का विभाजन हुआ और वहां असंतोष फैला, तब रवींद्रनाथ ठाकुर के भतीजे अवनींद्रनाथ ठाकुर ने भारतमाता की तस्वीर बनाई। भगवा वस्त्रों में एक स्त्री, जिसके हाथ में अनाज की पूंज, एक पुस्तक और एक माला थी। यह चित्र ‘वंदे मातरम्’ की भावना का जीवंत रूप बन गया। यह गीत किसी कवि की केवल कल्पना नहीं, उस आत्मा की पीड़ा भरी पुकार थी, जो वर्षों से मातृभूमि की रक्षा और अस्तित्व के लिए जूझ रही थी। जब ब्रिटिश हुकूमत लोगों से ‘लॉन्ग लिव द क्वीन’ (रानी की जय हो) कहलवा रही थी, तब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने एक रात में यह गीत लिखा, जो सदियों के दुख व अपमान का काव्यात्मक उत्तर था। एक गूंजती पुकार, जिसने उस सोए हुए राष्ट्र को जगाने की कोशिश की जो लंबे समय से पीड़ा में सुन्न हो गया था।

विद्रोह की सांस

कांग्रेस के अधिवेशन से लेकर लाहौर की फांसी तक ‘वंदे मातरम्’ विद्रोह की सांस बन गया। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त और अनेक क्रांतिकारियों ने इसे मौत का सामना करते हुए ऊंची आवाज गाया था। सुभाष चंद्र बोस ने इसे आजाद हिंद फौज का मार्चिंग गीत बना दिया। यह गीत सभाओं में गूंजता था और जेलों की दीवारों में धीमे स्वर में फुसफुसाया जाता था। इसने संत-सैनिक, विद्वान-किसान, हिंदू-मुस्लिम सभी को एक सूत्र में बांध दिया। यह गीत प्रार्थना भी था व विरोध की पुकार भी।

‘वंदे मातरम्’ का पहला अंग्रेजी अनुवाद श्री अरबिंदो ने नहीं किया था। कई भारतीय और अंग्रेज विद्वानों ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया था। इसे उर्दू सहित कई भारतीय भाषाओं में भी अनुवादित किया गया था। डब्ल्यू. एच. ली, जो ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय सिविल सेवा में थे, ने 1906 में इसका अंग्रेजी अनुवाद किया। जब ‘वंदे मातरम्’ बोलना भी प्रतिबंधित कर दिया गया था, तब कुछ लोगों ने इसे गुमनाम रूप से अनुवादित किया। हालांकि, श्री अरबिंदो द्वारा किया गया अंग्रेजी अनुवाद सबसे प्रसिद्ध है, जिसे मूल बांग्ला गीत के साथ प्रकाशित किया गया था। कोई और गीत ऐसा नहीं है जो पीढ़ियों और सीमाओं को लांघते हुए, भारत के हर रंग और वर्ग तक पहुंचा हो और फिर भी भारतीयता की पहचान के केंद्र में बना रहा हो। गुलामी और दुख, सुधार और क्रांति, हर दौर में ‘वंदे मातरम्’ टिका रहा। यह केवल क्रोध का नारा नहीं था, बल्कि मां के प्रति प्रेम और सम्मान का प्रणाम था। इस गीत की अमरता को समझने के लिए हमें इसके उद्गम तक लौटना होगा। बंगाल के एक साधारण से घर में, उस उजले दिन तक, जिसने भारत की किस्मत बदल दी।

बंकिमचंद्र चटर्जी (1838-1894), जो कलकत्ता विश्वविद्यालय के शुरुआती स्नातकों में से एक थे, ने सरकारी सेवा में प्रवेश किया और डिप्टी मजिस्ट्रेट तथा डिप्टी कलेक्टर बने। काम के दौरान उन्हें ब्रिटिश अभिलेखों व राजपत्रों तक पहुंच मिली, जिनमें एक भूली हुई गाथा दर्ज थी : संन्यासी विद्रोह (1763-1780)। जब साधु-संन्यासी ढाका और उत्तर बंगाल में अंग्रेजी अत्याचार के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। त्याग से प्रतिरोध में बदलने वाली यह कहानी ही बाद में बंकिम बाबू के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ की प्रेरणा बनी। लेकिन उपन्यास से पहले गीत जन्मा-‘वंदे मातरम्’। 1870 के दशक तक ब्रिटिश साम्राज्य ने अपनी निष्ठा दिखाने के नियम लागू करने शुरू कर दिए थे। सरकारी कार्यक्रमों व स्कूलों में भारतीयों को ‘गॉड सेव द क्वीन’ (ईश्वर रानी की रक्षा करें) गीत के लिए खड़ा होना पड़ता था। बंकिमचंद्र के लिए यह केवल राजनीतिक दबाव नहीं था, यह आध्यात्मिक गुलामी थी। एक गौरवशाली सभ्यता को सिखाया जा रहा था कि वह विदेशी शासक के आगे सिर झुकाए।

यही वह शांत विद्रोह का क्षण था, जब रविवार, 7 नवंबर, 1875 को बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ लिखा। जैसे यह गीत उन्होंने लिखा नहीं, बल्कि ऊपर से उनके भीतर उतर आया हो। जब बाकी लोग रानी के लिए गाते थे, तब बंकिमचंद्र ने मातृभूमि के लिए गाया। उन्होंने साम्राज्य के आदेश का उत्तर आत्मसमर्पण से नहीं, बल्कि आत्म जागरण से दिया। जहां दूसरे राजा को प्रणाम करते थे, वहां बंकिमचंद्र ने मिट्टी को प्रणाम किया। यही उनका सच्चा विद्रोह था। यह विद्रोह तलवार से नहीं, गीत से जन्मा था। उन्हें पता था- तलवार की उम्र सीमित होती है, लेकिन शब्द अमर होते हैं।

‘वंदे मातरम्’ क्रोध के क्षण के लिए नहीं, बल्कि जागरण के युग के लिए रचा गया था। यह किसी शासक को नहीं, बल्कि धरती के साम्राज्य- नदियों, खेतों, बागों और हवाओं को संबोधित था। यह एक भजन था, जिसने भारत की आध्यात्मिक स्वतंत्रता को उस समय पुनर्जीवित किया, जब राजनीतिक स्वतंत्रता अभी दूर थी। जब ‘आनंदमठ’ उपन्यास लोगों तक पहुंचा, तब यह गीत किताब के पन्नों से निकलकर राष्ट्र की रक्तधारा बन गया। 1896 के कलकत्ता अधिवेशन में टैगोर की वाणी ने इसे पंख दिए। केवल एक दशक बाद 1905 के स्वदेशी आंदोलन में बंगाल की गलियां ‘वंदे मातरम्’ की गूंज से भर उठीं और यह गीत विद्रोह का प्रतीक बन गया। ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया, छात्रों को निकाल दिया गया और प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन दमन ने इस गीत के प्रति श्रद्धा को और गहरा कर दिया। कोलकाता में बच्चे नंगे पांव बारिश में खड़े होकर इसे गाते थे तो ढाका में महिलाओं ने इसे अपनी साड़ियों पर कढ़ाई से उकेरा था।

नेहरू को गुरुदेव की दो टूक

जवाहरलाल नेहरू ने आनंदमठ के अंग्रेजी अनुवाद को पढ़ने के बाद 1937 में रवींद्रनाथ ठाकुर को लिखा था कि इस उपन्यास की पृष्ठभूमि ‘मुसलमानों को चिढ़ाने वाली’है। इस पर रवींद्रनाथ ठाकुर ने जवाब दिया कि वे उपन्यास के उस संदर्भ में सभी पक्षों की भावनाओं का सम्मान करते हैं, परंतु कविता ‘वंदे मातरम्’ का राष्ट्रीय महत्व है और इसके पहले दो छंदों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया गया है। टैगोर ने स्पष्ट किया कि इस राष्ट्रीय गीत को धार्मिक या किसी विशेष समुदाय के विरोध में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे भारत के लिए एक प्रेरणास्पद राष्ट्रगीत माना जाना चाहिए। उन्होंने इस भाव को समझते हुए कहा कि कविता के निजी अर्थ और उसकी सार्वजनिक स्वीकार्यता में अंतर होता है।

भारत के पुनर्जन्म का मंत्र

श्री अरबिंदो घोष ने इसे ‘भारत के पुनर्जन्म का मंत्र’ कहा। सिस्टर निवेदिता ने लिखा कि इसे सुनना ऐसा है, जैसे भारत की आत्मा की सांस सुनना। इस गीत की असली शक्ति उसकी सार्वभौमिकता थी। इसे महसूस करने के लिए संस्कृत जानना जरूरी नहीं था। 1920 और 1930 के दशक तक ‘वंदे मातरम्’ साहस का प्रतीक बन चुका था। जेल की कोठरियों में भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने इसे दीवारों पर उकेरा। अंदमान की सेल्युलर जेल में यह गीत पीड़ा और दृढ़ता का भजन बनकर गलियारों में गूंजता था। सुभाष चंद्र बोस ने इसे आजाद हिंद फौज का युद्धनाद बना दिया। उनके सैनिकों के लिए यह गीत संगीत नहीं, बल्कि आदेश था। यहां तक कि जब महात्मा गांधी ने इसे मिश्रित सभाओं में संयम से गाने की सलाह दी, तब भी उन्होंने स्वीकार किया कि ‘वंदे मातरम्’ अब पवित्र बन चुका है। एक ऐसा गीत, जो बलिदान से पावन हुआ।

‘वंदे मातरम्’ की शक्ति उसकी कल्पना-चित्रों में छिपी है। इसमें भारत कोई सीमाओं वाला देश नहीं, बल्कि जीवंत सांसों से भरा एक अस्तित्व है। इसकी मातृभूमि युद्धभूमि नहीं, बल्कि जीवनदायिनी शक्ति है-उपजाऊ, उज्ज्वल और पालन करने वाली। जब 1905 में अबनिंद्रनाथ ठाकुर ने भारत माता की तस्वीर बनाई, तो उन्होंने इस अस्तित्व को एक चेहरा दिया- शांत, आध्यात्मिक और आत्मनिर्भर। यह चित्र, ठीक उसी तरह जैसे गीत, सुंदर भी था और क्रांतिकारी भी, पवित्र भी और विद्रोही भी। बंकिमचंद्र की सबसे बड़ी प्रतिभा यह थी कि उन्होंने देशभक्ति को भक्ति में बदल दिया। भारत से प्रेम करना उनके लिए सिर्फ भूमि से लगाव नहीं था, बल्कि मां की तरह उसकी पूजा करना था-भूमि पर अधिकार नहीं, मातृभूमि पर आदर।

स्वतंत्रता का गान

जब भारत स्वतंत्रता के करीब पहुंचा, तब तक ‘वंदे मातरम्’ भारत की अवधारणा से अभिन्न रूप से जुड़ चुका था। फिर भी, संविधान सभा में एक बहस छिड़ गई- कौन-सा गीत नए गणराज्य का प्रतिनिधित्व करेगा? 1947 में ‘जन गण मन’ को उसकी भाषाई सार्वभौमिकता के कारण राष्ट्रगान चुना गया। लेकिन ‘वंदे मातरम्’ को समान सम्मान के साथ राष्ट्रगीत घोषित किया गया। नेहरू ने इसे ‘हमारे जागरण का गीत’ कहा था। इसके केवल पहले दो छंद-जो किसी देवता का नहीं प्रकृति का वर्णन करते हैं- आधिकारिक उपयोग के लिए अपनाए गए।

एक आत्मा, एक भारत

यह कोई संयोग नहीं है कि जब देश ‘वंदे मातरम्’ गीत के 150 वर्ष मना रहा है, तब हम भारत की एकता के शिल्पकार सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती भी मना रहे हैं। जिस तरह ‘वंदे मातरम्’ ने भारत की एकता को शब्दों में व्यक्त किया, उसी तरह सरदार पटेल ने स्वतंत्रता के बाद उसे वास्तविक रूप दिया।

1947 में आजादी तो मिल गई, पर देश की सैकड़ों रियासतों को एकजुट करना अभी बाकी था। इन रियासतों के एकीकरण के बिना आजादी अधूरी थी। भारत के लौहपुरुष सरदार पटेल ने यह कठिन कार्य अकेले अपने दम पर संभाला और पूरे देश को एक सूत्र में बांध दिया। सोचिए, अगर हमारी मातृभूमि ‘सुजलाम् सुफलाम् है’, तो अगर वह कई टुकड़ों में बंटी होती और अलग-अलग रियासतों के शासक उसे चलाते तो वैसी कैसे हो। यह सरदार पटेल के साहस और समर्पण का ही परिणाम था कि उन्होंने भारत को ‘सुखदाम्, वरदाम्-अर्थात् सुख देने वाला और आशीर्वाद प्रदान करने वाला बना दिया।

अभिव्यक्ति के भिन्न रूप

इस तरह ‘वंदे मातरम्’ भारत का शाश्वत आह्वान बना रहा। यह किसी नीति का नहीं, बल्कि गौरव का प्रतीक था। स्वतंत्रता के बाद इस गीत ने कई नए रूप धारण किए। 1952 में निर्देशक हेमेन गुप्ता की फिल्म ‘आनंदमठ’ में यह गीत पहली बार पर्दे पर गूंजा। हेमंत कुमार के संगीत और लता मंगेशकर की मधुर आवाज़ ने ‘वंदे मातरम्’ को अमर फिल्मी गान बना दिया। 1997 में ए. आर. रहमान ने ‘मां तुझे सलाम’ के रूप में इस गीत की भावना को फिर जीवित किया। भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व संगीत से मिलाकर रहमान ने विदेशों में बसे भारतीयों को याद दिलाया कि मां अब भी उनके गीत की प्रतीक्षा कर रही है। उनकी आवाज ने सदियों को जोड़ दिया-बंकिमचंद्र की कलम से लेकर रहमान के सिंथेसाइजर तक, भावना वही रही- हर युग ने उसी मां को अलग सुर में गाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘वंदे मातरम्’ के अर्थ को नया जीवन और नई व्याख्या मिली है। वे इसे अक्सर राष्ट्रीय कार्यक्रमों में दोहराते हैं। इसे केवल अतीत की याद नहीं, सभ्यतागत प्रेरणा मानते हैं, जो याद दिलाती है कि भारत की आजादी दी क्रोध से नहीं, विश्वास से जन्मी थी।

‘आजादी का अमृत महोत्सव’, स्कूल प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक अभियानों के माध्यम से सरकार ने इस गीत को युवाओं तक फिर से पहुंचाया है। इसके साथ डिजिटल गायन समूह, ड्रोन लाइट शो व ऑर्केस्ट्रा की धुनें भी आधिकारिक समारोहों में गूंजती हैं- जो ‘वंदे मातरम्’ को नए भारत की आवाज बना रही हैं। जब चंद्रयान-3 चांद पर उतरा तो सोशल मीडिया पर चांद की धरती से ‘वंदे मातरम्’ के नारे गूंजे। वह गीत, जिसने कभी साम्राज्य को ललकारा था, अब ब्रह्मांड को प्रणाम कर रहा था। समय-समय पर कुछ आलोचकों ने इस गीत की देवी-छवि को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्हें लगता है कि यह कुछ लोगों को अलग कर देता है। लेकिन वे भारतीय संस्कृति में ईश्वर की अवधारणा को सही तरह नहीं समझते। हमारी परंपरा में मां कोई धार्मिक देवी नहीं, बल्कि धरती का रूप है। वही हवा जो हम सांस लेते हैं, पानी जो हम पीते हैं और भाषा जो हम बोलते हैं। गीत के पहले दो पद, जिन्हें आधिकारिक रूप से अपनाया गया है, में नदियों, खेतों और हवाओं का वर्णन है- अर्थात् मां स्वयं प्रकृति है। ‘वंदे मातरम्’ किसी पंथ या मान्यता के बारे में नहीं है। यह श्रद्धा और सम्मान के बारे में है। यह विजय नहीं, भक्ति का गीत है। यह शासन नहीं, मातृभूमि के प्रति करुणा और प्रेम का उत्सव है।

क्यों है आज भी महत्वपूर्ण?

आज जब पहचानें बिखर रही हैं, तब ‘वंदे मातरम्’ हमें भावना के माध्यम से एकता का संदेश देता है। याद दिलाता है कि राष्ट्रभावना कोई विचारधारा नहीं, बल्कि विरासत है। यह कुछ नहीं मांगता, बस कृतज्ञता, जो राजनीति और धर्म दोनों से ऊपर है। यह राष्ट्रवाद की परिभाषा भी बदल देता है- यह छाती ठोकने वाला गर्व नहीं, बल्कि शांत सेवा का भाव है। बंकिमचंद्र के विचार में, मां को प्रणाम करना मतलब उसकी नदियों, वनों और बच्चों की रक्षा करना है।

2025 में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने पर भारत इसे नए रूपों में मना रहा है। एआई से बनी सिम्फनी इसके पदों को उपग्रह चित्रों के माध्यम से दिखा रही है। नदियां संगीत की लय पर बह रही हैं, फसलें कोरस के साथ लहरा रही हैं। देशभर के बच्चे इसे 22 भाषाओं में गा रहे हैं। कलाकार इसे रैप, शास्त्रीय नृत्य और फ्यूजन संगीत में ढाल रहे हैं। तकनीक ने इसकी पवित्रता को कम नहीं किया, बल्कि और बढ़ाया है। अब मां कोड में बोलती है, पर उसका गीत वही पुराना है।

अपने मूल में ‘वंदे मातरम्’ राजनीति नहीं, दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि कर्तव्य को भक्ति से जोड़ो। इस मिट्टी पर जन्म लेना सौभाग्य है और इसकी सेवा करना धर्म। बंकिमचंद्र की मां की वंदना में हमारे समय के पर्यावरण, आत्मा और नैतिकता से जुड़े प्रश्न पहले से छिपे हैं। आज ‘वंदे मातरम्’ गाना मतलब संतुलन की याद दिलाना है- विकास और संरक्षण, शक्ति और शांति के बीच। इतिहास में बहुत कम गीत ऐसे हुए हैं जो साम्राज्यों से भी लंबे समय तक जीवित रहे। ‘वन्दे मातरम्’ ऐसा ही गीत है। इसे प्रतिबंधित किया गया, आलोचना की गई, पर हर बार यह और मजबूत होकर लौटा। क्योंकि जो गीत आत्मा से निकलता है, उसे कोई कभी मौन नहीं कर सकता।

औपनिवेशिक काल की जेलों से ओलंपिक मैदानों तक, बंगाल की नदियों के किनारों से चांद की सतह तक, ‘वंदे मातरम्’ की गूंज आज भी सुनाई देती है। यह भारत का पहला प्रेम का गीत है। जब बंकिमचंद्र चटर्जी ने 1875 की अक्षय नवमी के दिन ‘वंदे मातरम्’ लिखा था, तब वे नहीं जानते थे कि उनका यह गीत साम्राज्यों से भी अधिक समय तक जीवित रहेगा। कि उनका यह भजन एक राष्ट्र की आत्मा बन जाएगा।

आज जब भारत फिर से उठ खड़ा हुआ है- आत्मविश्वासी, विविध, प्राचीन और युवा- तब भी मां सुन रही है। वह कोई भेंट नहीं मांगती, बस स्मरण चाहती है। हर बार जब हम ‘वंदे मातरम्’ कहते हैं, हम खुद को याद दिलाते हैं कि कृतज्ञता के बिना स्वतंत्रता अधूरी है। मां स्वतंत्र है। अब बच्चों को योग्य साबित होना होगा, जैसा कि श्री अरबिंदो ने कहा था-“राष्ट्र केवल सेनाओं से नहीं बनते, बल्कि उन लोगों से बनते हैं जो मां की वाणी सुन सकते हैं और प्रेम से उन्हें नमन कर सकते हैं।” ‘वंदे मातरम्’– मां, हम तुम्हें नमन करते हैं।

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सदस्य सचिव, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र [Read more]
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मदरसों की आड़ में बाल अधिकारों का हनन

आज का संस्कृत श्लोक – अद्यापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने।

पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के खिलाफ नारेबाजी करते हुए स्थानीय लोग

छूटती पकड़, टूटती अकड़

निजी अंतरिक्ष युग का उदय

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अहिल्यानगर के गोल्डन मार्केट से ‘मेड इन पाकिस्तान’ सामान और खतरनाक गोरी क्रीम बरामद, शाहिद रियाज शेख गिरफ्तार

Sheikh Hasina Press Conference Delhi

“5 अगस्त को पहली बार मीडिया के सामने आएंगी शेख हसीना”: दिल्ली में बांग्लादेश वापसी की रणनीति पर होंगे बड़े ऐलान!

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लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम से भारत वापस आएगी 11वीं सदी की मां सरस्वती की प्रतिमा, भोजशाला से जुड़ा है इतिहास!

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“सीमांत अतिक्रमण हटाना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी”: VHP ने की राजस्थान वक्फ बोर्ड CEO को हटाने की मांग, जानिए कारण

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सनातन और सेना के अपमान पर भड़का आक्रोश: रत्नागिरी में Gen Z युवाओं ने निकाली विशाल ‘राष्ट्र रक्षा मौन पदयात्रा’!

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हम कोई फैक्ट्री नहीं, सभ्यता बना रहे हैं: मुंबई में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने दिया विकसित भारत पर बड़ा संदेश

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