जानिए कैसे ‘वंदे मातरम्’ बना आजादी का मंत्र और भारत माता की आराधना का प्रतीक?
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जानिए कैसे ‘वंदे मातरम्’ बना आजादी का मंत्र और भारत माता की आराधना का प्रतीक?

भारत के सांस्कृतिक इतिहास में ऐसे क्षण हैं जो सिर्फ घटनाएं नहीं हैं, बल्कि आत्मा के जागरण के क्षण हैं। 1875-76 के आसपास रचित "वन्दे मातरम्" ऐसा ही एक दिव्य क्षण था।

Written byअवधेशानंद गिरि जीअवधेशानंद गिरि जी — edited by Mahak Singh
Nov 7, 2025, 03:21 pm IST
in भारत
वंदे मातरम

वंदे मातरम

भारत के सांस्कृतिक इतिहास में ऐसे क्षण हैं जो सिर्फ घटनाएं नहीं हैं, बल्कि आत्मा के जागरण के क्षण हैं। 1875-76 के आसपास रचित “वन्दे मातरम्” ऐसा ही एक दिव्य क्षण था। यह गीत केवल कवि-कल्पना का उत्पाद नहीं, भारतमाता की करुण पुकार का उत्तर था।जब श्री बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे “आनंदमठ” में गाया, तो यह मातृभूमि के प्रति समर्पण की एक ज्वाला थी, जो न केवल बंगाल से बल्कि पूरे भारत की धरती से उठ रही थी, और गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए चेतना जागृत कर रही थी।

“वंदे मातरम्” में कवि ने मातृभूमि को केवल भू-भाग नहीं माना, वरन् देवी के रूप में आराधना की “सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्, शस्यशामलां मातरम्।” यहां भारतमाता प्रकृति का रूप भी है, संस्कृति की आत्मा भी, और साधना का केन्द्र भी। नदियां उसके कर-कमल हैं, पर्वत उसका अलंकार, और जन-जन उसका प्राण। इस दृष्टि से यह गीत भक्ति और देशभक्ति के अद्भुत संगम का प्रतीक बन गया !

स्वतंत्रता संग्राम के समय में जब प्रत्येक भारतीय आत्मबल के लिए किसी मन्त्र की खोज में था, तब “वंदे मातरम्” उस मन्त्र का रूप ले बैठा। ललनाओं ने इसे लोरियों में गाया, क्रांतिकारियों ने युद्ध-घोष बना दिया, और संतों-महापुरुषों ने इसे साधना का मन्त्र समझा। जब 1905 में बंग-भंग हुआ, तब प्रत्येक मार्ग और हर में घर में “वंदे मातरम्” गूंजा। यही वह स्वर था जिसने गोपालकृष्ण गोखले, अरविन्द घोष, लोकमान्य तिलक, और महात्मा गाँधी तक के हृदयों में राष्ट्रनिष्ठा की अग्नि प्रज्वलित की। यह गीत राष्ट्र की आत्मा का संगीतमय घोष बन गया जो आज भी भारत की एकता और अखंडता का आधार-स्वर है।

यह भी पढ़ें- वंदे मातरम के 150 साल पर PM मोदी की बड़ी सौगात, जारी हुआ डाक टिकट, सिक्का और वेबसाइट, जानें खास बातें

वंदे मातरम का दार्शनिक आशय

संस्कृत-बंगला मिश्रित यह गीत अद्वैत-वेदान्तीय दृष्टि से भी अद्भुत है। “माँ” कोई सीमित सत्ता नहीं; वह ‘विश्व-माया’ है, जिसके भीतर से समस्त सृष्टि रूप लेती है। जब हम “वंदे मातरम्” कहते हैं, तो वस्तुतः हम ‘मूल-प्रकृति’ का नमस्कार करते हैं, जो हमें पोषण देती है और उसी से हमारी आत्मा का उद्भव होता है। यह गीत हमें यह भी सिखाता है कि राष्ट्र-सेवा केवल सामाजिक दायित्व नहीं, यह योग-साधना है; जहाँ कर्म, भक्ति और ज्ञान तीनों का अद्भुत समन्वय होता है।

आज जब स्वार्थ मुखर हो रहा है तब “वंदे मातरम्” की पुकार हमें एकात्म-भाव की याद दिलाती है। यह गीत हमें बताता है कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में है और उसकी आत्मा सत्य, प्रेम और करुणा के शाश्वत मूल्यों में। वर्षों के इस अमर गीत का उत्सव केवल स्मरण नहीं, संकल्प है कि हम अपनी संस्कृति, एकता और सेवा-भावना को और दृढ़ करें।

Topics: PM ModiNational AnthemNational SongVande Mataramपाञ्चजन्य विशेषvande mataram 150 in150 years of vande mataramwho wrote vande mataramnational song of india
अवधेशानंद गिरि जी
अवधेशानंद गिरि जी
आचार्य महामंडलेश्वर, जूना अखाड़ा [Read more]
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