बिहार विधानसभा चुनाव-2025 :अंधकार युग का दागी समीकरण
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बिहार विधानसभा चुनाव-2025 : अंधकार युग का दागी समीकरण

बिहार की राजनीति का ‘महागठबंधन’ सत्ता की मजबूरी का प्रतीक है न कि जनहित का संकल्प

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 4, 2025, 09:55 am IST
inविश्लेषण, बिहार
तेजस्वी यादव एवं राहुल गांधी : बिहार को बर्बाद करने में दोनों के दल रहे थे शामिल

तेजस्वी यादव एवं राहुल गांधी : बिहार को बर्बाद करने में दोनों के दल रहे थे शामिल

बिहार की राजनीति का इतिहास पुराना और दर्दनाक है। भागलपुर का आंखफोड़वा कांड और दंगे उसकी गवाही हैं, जिनमें कांग्रेस शासन की पुलिस और प्रशासन पर क्रूरता के आरोप साबित हुए। आज वही कांग्रेस नैतिकता का दावा करते हुए बिहार में गठबंधन राजनीति कर रही है। यही विरोधाभास बिहार की राजनीति का सच है, जहां सत्ता की भूख नैतिकता पर भारी पड़ती है।

आंखफोड़वा कांड : 1979-80 में भागलपुर में पुलिस ने 30 से अधिक बंदियों की आंखों में तेजाब डाल दिया। यह क्रूरता कांग्रेस शासन की मूक सहमति से हुई। देशभर में यह मामला ‘भागलपुर ब्लाइंडिंग्स’ नाम से कुख्यात हुआ। मानवाधिकार आयोग ने इसे राज्य प्रायोजित अत्याचार कहा, सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अनुच्छेद 21 का उल्लंघन बताया, पर कांग्रेस सरकार ने न कोई कार्रवाई की, न पीड़ितों को न्याय मिला। मुआवजे और बयानों तक ही सब सीमित रहा। वह दौर बिहार के लिए अंधकार का प्रतीक बन गया, जब कानून की आंखें सचमुच बंद हो गई थीं।

भागलपुर दंगे पर कांग्रेस की चुप्पी : 1989 में भागलपुर दंगों की आग में झुलसा। कांग्रेस सरकार और वही प्रशासन था, जिसने पहले लोगों की आंखें फोड़ी थीं। तीन महीने चले इस दंगे में हजार से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों परिवार उजड़ गए। जांच में पाया गया कि प्रशासन ने मुसलमानों पर हुई हिंसा रोकने में जानबूझकर निष्क्रियता दिखाई, कुछ पुलिसकर्मी खुद भी शामिल थे। कांग्रेस ने जवाबदेही से किनारा किया। आज वह ‘धर्मनिरपेक्षता’ और न्याय की बात करती है, लेकिन लोगों को भागलपुर दंगे उसके शासन की सबसे बड़ी विफलता की याद हैं।

महागठबंधन की नैतिक उलझन : कांग्रेस के महागठबंधन में शामिल होने पर सवाल उठता है, क्या वह सचमुच बदली है? उसने अतीत से कोई सबक लिया? बिहार के मतदाताओं के लिए उसकी आंखफोड़वा और दंगे की यादें तथा राजद के जंगलराज की छवि आज भी जीवित हैं। 1990–2005 का राजद शासन भय, अपहरण और भ्रष्टाचार का प्रतीक था। अब कांग्रेस उसी दल के साथ खड़ी है, जिसे बिहार ने अपराधराज कहा था। यह गठबंधन विकास या न्याय के लिए नहीं, बल्कि सत्ता में वापसी की साझा मजबूरी से बना है। जनता के लिए यह दो अंधकार युगों का पुनर्मिलन है, जिनसे वह मुश्किल से बाहर निकली है। भागलपुर की घटनाओं की जिम्मेदारी प्रशासनिक ही नहीं, राजनीतिक भी थी। पुलिस की क्रूरता और सरकार की मौन भूमिका ने कांग्रेस की साख मिटा दी। 1990 के बाद से वह बिहार में कभी मजबूत नहीं हो सकी और दूसरों के सहारे राजनीति करती रही। भागलपुर के लोगों के लिए कांग्रेस आज भी सत्ता नहीं, सजा का प्रतीक है। जिनकी आंखें फोड़ दी गईं और घर जलाए गए, उनका दर्द अब भी पीढ़ियों तक गूंजता है।

गठबंधन की नैतिकता पर प्रश्न : कांग्रेस जब महागठबंधन की बात करती है, तो भूल जाती है कि राजनीति समीकरणों से नहीं, स्मृतियों से भी चलती है। बिहार के लिए यह गठबंधन दो असफलताओं का मेल है-एक, कांग्रेस जिसके राज में आंखफोड़वा और दंगे हुए तथा दूसरी, राजद जिसने शासन को माफियाओं के हवाले किया। दोनों की विचारधारा भले अलग हो, लेकिन विफलता समान रही।
इसलिए जनता पूछती है क्या यह गठबंधन न्याय की नई सुबह लाएगा या अंधकार लौटाएगा?

Topics: राजद‘जंगलराज’महागठबंधनबिहार की राजनीतिपाञ्चजन्य विशेषबिहार चुनाव 2025भागलपुर आंखफोड़वा कांडकांग्रेस शासनसत्ता की भूख
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