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होम मत अभिमत

वंशवादी राजवंशों का खेल: लोकतंत्र बनाम परिवारवाद की जंग

भारत में वंशवाद लोकतंत्र को खोखला कर रहा है। नव-मुगल सुल्तानों से लेकर जमानत पर घूमते 'ईमानदार' नेताओं तक—जानिए कैसे परिवारवाद सत्ता का हथियार बन गया। लोकतंत्र बचाओ, वंशवाद तोड़ो।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Nov 3, 2025, 01:37 pm IST
in मत अभिमत
Indias democratic Dynasty

प्रतीकात्मक तस्वीर

लोकतंत्र और राजतंत्र में वही रिश्ता है जो सूरज और अंधेरे में होता है — एक जिये तो दूसरा मरता है। पर भारत में कुछ वंशवादी नव-मुग़ल सुल्तानतें हैं, जिन्होंने इस नियम को तोड़ दिया है। वे लोकतंत्र में जीते हैं, पर चालें राजतंत्र की चलते हैं। इनके लिए चुनाव कोई जनादेश नहीं, वंशानुगत ताजपोशी है। पार्टी दफ्तर इनके लिए दरबार है, और जनता उनकी जागीर। सिद्धांत, विचार, नीतियाँ सब बेमानी है। बस खानदान चलता रहे, यही नीति है। योग्यता इनकी नजर में अपमान है, और वंश इनका संविधान।

जहाँ लोकतंत्र में नेता चुने जाते हैं, वहीं इनकी परंपरा में “उत्तराधिकारी” जन्म से तय होता है। चाहे वो बैल-बुद्धि ही क्यों न हो। और जब वही बैल-बुद्धि राजकुमार देश का भविष्य बताया जाए, तो समझिए लोकतंत्र का भविष्य गिरवी रख दिया गया है।

ईमानदारी का ढोल पीटने वाले पप्पू विलायती जमानत पर

विडंबना देखिए — जो लोग “ईमानदारी” का ढोल पीटते नहीं थकते, वही आज जमानत पर बाहर हैं। पप्पू विलायती से लेकर उसकी माताश्री तक, और चारा-प्रेमी समाजवादियों से लेकर आत्म-घोषित ईमानदारी के मसीहाओं तक — सबके नाम जमानती सूची में जगमगाते हैं। फिर भी देश को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, जैसे अदालतें उन पर कृपा कर दोषमुक्त कर चुकी हों।

इनकी राजनीति सेवा नहीं, परिवार नियोजन योजना है — हर पद, हर ठेका, हर टिकट घर की चारदीवारी में बंट जाता है। लोकतंत्र इनके लिए बस एक पांच साल की रस्म है जिससे जनता यह भ्रम बनाए रखे कि सत्ता उसकी है।

सच्चाई यह है कि लोकतंत्र और वंशवाद एक साथ नहीं जी सकते। एक का जीवन दूसरे की मृत्यु पर टिका है। लोकतंत्र तब तक साँस नहीं ले सकता जब तक वंशवादी राजवंशों को राजनीति के कब्रिस्तान में दफन न कर दिया जाए।

“नव-मुग़ल सुल्तानों” को पहचानने की जरूरत

जब तक जनता इन्हें ठुकराना नहीं सीखेगी, भारत का लोकतंत्र इन “नव-मुग़ल सुल्तानों” की कैद में रहेगा — जो मंचों पर नैतिकता के भाषण देते हैं, और अदालतों में जमानत की तारीखें बढ़वाते हैं। क्योंकि सच्चाई यही है — भारत में राजे-रजवाड़े खत्म नहीं हुए हैं,
बस अब वे “जनसेवक” कहलाते हैं।

“जब देश के बड़े अख़बार वंशवादी नेताओं के इंटरव्यू को पहले पन्ने पर जगह देते हैं, तो समझिए पत्रकारिता नहीं, जनसंपर्क चल रहा है। जनता बार-बार जिन्हें नकार चुकी, वही ‘युवा उम्मीद’ बनकर पेश किए जा रहे हैं। लोकतंत्र जवाबदेही से चलता है, वंश से नहीं — और जो मीडिया यह फर्क भूल जाए, वो सच्चाई का नहीं, छल का साझेदार बन जाता है।”

Topics: परिवारवाद की राजनीतिभारतीय लोकतंत्र का भविष्यपप्पूDynasty IndiaDemocracy vs Monarchyराजतंत्रPolitics of NepotismmonarchyFuture of Indian DemocracyIndian DemocracyPappuभारतीय लोकतंत्रवंशवाद भारतलोकतंत्र vs राजतंत्र
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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