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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 : अब नारे नहीं, नतीजा चाहता है राज्य

राजग के पक्ष में एमवाई (महिला-युवा) समीकरण बिहार की राजनीति में निर्णायक पहलू बनता जा रहा है। एक ओर है जातीय समीकरणों की राजनीति, दूसरी ओर विकास और अवसर पर आधारित राजनीति

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 3, 2025, 05:54 pm IST
in विश्लेषण, बिहार

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 किसी नए नारे या नैरेटिव का नहीं, बल्कि मौजूदा नेतृत्व और विकास की निरंतरता का चुनाव बन चुका है। हमने जनता के मन की थाह लेने की कोशिश को तो पता चला कि वह बदलाव नहीं, बल्कि स्थिरता और प्रगति को प्राथमिकता दे रही है। राज्य के हर सर्वेक्षण में भी यही झलक रहा है। राजद के परंपरागत मुस्लिम-यादव (एमवाई) समीकरण के सामने अब भाजपा-जदयू का नया महिला-युवा (एमवाई) समीकरण खड़ा है। यह टकराव केवल वोटों का नहीं, दृष्टिकोणों का भी है। एक ओर जातीय समीकरणों की राजनीति, दूसरी ओर विकास व अवसर पर आधारित राजनीति।

नवीन कुमार
क्षेत्रीय निदेशक
राजनीति पॉलिटिकल कन्सल्टेंसी

पिछले चुनाव में जदयू की स्थिति कमजोर थी और वह 43 सीटों पर सिमट गई थी। इसका बड़ा कारण लोजपा का अलग चुनाव लड़ना था, जिससे राजग को नुकसान हुआ। इस बार जमीन पर तस्वीर बदली हुई दिख रही है। महागठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण को लेकर है। राजद-कांग्रेस कई सीटों पर आमने-सामने हैं, जिससे ‘फ्रेंडली फाइट’ जैसी स्थितियां बन रही हैं। ऐसे में अंदरूनी मतभेद गठबंधन के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। इसके उलट, राजग में संगठनात्मक स्थिति अपेक्षाकृत व्यवस्थित और अनुशासित है।

प्रशांत किशोर की चुनौती

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस बार प्रशांत किशोर पर भी है। वे सीटें जीतें या न जीतें, कुछ क्षेत्रों में बड़े नेताओं का समीकरण बिगाड़ने की स्थिति में जरूर हैं। उनकी रणनीति जमीन से जुड़ने के बजाय दिल्ली-केंद्रित रही, जिसके कारण प्रभाव सीमित है। आम आदमी पार्टी की शुरुआती सफलता में जिस सामूहिक संगठन की भूमिका थी, वह प्रशांत किशोर के प्रयासों में अनुपस्थित दिखाई देती है।

विकास और जनता का भरोसा

नीतीश सरकार की कई योजनाएं इस समय जनता के बीच लोकप्रिय हैं। 125 यूनिट बिजली माफी, महिला स्वयं सहायता समूहों को 10,000 रुपये की सहायता जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच मजबूत आधार बनाया है। उद्योग मंत्री नितीश मिश्रा के प्रयासों से औद्योगिकीकरण को लेकर भी एक नई उम्मीद बनी है। दूसरी ओर, तेजस्वी यादव का ‘हर परिवार को नौकरी’ वाला वादा जनता को अवास्तविक लग रहा है। जनता अब घोषणाओं से ज्यादा परिणामों को महत्व दे रही है। इसी के चलते महिला और युवा मतदाता बड़ी संख्या में एनडीए के पक्ष में झुकते दिख रहे हैं। यही नया एमवाई समीकरण बिहार की राजनीति में निर्णायक फैक्टर बनता जा रहा है।

जातीय राजनीति का बदलता संतुलन

इस चुनाव में जातीय विभाजन पहले की तुलना में कमजोर पड़ता दिख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के ओबीसी फोकस और नीतीश कुमार के सामाजिक संतुलन ने मिलकर एनडीए को व्यापक आधार दिया है। पासवान (लोजपा), मांझी (मुसहर), उपेंद्र कुशवाहा (कुशवाहा) और नीतीश कुमार (कुर्मी) जैसे नेताओं के साथ-साथ कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ मिलने से सामाजिक समीकरण सशक्त हुए हैं। यादव समाज में भी एक वर्ग ऐसा है जो अब विकास और स्थिर शासन को प्राथमिकता दे रहा है। उन्हें लगने लगा है कि प्रगति केवल एनडीए के नेतृत्व में संभव है। महिलाओं-युवाओं की सक्रिय भागीदारी, रोजगार, शिक्षा व इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी अपेक्षाएं बिहार की राजनीति का नया आधार बन चुकी हैं। बिहार अब नारे नहीं, नतीजे चाहता है।

सड़कों ने बदली तस्वीर

1998 में गया जिले के एक गांव के 35 वर्षीय रामलखन सिंह को दिल का दाैरा पड़ा। लालू-राज में सड़कें खस्ताहाल होने के कारण उन्हें एंबुलेंस से 80 किमी. दूर पटना एम्स तक पहुंचने में पांच घंटे से अधिक समय लगा। उनकी रास्ते में ही मौत हो गई। एम्स के डॉक्टरों ने कहा कि एक-दो घंटे पहले पहुंचते तो जान बच सकती थी।

2019 में वैशाली जिले की राधा देवी को प्रसव के दौरान गंभीर जटिलताएं आईं। स्वास्थ्य केंद्र ने उन्हें तुरंत पटना रेफर किया। सड़कें अच्छी होने के कारण एंबुलेंस मात्र 45 मिनट में 30 किमी. दूर पटना पहुंच गई। समय पर इलाज से न सिर्फ राधा देवी की जान बची, बल्कि उन्होंने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। ये दोनों घटनाएं दिखाती हैं कि बेहतर सड़कों ने कितनी जिंदगियों को नई राहत दी है।

Topics: जातीय बनाम विकास राजनीतिजनता की वर्तमान मांगलोजपा से नुकसानमहागठबंधन की चुनौतीकर्पूरी ठाकुर 'भारत रत्न'Karpoori Thakur 'Bharat Ratnaप्रशांत किशोरसड़कों ने बदली तस्वीरपाञ्चजन्य विशेषआंतरिक समस्यानारे नहींनतीजा
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