बिहार विधानसभा चुनाव 2025 : लालू राज से NDA सरकार तक, बिहार में स्वास्थ्य क्रांति की कहानी, पत्रकार की जुबानी
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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 : लालू राज से NDA सरकार तक, बिहार में स्वास्थ्य क्रांति की कहानी, पत्रकार की जुबानी

लालू यादव के शासनकाल में बिहार की स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल थीं, लेकिन मोदी-नीतीश की एनडीए सरकार ने गाँव-गाँव तक इलाज और एम्बुलेंस पहुंचाकर तस्वीर बदल दी।

Written byमनोज रघुवंशीमनोज रघुवंशी
Oct 28, 2025, 07:30 pm IST
inभारत, विश्लेषण, बिहार

लालू यादव के शासन काल में बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा प्रदेश की बहुत बड़ी कमज़ोरी था। इस कटु यथार्थ का प्रत्यक्षदर्शी गवाह है ये संवाददाता। वर्ष 1991 में बिहार में काला अज़ार की महामारी कई ज़िलों में फैल चुकी थी, और सैकड़ों लोग उस से मर रहे थे। इस संवाददाता ने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव से पूछा कि क्या आप को मालूम है कि कितने लोग इस बिमारी से आक्रान्त हैं, और कितने लोग मर चुके हैं? लालू यादव ने कहा कि उन्हें ये जानकारी नहीं है। फिर इस संवाददाता ने पूछा कि क्या आप ने किसी ज़िले का दौरा किया है जहाँ ये महामारी जड़ पकड़ गयी है? उन्होंने कहा, नहीं। जब इस संवाददाता ने पूछा कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री माखन लाल फ़ोतेदार ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी थी, तो उन्होंने सवाल का मज़ाक उड़ाया। कमरे में बैठे लालू यादव के दरबारी उन के मसखरेपन की दाद देने के लिए इस संवाददाता के सवालों पर लगातार हँस रहे थे।

केंद्रीय मंत्री की चिट्ठी पर भी नहीं दी प्रतिक्रिया

फ़ोतेदार ने इस संवाददाता को बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री लालू यादव को लिखा था कि काला अज़ार के सन्दर्भ में प्रदेश को जो भी ज़रूरत हो, केंद्र सरकार को बताइये। लालू यादव ने मदद माँगना तो दूर, चिट्ठी का जवाब तक नहीं दिया। उल्टा लालू यादव ने समस्या को नज़रअंदाज़ करने की नीयत से ये कहा कि मैं जानता हूँ कुछ डॉक्टर पैनिक फैलाते हैं कि कोई स्कीम बना दो, मैं खाऊं।

स्वास्थ्य मंत्री को भी नहीं थी कोई जानकारी

बिहार की तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री, सुधा श्रीवास्तव को भी न तो आक्रांत लोगों की संख्या पता थी, न मृतकों की। न ही उन्होंने किसी गांव का दौरा किया था। उन्होंने इस संवाददाता के कैमरे पर ये स्वीकार किया कि गाँव के लिए मनोनीत सरकारी डॉक्टर गाँव में नहीं जाते हैं क्योंकि वो शहरों में प्राइवेट प्रैक्टिस में लगे होते हैं।

सरकारी दवाइयों की सरेआम काला बाज़ारी

सरे आम सरकारी दवाइयों की काला बाज़ारी हो रही थी।

स्वास्थ्य निदेशक ने मानी अपनी गलती

प्रदेश के स्वास्थ्य निदेशक आर. के. पासवान ने इस पत्रकार के साक्षात्कार में ये स्वीकारा कि अगर डी.डी.टी. का छिड़काव किया गया होता तो काला अज़ार को फैलाने वाली सैंड फ़्लाई मर जाती, और ये बीमारी नहीं फैलती। जब इस संवाददाता ने पूछा कि मरने वालों की मृत्यु के लिए उन्हें क्या सजा मिलनी चाहिए, तो स्वास्थ्य निदेशक ने जवाब दिया कि क्या सजा बताया जाय? “हम लोग गिल्टी हैं, थोड़ा।”

अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, दवाएं नहीं

बिहार में उन दिनों ऐसा दुर्दांत माहौल था जिस में अस्पतालों में डॉक्टर नहीं होते थे, दवाएं नहीं मिलती थीं, और जनता की ज़िन्दगी दाँव पर लगी थी। गरीब लोग अक्सर इलाज होने से पहले ही हार मान लेते थे।

मोदी-नीतीश सरकार ने बदला बिहार का स्वास्थ्य परिदृश्य

उस माहौल से प्रदेश को बाहर निकाला है मोदी-नीतीश की ऍन.डी.ऐ. सरकार ने। अब स्वास्थ्य सेवाएं सीधे गाँव तक पहुँचने लगी हैं। गाँव से शहर न जाने से ग़रीबों के समय की भी बचत होती है, और पैसे की भी। गाँव तक पहुँचने वाली सेवा में एक वैन के अंदर डॉक्टर, कम्पाउण्डर और दवाइयाँ, सब कुछ होता है।

गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए बेहतर टीकाकरण

गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा के लिए टीकाकरण किया जाता है, जिससे माता और नवजात शिशु, दोनों टेटनस जैसी बीमारियों से बचे रहें। यूनिवर्सल इम्यूनाइज़ेशन प्रोग्राम के तहत बच्चों को डिप्थीरिया, काली खांसी, टेटनस, पोलियो, खसरा, रूबेला और हेपेटाइटस बी जैसी बीमारियों से बचाव के लिए टीका दिया जाता है।

निशुल्क एम्बुलेंस सेवाएं और आपातकालीन सहायता

बिहार में हर नागरिक के लिए दो तरह की निशुल्क एम्ब्युलेंस सेवा मौजूद है। किसी भी लैंडलाइन या मोबाईल से 108 नंबर मिलाने पर हर तरह की सरकारी ऐमरजेंसी सेवा का लाभ उठाया जा सकता है, चाहे वो एक्सीडेंट हो, या दिल का दौरा। गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए एम्ब्युलेंस सेवा के लिए 102 नंबर मिलाना होता है। ये दोनों सुविधाएँ राष्ट्रिय स्वास्थ्य मिशन के तहत 24 घंटे चलायी जा रहीं हैं।

स्वास्थ्य उपकेंद्रों का पुनर्गठन और जीवन प्रत्याशा में वृद्धि

स्वास्थ्य उपकेंद्रों को पुनर्गठित कर के उन का स्तर बढ़ाया जा रहा है। केंद्र और प्रदेश की सरकारों के मिले-जुले प्रयत्न से जीवन की प्रत्याशा बढ़ी है। जहां सन् 2006-10 में बिहार में औसत आयु 65.8 साल थी, वहीं, 2016-20 में ये बढ़ के 69.5 साल हो गयी। वर्ष 2025 के लिए दो अनुमान मौजूद हैं। एक के मुताबिक़ बिहार में औसत आयु 70 साल हो गयी है। और दूसरे आंकड़े के मुताबिक़ 71.8 साल। दोनों ही आंकड़े 2016-20 के आंकड़े से ज़्यादा हैं।

शिशु मृत्यु दर में भारी कमी

बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं के बेह्तरीकरण का फ़ायदा ये हुआ है कि जहाँ सन् 2015 में हज़ार में से 42 नवजात शिशुओं की मृत्यु हो जाती थी, वहीं 2020 तक पहुँचते-पहुँचते 1000 में केवल 27 नवजात शिशुओं को जीवन से हाथ धोना पड़ता है।

नए मेडिकल कॉलेज और कैंसर अस्पताल की स्थापना

इस साल तक बिहार में 22 मान्यताप्राप्त मेडिकल कॉलेज हो गए हैं, जिन में 3000 ऍम.बी.बी.ऍस. की सीटें हैं। मुज़फ़्फ़रपुर में होमी भाभा कैन्सर अस्पताल और अनुसंधान केंद्र इस साल अगस्त में स्थापित हुआ है।

आयुष्मान भारत योजना से हर परिवार को सुरक्षा

आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत हर परिवार को पांच लाख रूपए तक के मुफ़्त इलाज की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।

स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने से बढ़ा जनकल्याण और विकास

मोदी-नीतीश के एन.डी.ए. द्वारा स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने से जन कल्याण की भावना मज़बूत हुई है और प्रदेश में सामाजिक पूँजी की वृद्धि हुई है। इस बढ़ोतरी में आर्थिक और सामाजिक, दोनों पहलू शामिल हैं।

राज्य की जीडीपी वृद्धि और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं

स्थिर कीमतों पर आँका जाए तो प्रदेश की जी.ऍस.डी.पी. में 2022-23 में 10.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ये राष्ट्रिय औसत से 7.2 प्रतिशत ज़्यादा है। इस के अलावा सामाजिक सुरक्षा पेन्शन के अंतर्गत बुज़ुर्गों, दिव्यांगों और विधवा महिलाओं के लिए पेन्शन को 400 रूपए से बढ़ा कर 1100 रूपए कर गया है।

Topics: बिहार स्वास्थ्य सुधारLalu Yadav healthcare failureModi Nitish NDA Biharमेडिकल कॉलेजBihar health transformationबिहारबिहार स्वास्थ्य सेवाएँआयुष्मान भारतबिहार विकासनरेंद्र मोदीUniversal Immunizationलालू यादवNational Health Missionनीतीश कुमारMuzaffarpur Cancer Hospitalप्रधानमंत्री जन आरोग्य योजनाएनडीए
मनोज रघुवंशी
मनोज रघुवंशी
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