ट्रंप सरकार द्वारा H-1B वीजा के लिए 100,000 डॉलर की फीस तय करने के खिलाफ कई संगठनों ने कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया है। इस पर व्हाइट हाउस ने अपने इस कदम पर सफाई देते हुए बयान जारी किया है कि उसने इसे अमेरिकी मजदूरों की रक्षा और सिस्टम में फैले फ्रॉड को रोकने के लिए लागू किया है। ये फीस नए वीजा आवेदनों पर लगेगी, जो पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। मामला कोर्ट में पहुंच चुका है, और सरकार इसे कानूनी तौर पर मजबूत साबित करने की तैयारी में है।
व्हाइट हाउस की सफाई
व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी करोलिन लेविट ने गुरुवार को कहा कि सरकार इन मुकदमों से लड़ेगी। उनका कहना था, “राष्ट्रपति का मुख्य फोकस हमेशा अमेरिकी मजदूरों को प्राथमिकता देना रहा है। H-1B सिस्टम सालों से फ्रॉड से भरा पड़ा है, जिससे अमेरिकी मजदूरों की सैलरी घटी है। इसलिए राष्ट्रपति ने इसे सुधारने के लिए ये नीतियां लागू कीं। ये कदम कानूनी हैं, जरूरी हैं, और हम कोर्ट में लड़ेंगे।” लेविट का कहना है कि ये बदलाव वीजा सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए हैं, ताकि अमेरिकी कामगारों को फायदा हो। सरकार का दावा है कि फ्रॉड की वजह से कंपनियां विदेशी मजदूरों को सस्ते में हायर कर रही थीं, जो लोकल इकोनॉमी को नुकसान पहुंचा रहा था।
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ट्रंप प्रशासन के खिलाफ कई मुकदमे
अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स ने ट्रंप सरकार के द्वारा H-1B वीजा फीस बढ़ाने को गैरकानूनी बताते हुए सबसे पहले मुकदमा दायर किया है। चैंबर के एक्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट और चीफ पॉलिसी ऑफिसर नील ब्रैडली ने कहा, “ये 100,000 डॉलर की फीस अमेरिकी कंपनियों, खासकर स्टार्टअप्स और छोटे-मध्यम बिजनेस के लिए बहुत महंगी साबित होगी। H-1B प्रोग्राम को कांग्रेस ने बनाया था ताकि हर साइज की कंपनियां ग्लोबल टैलेंट हायर कर सकें और अमेरिका में ग्रोथ कर सकें।”
ब्रैडली ने आगे जोड़ा कि ट्रंप की इकोनॉमिक पॉलिसीज ने निवेश को बढ़ावा दिया है, लेकिन ये फीस कंपनियों को जरूरी मजदूर ढूंढने में मुश्किल डालेगी। उनका कहना है, “ट्रंप ने टैक्स रिफॉर्म्स, एनर्जी अनलॉकिंग और रेगुलेशंस कम करने जैसे कदम उठाए हैं, जिन्हें हम सपोर्ट करते हैं। लेकिन ग्रोथ के लिए हमें ज्यादा मजदूर चाहिए, कम नहीं।”
कैलिफोर्निया और वॉशिंगटन डीसी की फेडरल कोर्ट्स में यूनियंस, एम्प्लॉयर्स और रिलिजियस ग्रुप्स ने भी अलग-अलग मुकदमे दायर किए। इनका कहना है कि फीस इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करती है, जो कहता है कि फीस सिर्फ प्रोसेसिंग कॉस्ट के बराबर होनी चाहिए। एक कोलीशन ने इसे “अनरिफ्लेक्टिव और कैप्रिशियस” बताया।
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H-1B प्रोग्राम, टेक सेक्टर और इंडियन प्रोफेशनल्स
H-1B वीजा प्रोग्राम अमेरिकी कंपनियों को हाईली स्किल्ड फॉरेन वर्कर्स हायर करने की इजाजत देता है। इसमें सबसे ज्यादा इंडियन आईटी प्रोफेशनल्स आते हैं। नई फीस मौजूदा प्रोसेसिंग कॉस्ट्स (कुछ हजार डॉलर) से कहीं ज्यादा है। कंपनियां इसे मौजूदा वेटिंग चार्जेस के अलावा देंगी। सरकार अभी तय कर रही है कि ये फीस एकमुश्त लें या सालाना। चैंबर ने चेतावनी दी है कि इतनी ऊंची फीस से कंपनियां H-1B प्रोग्राम छोड़ सकती हैं। अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसे टेक जायंट्स पर इसका बुरा असर पड़ेगा, क्योंकि ये विदेशी टैलेंट पर निर्भर हैं।

















