जानिए क्यों भाई दूज है रिश्तों में प्रेम और निस्वार्थता का प्रतीक?
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जानिए क्यों भाई दूज है रिश्तों में प्रेम और निस्वार्थता का प्रतीक?

भारतीय संस्कृति जितनी गहरी है, रिश्तों की मिठास भी उसमें गहराई से समायी हुई है। प्रत्येक त्यौहार, प्रत्येक परम्परा, केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि आत्मीयता और बंधनों का जीवंत उत्सव है।

Written byश्वेता गोयलश्वेता गोयल — edited by Mahak Singh
Oct 22, 2025, 02:03 pm IST
in धर्म-संस्कृति
Bhai Dooj 2025

Bhai Dooj 2025

भारतीय संस्कृति जितनी गहरी है, रिश्तों की मिठास भी उसमें गहराई से समायी हुई है। प्रत्येक त्यौहार, प्रत्येक परम्परा, केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि आत्मीयता और बंधनों का जीवंत उत्सव है। इन रिश्तों की पवित्रता और स्नेह का सबसे उज्ज्वल प्रतीक ‘भाई दूज‘ है, वह दिन जब एक बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाती है और उसकी लंबी उम्र, खुशी और समृद्धि की कामना करती है। यह त्यौहार न केवल पारिवारिक निकटता का प्रतीक है, बल्कि शाश्वत भारतीय जीवन दर्शन में निहित प्रेम, सुरक्षा और श्रद्धा के गहरे बंधनों का जीवंत दस्तावेज भी है। ‘भाई दूज’ का उल्लेख प्राचीन धर्मग्रंथों में भी मिलता है। स्कंद पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण दोनों में इस पर्व की महिमा का विस्तार से वर्णन है। माना जाता है कि भाई दूज की परंपरा रक्षाबंधन से भी प्राचीन है। यह वह क्षण है, जब बहन के स्नेह और भाई की सुरक्षा का व्रत एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। भारतीय संस्कृति में यह पर्व केवल भाई-बहन के संबंध का प्रतीक नहीं बल्कि पूरे परिवार के भावनात्मक ताने-बाने को मजबूत करने का अवसर भी है।

भाई दूज तिथि और शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार इस वर्ष कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 22 अक्टूबर की रात्रि 8 बजकर 17 मिनट से प्रारंभ होकर 23 अक्टूबर की रात्रि 10 बजकर 47 मिनट तक रहेगी। इसलिए भाई दूज का पावन पर्व 23 अक्तूबर को मनाया जाएगा। इस दिन तिलक का शुभ मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 5 मिनट से 2 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इस तिथि को ‘यम द्वितीया’ अथवा ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि इस दिन भाई यदि अपनी बहन के साथ यमुना अथवा किसी भी पवित्र नदी में स्नान करे तो उसे आयुष्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

भाई दूज कथा

भाई दूज का उल्लेख जिस कथा में सर्वाधिक हृदयस्पर्शी रूप से मिलता है, वह है यमराज और यमुना देवी की अमर कथा। भगवान सूर्यदेव और छाया के पुत्र-पुत्री यमराज और यमुना का यह प्रसंग प्रेम की उस अनोखी कथा को सामने लाता है, जिसमें बहन का स्नेह मृत्यु के देवता को भी झुका देता है। यमुना अपने भाई यमराज को स्नेहपूर्वक बार-बार अपने घर आमंत्रित करती थी किंतु यमराज अपने कर्त्तव्यबद्ध स्वभाव के कारण हर बार टाल देते थे। अंततः कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमराज ने अपनी बहन के आग्रह को स्वीकार किया और उसके घर पहुंचे। बहन यमुना ने उस दिन अपने भाई का स्वागत अत्यंत श्रद्धा और उत्साह से किया। उसने अपने घर को फूलों से सजाया, दीप जलाए और नाना प्रकार के व्यंजन बनाकर अपने भाई को परोसे। यमराज, जो समस्त प्राणियों के प्राण हरने वाले माने जाते हैं, बहन के उस निर्मल प्रेम और सेवा भाव से अत्यंत भावुक हो उठे। उन्होंने प्रसन्न होकर यमुना को वरदान देने का वचन दिया। यमुना ने कहा, ‘भैया, आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आएं और मेरी तरह जो भी बहन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसके भाई को आपके प्रकोप का भय कभी न रहे।’ यमराज ने सहर्ष यह वरदान स्वीकार किया। तभी से इस दिन को ‘यम द्वितीया’ या ‘भाई दूज’ के रूप में मनाया जाने लगा।

यह कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं बल्कि इस बात का शाश्वत प्रमाण है कि प्रेम, करुणा और स्नेह के आगे मृत्यु तक नतमस्तक हो जाती है। यही वह क्षण था, जब बहन के स्नेह ने मृत्यु को अमरत्व में परिवर्तित कर दिया। किंवदंतियों में भाई दूज से जुड़ी एक और कथा भी अत्यंत भावनात्मक है कृ एक ब्राह्मण कन्या की, जिसने अपने भाई के प्राण बचाने के लिए अपने पुत्र तक को सोता छोड़ दिया। जब उसे ज्ञात हुआ कि उसने अनजाने में अपने भाई को दिया भोजन विषाक्त आटे से बनाया है तो वह सब कुछ त्यागकर अपने भाई के पीछे दौड़ी। मार्ग में उसे नाग-नागिन मिले, जिन्होंने कहा कि भाई की रक्षा तभी संभव है, जब विवाह के सारे कार्य बहन स्वयं करे। उसने न केवल भाई के स्थान पर सभी रीति-रिवाज पूरे किए बल्कि नाग-नागिन से उसका जीवन बचाने के लिए स्वयं युद्ध किया। उसकी निष्ठा और प्रेम ने मृत्यु को भी परास्त कर दिया। यह कथा इस पर्व के पीछे निहित भावनात्मक गहराई और समर्पण का प्रतीक है, एक ऐसी बहन का प्रतीक, जो अपने भाई के जीवन के लिए स्वयं यमराज से भी युद्ध कर सकती है।

भाई-बहन के प्रेम और संस्कार का प्रतीक

ऐसे उदाहरण केवल पौराणिक आख्यान नहीं बल्कि भारतीय समाज में स्त्री के उस रूप की पहचान हैं, जो स्नेह और साहस दोनों का प्रतीक है। यमुना की भक्ति, ब्राह्मण कन्या का समर्पण और बहनों का आज भी निभाया जाने वाला यह व्रत, सब एक ही सूत्र में बंधे हैं ‘भाई की दीर्घायु और सुख की कामना’। भाई दूज का पर्व भारत के हर कोने में भिन्न-भिन्न रूपों में मनाया जाता है। कहीं बहनें अपने भाई का तिलक कर उन्हें भोजन कराती हैं, कहीं यमराज-यमुना की कथा सुनाई जाती है तो कहीं भाई-बहन साथ में यमुना में स्नान कर इस बंधन को पवित्र बनाते हैं।

रिश्तों में प्रेम और सम्मान का उत्सव

गांवों में यह पर्व आत्मीयता और पारिवारिक एकता का उत्सव बन जाता है। शहरों में भले ही जीवन की रफ्तार तेज हो लेकिन इस दिन बहन के हाथों का तिलक और उसके स्नेह भरे शब्द आज भी वही अपनापन जगा देते हैं, जो सदियों पहले यमुना ने यमराज के चरणों में अनुभव किया था। इस पर्व का भाव केवल बहन द्वारा भाई के प्रति स्नेह का प्रदर्शन नहीं है बल्कि यह भाई द्वारा भी बहन की सुरक्षा, सम्मान और सुख का व्रत लेने का प्रतीक है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि संबंधों की बुनियाद केवल रक्त से नहीं बल्कि प्रेम, आदर और विश्वास से जुड़ी होती है।

भाई दूज: रिश्तों में निस्वार्थता और सामाजिक एकता का प्रतीक

भाई दूज के इस पर्व का सामाजिक महत्व भी कम नहीं है। यह पर्व केवल घर की चौखट पर नहीं रुकता बल्कि समाज में एकता, बंधुत्व और करुणा के संदेश को आगे बढ़ाता है। यह हमें सिखाता है कि हर बहन में यमुना की पवित्रता हो, हर भाई में यमराज की विनम्रता और संवेदना हो। यह दिवस जीवन के उस आदर्श का स्मरण कराता है, जिसमें हम एक-दूसरे की भलाई के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करें। आधुनिक समय में जब पारिवारिक संबंधों में दूरी बढ़ती जा रही है, तब भाई दूज का यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है। यह हमें बताता है कि रिश्तों की असली ताकत धन या उपहारों में नहीं बल्कि भावनाओं की सच्चाई में होती है। जब बहन अपने भाई के माथे पर तिलक करती है तो वह केवल आशीर्वाद नहीं देती बल्कि वह एक व्रत लेती है कि उसका भाई सदैव धर्मपथ पर रहे और भाई यह प्रण लेता है कि उसकी बहन का सम्मान, सुरक्षा और सुख उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता रहेंगे।

आज के इस युग में जब रिश्ते समय और सुविधाओं के बोझ तले दबने लगे हैं, भाई दूज जैसे पर्व हमें याद दिलाते हैं कि प्रेम, स्नेह और अपनापन ही जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति हैं। जिस घर में बहन के हाथों का तिलक और भाई के हृदय का आशीर्वाद विद्यमान हो, वहां सुख, शांति और समृद्धि स्वयं आकर बस जाती है। भाई दूज का यह पर्व उस भाव का उत्सव है, जो हमें अपने भीतर झांकने और रिश्तों के अर्थ को पुनः समझने के लिए प्रेरित करता है। यह हमें संदेश देता है कि रिश्तों की रोशनी तब तक जगमगाती रहती है, जब तक उनमें स्नेह का दीप जलता रहे। इसीलिए कहा गया है-

सबकी बहन हो यमुना जैसी,
जिसके स्नेह से मृत्यु भी जीवन बन जाए।

भाई दूज का संदेश यही है कि रिश्तों की सबसे बड़ी शक्ति प्रेम है, एक ऐसा प्रेम, जो न समय से हारता है, न परिस्थितियों से। जब तक इस धरती पर यमुना की तरह स्नेह की धारा बहती रहेगी, तब तक भाई दूज का दीप सदा प्रज्वलित रहेगा, प्रेम, श्रद्धा और सुरक्षा का प्रतीक बनकर।

Topics: bhai dooj kab haiभाई दूज 2025यम द्वितीयाभ्रातृ द्वितीयायमराज और यमुना देवी की कथाभारतीय संस्कृतिIndian CultureBhai DoojBhai Dooj 2025bhai dooj 2025 date
श्वेता गोयल
श्वेता गोयल
शिक्षाविद्, डेढ़ दशक से अधिक समय से शिक्षण क्षेत्र में सक्रिय [Read more]
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