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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ @100 : भ्रामक षड्यंत्र तार-तार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के बाद से ही उसके विरुद्ध दुष्प्रचार शुरू कर दिया गया था। इस कारण ब्रिटिश सरकार ने 1932 में मध्य प्रांत और बरार (आज के मध्य प्रदेश) में एक आदेश जारी करके सरकारी कर्मचारियों को संघ की सदस्यता लेने से प्रतिबंधित कर दिया था। ऐसा ही प्रतिबंध 1966 में इंदिरा गांधी ने भी लगाया था। इन बाधाओं और प्रतिबंधों के बावजूद संघ का विस्तार होता गया

Written byPanchjanyaPanchjanya
Oct 15, 2025, 10:18 pm IST
in भारत, विश्लेषण, संघ @100

विनोद कुमार शुक्ल

इस वर्ष विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे किए। संघ इसे पूरे उत्साह के साथ वैश्विक स्तर पर मना रहा है। संघ के कई बड़े अधिकारियों ने विदेश में आयोजित कार्यक्रमों की तैयारियों में अहम भूमिका निभाई। लेकिन संघ की यह 100 वर्ष की यात्रा काफी कठिनाइयों भरी रही, क्योंकि इसे लगातार राजनीतिक कारणों से निशाने पर रखा गया और इसके सामाजिक कार्यों को न केवल नजरअंदाज किया गया, बल्कि प्रश्न भी खड़े किये गए। फिर भी इन सबसे बेफिक्र, संघ और उसके स्वयंसेवक आद्य सरसंघचालक डाॅ. केशवराव बलिराम हेडगेवार की बातों का अनुसरण करते हुए अपने कार्य में जुटे रहे।

27 सितम्बर, 1925 से प्रारम्भ हुआ संघ कार्य लगातार जारी है। संघ को कई स्तर पर निशाने पर लिया गया और उसके खिलाफ दुष्प्रचार किया गया, यहां तक कि संघ पर प्रतिबंध भी लगाए गए, लेकिन हर कसौटी पर संघ खरा उतरा। दुष्प्रचार के नाम पर संघ की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका को लेकर प्रश्न उठाया जाता है और इस झूठ को लगातार फैलाया जाता है, लेकिन अब ये सारे झूठ बेनकाब हो रहे हैं। एक लम्बी सूची है संघ से जुड़े लोगों की स्वतंत्रता में भागीदारी की। इसका विवरण रतन शारदा की पुस्तक ‘द संघ एंड स्वराज’ और अन्य कई पुस्तकों में विस्तृत रूप से उपलब्ध है। संघ के लोगों की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका को कमतर आंकना वैचारिक बेईमानी है जो अब नए शोध और लेखन से उद्घाटित होने लगी है।

दूसरा आरोप संघ के सांप्रदायिक होने का लगता है और यह कहा जाता है कि संघ की इससे जुड़ी गतिविधियों के कारण उस पर प्रतिबंध लगा। लेकिन यह शरारत से भरा झूठ और सिर्फ संघ के लोगों को चिढ़ाने और नए लोगों को संघ से दूर रखने की साजिश का हिस्सा है। संघ पर अब तक तीन बार प्रतिबंध लगा। पहला 4 फ़रवरी, 1948 को गांधी जी की हत्या के बाद। दूसरा 1975 में आपातकाल लागू होने के बाद और तीसरा 1992 में बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद। किंतु प्रतिबंध लगाने वालों के तर्क हास्यास्पद हैं। जैसे कि गांधी जी की हत्या के बाद ‘कार्यकर्ताओं ने मिठाई बांटी थी’, जो अनैतिक तो हो सकता है, लेकिन गैरकानूनी नहीं। किसी भी संगठन पर प्रतिबंध लगाने के पीछे सरकार को यह सुनिश्चित करना होता है कि वह अदालत में चुनौती दिए जाने के बाद ठहर पायेगा कि नहीं।

गांधी जी की हत्या के बाद 26 फ़रवरी, 1948 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गृह मंत्री सरदार पटेल को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘यद्यपि बापू की हत्या की जांच यहां और बॉम्बे और अन्य जगहों पर हो रही है लेकिन इसके पीछे की बड़ी साजिश को खोजने की दिशा में सही प्रयास नहीं हो रहे हैं। और अब मैं अधिक निष्कर्ष पर पहुंच रहा हूं कि यह कोई अलग—थलग घटना नहीं, बल्कि आरएसएस के द्वारा एक बड़े सुनियोजित अभियान का हिस्सा था।’ लेकिन अगले ही दिन यानी 27 फरवरी, 1948 को पटेल ने अपने जवाब में कहा, ‘मैं लगभग प्रतिदिन बापू की हत्या की जांच की प्रगति पर नजर बनाये हुए हूं…. इन गतिविधियों का केंद्र थे पुणे, बॉम्बे, अहमदनगर और ग्वालियर। दिल्ली निश्चित रूप से घटना को अंजाम देने वाला आखिरी बिंदु था, लेकिन किसी दृष्टि से केंद्र बिंदु नहीं था। इनमें से [आरोपी] किसी ने भी एक या दो दिन से ज्यादा शहर में नहीं गुजारे और वह भी 19 से 30 जनवरी के बाद केवल दो दिन। इन सब बयानों से साफ होता है कि इस पूरे मामले में आरएसएस की कतई कोई भूमिका नहीं थी।’

लेकिन इन सब बयानों के बावजूद प्रतिबंध नहीं उठा और द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और सरकार में सचिव एच. वी. आर. आयंगर के साथ लंबे चौड़े पत्राचार के बाद उन्होंने 1 जून, 1949 को लिखा, ”ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे सत्य, सीधे और सपाट शब्द सरकार को स्पर्श नहीं कर पा रहे हैं, तो बेहतर यह होगा कि इस संवाद को यहीं विराम दिया जाये।” सरकार का रुख भी 11 जून, 1949 की आयंगर की चिट्ठी में उतना ही सख्त था। श्रीगुरुजी ने अपनी बातें दोहराते हुए वही बातें पंडित मौलिचन्द्र शर्मा को लिखीं और जेल में सरकार के द्वारा आयोजित कुछ मुलाकातों के बाद 11 जुलाई, 1949 को सरकार ने प्रतिबंध हटाने की घोषणा कर दी। ऐसा लगता है कि सरकार पूरे पत्राचार के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री के अहम् को सहला रही थी। अगर सरकार के पास वास्तव में संघ के बारे में ऐसे कोई प्रमाण थे कि यह संगठन देश के लिए खतरनाक है तो वार्ताकारों को जेल में बातचीत के लिए क्यों भेजा गया?

22 जुलाई, 1949 को एक पत्रकार के प्रश्न ‘संघ में पूर्व से क्या बदलाव हुए हैं’ के जवाब में तत्कालीन सरसंघचालक ने कहा कि ‘हमने अपने सिद्धांतों में से कुछ भी नहीं छोड़ा है। भारत सरकार हमारा लिखित संविधान चाहती थी और हमने वैसा कर दिया।’ लोग अगर चाहें तो इसे स्पष्टीकरण कह सकते हैं। संघ का लिखित रूप से कुछ ऐसा देना, जो पहले नहीं था, मनगढंत बातें हैं। दूसरा प्रतिबंध आपातकाल से शुरू हुआ और आपातकाल के खात्मे से ही समाप्त हो गया। तीसरा प्रतिबंध बाबरी ढांचे के विध्वंस के साथ लगा। यह 10 दिसंबर को सांप्रदायिक तनाव के तर्क के कारण लागू हुआ और जून 1993 में समाप्त हुआ जब दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पी. के. बाहरी की अध्यक्षता वाले ट्रिब्यूनल ने प्रतिबंध को अन्यायपूर्ण बताया था।

जो लोग यह कहते हैं कि अंग्रेजों ने संघ को प्रतिबंधित करने की ऐसी कोई कोशिश क्यों नहीं की? यह भी एक दुष्प्रचार का हिस्सा है। ब्रिटिश सरकार ने 1932 में मध्य प्रांत और बरार (आज के मध्य प्रदेश) में एक आदेश जारी करके सरकारी कर्मचारियों को संघ की सदस्यता लेने से प्रतिबंधित कर दिया था। लेकिन फिर भी 1939 तक संघ मध्य प्रांत में एक मजबूत संगठन बन चुका था। जून, 1939 में गृह विभाग ने मध्य प्रांत की सरकार को क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट की धारा 16 का उपयोग करते हुए संघ पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी, लेकिन प्रांतीय सरकार ने बड़े विरोध के डर से ऐसा करने से इनकार कर दिया था।

संघ पर प्रतिबंध के अलावा, इंदिरा गांधी सरकार ने 30 नवम्बर, 1966 को सरकारी कर्मचारियों को संघ की किसी भी गतिविधि में भाग लेने से प्रतिबंधित कर दिया। 25 जुलाई, 1970 को गृह मंत्रालय ने एक और आदेश जारी करके इसे और सख्त बना दिया, जिसमें इन गतिविधियों में लिप्त लोगों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात कही गई। 28 अक्तूबर, 1980 को गृह मंत्रालय ने अपने पूर्व के दो आदेशों को दोहराते हुए सरकारी कर्मचारियों के ‘पंथनिरपेक्ष दृष्टिकोण’ पर जोर दिया, जो 1976 के संविधान संशोधन के बाद भारत के संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा बन चुका था। लेकिन मोदी सरकार ने 9 जुलाई, 2024 को एक आदेश जारी करके 1966, 1970 और 1980 के आदेशों को निरस्त कर दिया। मोदी सरकार का यह आदेश न केवल संघ के खिलाफ पक्षपातपूर्ण निर्णयों को निरस्त करता है, बल्कि संघ की विकासपरक गतिविधियों को सम्मानित भी करता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ @100 : संघ और महिलाएं

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