केरल हाईकोर्ट ने मुनंबम वक्फ भूमि विवाद पर सुनवाई करते हुए राज्य वक्फ बोर्ड को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि अगर बिना सही प्रक्रिया के किसी संपत्ति को वक्फ घोषित करने की इजाजत दी गई, तो कल को कोई ताजमहल, लालकिला, विधानसभा भवन या यहां तक कि खुद हाईकोर्ट की इमारत को भी वक्फ संपत्ति बता सकता है। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधीकारी और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने कहा कि मनमाने तरीके से संपत्तियों को वक्फ घोषित करना संविधान के अनुच्छेद 300A (संपत्ति के अधिकार), अनुच्छेद 19 (व्यवसाय की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और आजीविका का अधिकार) का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि कोई भी न्यायालय ऐसी “काल्पनिक और अनुचित शक्ति” को मंजूरी नहीं दे सकता।
मामला मुनंबम की उस जमीन से जुड़ा है जिसे 1950 में सिद्दीक सैद नामक व्यक्ति ने फारूक कॉलेज को दान में दी थी। उस समय यह जमीन करीब 404 एकड़ थी लेकिन समुद्री कटाव के कारण अब यह लगभग 135 एकड़ रह गई है। कॉलेज ने इस जमीन पर बसे लोगों को बाद में प्लॉट बेच दिए थे और सभी दस्तावेज़ों में इसे सामान्य दान की संपत्ति बताया गया था, वक्फ नहीं। हालांकि, लगभग 69 साल बाद, 2019 में केरल वक्फ बोर्ड ने अचानक इस जमीन को वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया और पुराने सौदों को अवैध बता दिया। इससे करीब 600 परिवार प्रभावित हुए, जिन्होंने इसका विरोध किया।
राज्य सरकार ने नवंबर 2024 में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सी.एन. रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में एक जांच आयोग बनाया था, जिसे वक्फ संरक्षण समिति ने अदालत में चुनौती दी। मार्च 2025 में एकल पीठ ने आयोग को रद्द कर दिया, जिसके बाद सरकार ने डिवीजन बेंच में अपील की। डिवीजन बेंच ने कहा कि यह भूमि “दानपत्र” के तहत दी गई थी, न कि “वक्फ डीड” के तहत। वक्फ बोर्ड ने केवल दस्तावेज के शीर्षक में “वक्फ” शब्द देखकर इसे वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया, जबकि कानूनी शर्तें पूरी नहीं थीं। अदालत ने इसे “दुर्भावनापूर्ण और स्वार्थपूर्ण” कार्रवाई बताया और कहा कि बोर्ड ने यह कदम भूमि की बढ़ी हुई कीमत को देखकर उठाया है। अंत में अदालत ने स्पष्ट किया कि वक्फ घोषित करने की प्रक्रिया नागरिकों के अधिकारों को सीधे प्रभावित करती है, इसलिए अदालत इसकी वैधता की जांच करने के लिए पूरी तरह सक्षम है।

















