भारत का इतिहास संघर्ष का है, पराजय का नहीं : डॉ. मोहन भागवत जी
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भारत का इतिहास संघर्ष का है, पराजय का नहीं : डॉ. मोहन भागवत जी

नागपुर में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि भारत का इतिहास संघर्ष और वीरता का है। शिवाजी महाराज ने विदेशी आक्रांताओं को निर्णायक उत्तर दिया।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Oct 10, 2025, 11:19 pm IST
in भारत, संघ @100, महाराष्ट्र

नागपुर । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि भारत इतिहास पराजय का नहीं बल्कि संघर्ष का है। भारत पर प्राचीन काल से निरंतर आक्रमण होते रहे हैं, लेकिन कोई भी विदेशी आक्रांता एक रात भी चैन की नींद नहीं सो सका क्योंकि भारतीयों ने हर आक्रमण का डटकर मुकाबला किया और उन्हें करारा जवाब दिया।

भोसले राजघराने पर आधारित पुस्तकों का लोकार्पण

सरसंघचालक जी शुक्रवार को नागपुर में भोसले राजघराने पर आधारित चार पुस्तकों के लोकार्पण समारोह में बोल रहे थे।

भारत में शौर्य की कभी कमी नहीं रही

नागपुर के सीनियर भोसला पैलेस में आयोजित इस कार्यक्रम में सरसंघचालक जी ने कहा कि भारत में कभी भी शौर्य की कमी नहीं रही। इसके बावजूद देश पर बार-बार विदेशी आक्रमण होते रहे। छत्रपति शिवाजी महाराज ऐसे आक्रांताओं के लिए एक निर्णायक उत्तर सिद्ध हुए। शिवाजी महाराज ने अपने साथ मित्रों को जोड़कर ईश्वर, देश और धर्म की रक्षा के लिए विदेशी सत्ता से संघर्ष किया।

लोगों को जोड़ने की भावना से मिली विजय

उन्होंने आगे कहा कि परिस्थिति कैसी भी हो, जब तक लोगों को जोड़ने की भावना और उसके पीछे की प्रेरणा बनी रही, तब तक हमारा इतिहास विजय से ही भरा रहा है। यह संघर्ष केवल छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके द्वारा स्थापित मराठा साम्राज्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अनेक अन्य राजाओं ने भी उनसे प्रेरणा लेकर संघर्ष को गति और बल दिया।

राजस्थान और पूर्वोत्तर भारत के शूरवीरों का योगदान

राजस्थान में दुर्गा प्रसाद राठौड़ ने राजपूतों को एकत्र कर मुगलों से संघर्ष किया, जिसके बाद मुगलों की राजपुताना में फिर कभी वापसी नहीं हो सकी। इसी तरह कूचबिहार के राजा चक्रधर सिंह पर भी शिवाजी महाराज का गहरा प्रभाव था। चक्रधर सिंह ने एक अन्य राजा को पत्र लिखते हुए कहा था, “अब हम भी शिवाजी महाराज की भांति विदेशी आक्रमणकारियों को बंगाल की खाड़ी में डुबोकर नष्ट कर सकते हैं।”

राष्ट्रहित के लिए स्वार्थ का त्याग आवश्यक

सरसंघचालक जी ने कहा कि राष्ट्रहित के लिए स्वार्थ का त्याग कर देश की सेवा के लिए तैयार रहना आवश्यक है। उन्होंने कान्होजी आंग्रे का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने अपने वतन का त्याग कर अपने चार पुत्रों के साथ शिवाजी महाराज का साथ दिया। इसके पीछे “राज्य की स्थापना ईश्वर की इच्छा है” यह प्रेरणा थी। यही भावना नागपुर के भोसले राजघराने में भी जीवित रही। अप्पासाहेब भोसले ने काबुल और कंधार तक संधियाँ स्थापित कर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया, जो इस प्रेरणा का परिचायक है।

भोसले राजघराने का इतिहास जनसामान्य तक पहुँचाना आवश्यक

सरसंघचालक जी ने यह भी कहा कि नागपुर के भोसले राजघराने का यह इतिहास जनसामान्य तक पहुँचाना और अगली पीढ़ियों तक हस्तांतरित करना अत्यंत आवश्यक है।

कार्यक्रम का समापन पसायदान के साथ

इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्यातिथि जितेंद्रनाथ महाराज और पुस्तकों के लेखकों ने भी समयानुकूल उद्बोधन दिया। कार्यक्रम का समापन पसायदान के साथ हुआ।

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