राष्ट्रीय स्वयं सेवक के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने मौजूदा वक्त में दुनियाभर में तेजी से बदल रहे भू राजनीतिक समीकरणों पर बात करते हुए कहा कि दुनिया में इन दिनों जो पद्धति प्रचलित पद्धति है, उसके दुष्परिणाम हमारे यहां भी देखने को मिलते हैं। हाल के दिनों में हिमालय क्षेत्र में प्रकृति के प्रकोपों को देखा गया है। वर्षा अनियमित हुई है। प्राकृतिक आपदाएं बढ़ी हैं। अप्रत्याशित तरीके से बारिश होती है, भूस्खलन होता है और हिमनदियां भी सूख रही हैं। हिमालय हमारे लिए सुरक्षा की दीवार है।
हिमालय की आज की अवस्था एक खतरे की घंटी बजा रही है। प्राकृतिक उथल-पुथल के साथ ही जनजीवन में भी उथल-पुथल मची हुई है। पहले श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में भी हमने इसका अनुभव किया है। कभी-कभी हो जाता है कि प्रशासन जनता के पास नहीं रहता, संवेदनशील या लोकाभिमुख नहीं रहता, जनता को ध्यान में रखकर नीतियां नहीं बनती तो असंतोष पैदा होता है, लेकिन इस असंतोष का इस तरीके से व्यक्त होना किसी के भी लाभ की बात नहीं है।
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हिंसक क्रांतियों से परिवर्तन नहीं होता
सरसंघचालक जी ने कहा कि इस तरह के मामलों को डॉ बाबा साहब अंबेडकर ने ग्रामर ऑफ एनार्की कहा है। उनका कहना था कि प्रजातांत्रिक तरीकों से भी परिवर्तन आता है। हिंसा से ही बस परिवर्तन नहीं होता। पूरी दुनिया का इतिहास देखिए तो जब से ये तथाकथित उथल-पुथल वाली क्रांतियां आईं, किसी भी क्रांति ने अपने उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं की। फ्रांस की क्रांति का उल्लेख करते हुए सरसंघचालक जी कहते हैं कि वहां राजा के खिलाफ क्रांति हुई और नेपोलियन बादशाह बन बैठा। लेकिन राजतंत्र वही कायम रहा।
साम्यवादी भी पूंजीवादी तंत्र पर चल रहे
इसके अलावा कई देशों में तथाकथित साम्यवादी क्रांतियां भी हुई थीं, लेकिन उनका इतिहास देखो तो पता चलता है कि वही साम्यवादी देश आज पूंजीवादी तंत्र का पालन कर रहे हैं, जिसके खिलाफ क्रांति हुई थी। ऐसे हिंसक परिवर्तनों से कुछ नहीं होता है। उल्टा इस अराजकता स्थिति से विदेशी ताकतों को देश के अंदर खेल खेलने का मौका मिलता है। हमारे पड़ोसी देशों में जो उथल-पुथल हो रही है, ये हमारे लिए भी चिंता का विषय है। इन देशों के साथ हमारा आत्मीयता का संबंध है। इसलिए चिंता होती है।
















