राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना के अवसर और विजयदशमी पर नागपुर स्थित रेशमबाग मैदान में संघ के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए विश्व के तेजी से बदलते समीकरणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डॉ. भागवत ने कहा कि केवल भारत की एकीकृत दृष्टि ही विश्व की समस्याओं का शाश्वत समाधान प्रदान कर सकती है। उन्होंने कहा कि राज्य बदलते रहते हैं, लेकिन राष्ट्र सदैव बना रहता है। हमें अपनी एकता के आधार को कभी नहीं भूलना चाहिए। वैश्विक परिस्थितियों का हवाला देते हुए डॉ. भागवत ने आत्मनिर्भरता को समय की आवश्यकता बताया।
मजबूरी नहीं अपनी पसंद के आधार पर बनना होगा आत्मनिर्भर
उन्होंने कहा कि दुनिया परस्पर निर्भरता पर चलती है, लेकिन हमें मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी पसंद के अनुसार आत्मनिर्भर बनना होगा। इसके लिए स्वदेशी और स्वावलंबन ही एकमात्र मार्ग है। उन्होंने समाज में संघ कार्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और सहभागिता की सराहना की। उन्होंने बताया कि नई पीढ़ी में देशभक्ति और संस्कृति के प्रति आस्था निरंतर बढ़ रही है। सामाजिक संस्थाएं और अनेक व्यक्ति सेवा कार्य में आगे आ रहे हैं।
इसके साथ ही सरसंघचालक जी ने पहलगाम में हुए बर्बर आतंकी हमले का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौरान लोगों का धर्म पूछकर आतंकियों ने उनकी हत्या की थी। उसके बाद देशभर में प्रचंड दुख और क्रोध की लहर पैदा हुई। पूरी तैयारी करने के बाद हमारी सरकार औऱ सेना ने उसका पुरजोर उत्तर दिया। इन सारे प्रकरण के दौरान हमारे नेतृत्व की दृढ़ता, सेना के शौर्य और समाज की एकता का उत्तम चित्र प्रस्थापित हुआ। उस घटना ने एक चीज सिखाया है कि यद्यपि हम सभी के प्रति मित्र भाव रखते हैं और रखेंगे, लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए हमें और अधिक सजग रहना होगा और समर्थ बनना पड़ेगा। क्योंकि उस घटना (ऑपरेशन सिंदूर) के बाद दुनिया ने जिस प्रकार से स्टैंड लिया उससे हमें पता चला कि हमारे मित्र कौन हैं और कहां हैं।
अमेरिकी टैरिफ का भी जिक्र
संघ प्रमुख ने अमेरिकी टैरिफ का जिक्र करते हुए कहा कि इसकी मार सभी पर पड़ी है और उससे वो भी प्रभावित हुए हैं और हम भी। सरसंघचालक जी ने बड़ी बात कही कि विश्व का जीवन परस्पर निर्भरता से ही चलता है। राष्ट्रों में आपस में परस्पर संबंध रखने पड़ते हैं, क्योंकि अकेला राष्ट्र अलगाव में रहकर जी नहीं सकता है। लेकिन निर्भरता मजबूरी में न बदल जाए, इसके लिए हमें स्वदेशी और स्वाबलंबन को अपनाना होगा। इसका कोई पर्याय नहीं है। हमें आत्मनिर्भरत होकर स्वाबलंबी जीवन जीना पड़ेगा। स्वदेशी का इस्तेमाल करना होगा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का भी जतन करना पड़ेगा। लेकिन उसमें मजबूरी की जगह हमारी अपनी इच्छा होगी।
















