तृतीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस का पूरा नाम मधुकर दत्तात्रेय देवरस। मार्गशीर्ष शुक्ल 5, सन् 1915 के दिन उनका जन्म हुआ। उनकी सम्पूर्ण शिक्षा नागपुर में ही हुई। नागपुर के न्यू इंग्लिश हाईस्कूल से उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और वहीं के मारिस कॉलेज (वर्तमान नाम नागपुर महाविद्यालय से बी.ए हुए और पश्चात् एल.एल.बी. की भी परीक्षा उत्तीर्थ की। किन्तु उन्हें वकालत नहीं करनी थी। पूरा समय संघ कार्य करना था। डॉक्टर हेडगेवार जी ने उन्हें प्रथम बंगाल प्रांत में कार्य करने भेजा: किन्तु शीघ्र ही उन्हें नागपुर बुला कर नागपुर के कार्य का दायित्व सौपा।
नागपुर नगर कार्यवाह, सह सरकार्यवाह, सन् 1965 में सरकार्यवाह और सन् 1973 में श्री गुरुजी के देहावसान के पश्चात् सरसंघचालक, ऐसा उनका संघ रचना में प्रवास है। जब वे सरसंघचालक हुए, उस समय उनकी आयु 38 वर्ष की थी। उन्हें मधुमेह की बीमारी थी, लेकिन बीमारी की चिन्ता न करते हुए डॉक्टर हेडगेवार जी द्वारा स्थापित और गुरुजी द्वारा विस्तार प्राप्त संघ को उन्होंने और अधिक बढ़ाया। सेवा कार्य का एक नवीन आयाम संघ स्वरूप को प्राप्त हुआ। आज स्वयंसेवकों द्वारा चलाए जा रहे सेवा कार्य एक लाख 50 हजार से भी अधिक हैं। सेवा भारती नाम से वे चलाए जाते हैं। बाल संस्कार केन्द्र, बस्तीगृह, ग्रामीण विद्यालय औषधि केन्द्र, अनाथालय, कुष्ठ निवारण गृह जैसे विविध कार्य ;सेवा भारती द्वारा परिचालित हैं। विश्व हिन्दू परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम आदि संस्थाओं के भी इसी तरह के सेवा कार्य हैं; किन्तु ये कार्य अलग से हैं।
सन् 1975 में उस समय की प्रधानमंत्री इन्दिरा गान्धी ने देश में आपातकाल लगाया और संघ पर प्रतिबन्ध भी लगाया। उनको राजनीति तथा शासन का विरोध करने वाले राजनैतिक दलों
पर उन्होंने पाबन्दी नहीं लगाई; किन्तु संघ को नष्ट करने की महत्वाकांक्षा से उन्होंने संघ पर पाबन्दी लगाई। संघ विरोध में खूब प्रचार किया। हजारों कार्यकर्ताओं को मीसा नाम के काले कानून
के अन्तर्गत कारागारों में डाल दिया। उन्होंने सब लोगों का स्वातंत्र्य नष्ट किया। उस समय जनतंत्र की पुन: प्रतिष्ठा के लिए जो आंदोलन हुआ, उसमें संघ ने भी भाग लिया तथा वह आंदोलन सफल कर दिखाया। यह महान कार्य श्री बालासाहब के सरसंघचालक रहते हुए सम्पन्न हुआ। सन् 1992 से बालासाहब का स्वास्थ्य बिगड़ता गया। प्रवास करना उनके लिए असम्भव हो गया।
बोलने में भी कठिनाई होने लगी। तब उन्होंने स्वयं निवृत्त होने का निर्णय लिया और सन् 1994 में श्री राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) को अपना उत्तराधिकारी अर्थात् सरसंघचालक के रूप में नियुक्त किया। 17 जून, 1996 के दिन पुणे में उनका निधन हुआ।

















