पर्यटन और तीर्थाटन में बड़ा अंतर होता है। तीर्थाटन भारत की आत्मा का साक्षात्कार और स्वीकार करने का साधन है। ‘तीर्यते अनेन इति तीर्थ:’ अर्थात् जो भवसागर (84 लाख योनियों) से पार कराने में सहायक हो, वही तीर्थ है। भारतीय मनीषा ने संसार को दुःखालय कहा है और भगवद्गीता (अभयं सत्त्वसंशुद्धि:) के अनुसार जब मृत्यु का भय मिट जाए, तब जीवन सार्थक माना जाता है।
हमारे चार वेद, छह वेदांग, अठारह पुराण, स्मृतियां, षड्-दर्शन, महाभारत, गीता, उपनिषद, वेदांत-सारे शास्त्र, आर्ष ग्रंथ और ज्ञान-भक्ति-वैराग्य देने वाली गुरु-परंपरा, भजन, सत्संग, संकीर्तन आदि विधाओं का उद्देश्य है-चित्त-शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति। इसीलिए भारत में सनातन काल से तीर्थाटन की दीर्घ और अक्षुण्ण परंपरा रही है, जो सृष्टि के चलने तक बनी रहेगी। तीर्थों का असम्मान अमानुषीय दृष्टिकोण है। तीर्थ वह है जहां जाने से जीवन में उच्चतर चेतना और सद्बुद्धि का उदय हो। शास्त्रों के अनुसार-
अन्य क्षेत्रे कृतं पापं, तीर्थ क्षेत्रे विनश्यति।
तीर्थ क्षेत्रे कृतं पापं, वज्र लेपो भविष्यति।।
अर्थात् किसी अन्य स्थान पर किया गया पाप तीर्थ स्थान पर समाप्त हो जाता है, लेकिन तीर्थ स्थान पर किया गया पाप ‘वज्रलेप’ यानी वज्र की तरह चिपक जाता है, जिसे मिटाना अत्यंत कठिन है। अत: तीर्थ में सदाचरण, मर्यादित दिनचर्या, श्रद्धा, नियम, निष्ठा और भक्ति अत्यंत आवश्यक है।

तीर्थाटन का उद्देश्य
तीर्थाटन का एकमात्र उद्देश्य है-नरक से मुक्ति पाना और स्वर्ग की प्राप्ति करना। तीर्थ यात्रा से पापों से मुक्ति मिलती है और चित्त की शुद्धि है। ज्ञानी व्यक्ति को सालोक्य, समीपता, सारूप्यता और अंततः मोक्ष की इच्छा होती है। ब्रह्मा से परे मुक्तात्मा ही कैवल्य के अधिकारी होते हैं। तीर्थाटन करने वाला व्यक्ति स्वर्ण, गाय या भूमि का दान कभी स्वीकार नहीं करता। तीर्थाटन भारत की सांस्कृतिक विरासत को संजोने वाली एक विशाल धरोहर है।
यह धार्मिक बन्धुत्व के साथ सामाजिक समरसता और ममतामयी दृष्टिकोण भी प्रदान करता है। तीर्थ पर एक ही घाट पर जाति-पांति का भेद मिट जाता है। सत्कर्मशील पुरुष का प्राणान्त सूर्य के उत्तरायण में होता है, जहां उसकी जीवनयात्रा ऊर्ध्वगति को प्राप्त करती है। इसके विपरीत, दुष्कर्म में संलग्न जीव सूर्य के दक्षिणायन में देहत्याग कर अधोगति का भागी होता है। प्रारब्ध के प्रभाव से कुछ अपवाद अवश्य देखे जा सकते हैं, परंतु यह सत्य अपरिवर्तनीय है कि व्यभिचार, पापाचार और दुराचार के निर्मूल की वास्तविक प्रवेशिका तीर्थाटन ही है। तीर्थ ही वह पवित्र मार्ग हैं, जहां आत्मा अपने कलुषों का परित्याग कर शुद्धि और उत्थान की ओर अग्रसर होती है।
नि:संदेह, भारत की आत्मा तीर्थों में निवास करती है। तीर्थों के संवर्धन से ही भारत की आध्यात्मिक चेतना का विकास संभव है। तीर्थायन और तीर्थाटन का ही ऐसा अद्भुत आंचल है, जिसकी छांव में सनातन धर्म पीढ़ियों से सुरक्षित पलता-बढ़ता आया है। तीर्थाटन में मानवता को चिरस्थायी शांति का अनुभव मिलता है। यह धार्मिक पथ का प्रवेश द्वार है, जहां सभी दुष्कर्म, पापाचार और असद्गुणों की निवृत्ति होती है। सदाचरण, मर्यादित दिनचर्या, नियम, निष्ठा और श्रद्धा की भावभूमि में ही मुमुक्षु का बीज समाहित होता है। यह बीज कालबाह्य चेतना से जुड़कर आगत-अनागत के बीच कोलाहल से पीड़ित मानवता को शाश्वत शांति प्रदान करता है। तीर्थाटन की यह परंपरा आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग है, जो मुमुक्षु को जीवन के उच्चतम सत्य की ओर ले जाती है। इस प्रकार, तीर्थ यात्रा केवल सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि मानवता के आध्यात्मिक कल्याण और चिरकाल शांति का सशक्त साधन है।

देवों-संतों ने बढ़ाई महत्ता
सतयुग में भगवान दक्षिणामूर्ति, त्रेता युग में गुरु दत्तात्रेय, नारद और वशिष्ठ, द्वापर युग में कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी और कलियुग में भगवान आदिशंकराचार्य, रामानुजाचार्य, रामानन्दाचार्य, वल्लभाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य, माउली ज्ञानेश्वर, गोस्वामी तुलसीदास प्रभृति ब्रह्मज्ञानी संतों ने तीर्थाटन की गरिमा एवं महत्ता को अत्यंत बढ़ाया है। इसी प्रकार, करुणावतार शिव-पार्वती, लोकात्मा श्रीराम और योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी सपरिवार तीर्थाटन किया है।
संस्कृत में कहा गया है, ‘महाजनो येन गता स पंथ:’ अर्थात् सिद्ध पुरुषों द्वारा अपनाया गया मार्ग सनातन का सुमेरु है और वह तीर्थाटन ही है। महान संन्यासी स्वामी हरिदास ने श्री बांकेबिहारी जी की आराधना की, वहीं महाप्रभु श्री हितहरिवंश जी ने श्री राधाबल्लभ लालजी को अपनी तपस्या एवं साधना द्वारा प्रकट किया, जिससे आज तीर्थाटन का मार्ग विस्तृत और प्रशस्त हुआ है। इस प्रकार, तीर्थाटन न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह आध्यात्मिक अनुशासन, गुरु-परंपरा और सनातन धर्म की जीवंत धरोहर है, जिसे सदियों से महान महापुरुषों ने प्रतिष्ठित किया है।
भगवान शिव ने अपने मस्तक पर स्थित चंद्रमा की कांति को संकुचित कर अमरावती नदी प्रवाहित की। इस नदी की कुछ बूंदें उनके शरीर पर भी पड़ीं, जिससे उनकी श्वेत कर्पूर काया द्रव में बदल गई और हिमलिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। यही हिमलिंग आज अमरनाथ यात्रा का प्रतीक है, जिसे अमरेश्वर भी कहा जाता है। लिंगपुराण में 68 शैव तीर्थों का वर्णन है, जिनमें अमरनाथ यात्रा का विशेष उल्लेख है। कश्मीर के अनंतनाग, श्रीनगर, पहलगाम, भृगुक्षेत्र, चंदनवाड़ी, शेषनाग, मार्तंड सूर्य मंदिर आदि स्थान प्राचीन तीर्थाटन के प्रमुख केंद्र रहे हैं।
धरती पर ब्रह्म द्रव रूप में पाप, ताप और संताप दूर करने वाली मां गंगा तीर्थाटन की जननी मानी जाती हैं। गंगा तटों पर ज्ञान के अंकुर फूटते हैं। गंगोत्री से गंगासागर तक की तीर्थयात्रा भारत की एकता का प्रमाण है। यमुना भी अपने तीर्थाटन को महत्व देती हैं, जो हर साल यम द्वितीया पर्व पर विशेष रूप से मनाया जाता है। सनातन भारत की सनातन संस्कृति को तीर्थाटन की शंखध्वनि से वंशी की मधुर तान तक की आवाजें जीवंत रखती हैं। भारत में 51 शक्तिपीठ हैं, जिनमें से लगभग 10 नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका और तिब्बत में स्थित हैं। आस्तिक समाज तीर्थाटन को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में मानता है। 12 ज्योतिर्लिंग की यात्रा भी तीर्थाटन का ही महत्वपूर्ण अंग है। इस प्रकार, तीर्थाटन सनातन धर्म की आत्मा है जो भारत की संस्कृति, एकता और आध्यात्मिकता को जीवंत बनाए रखता है।

तीर्थाटन की समृद्ध परंपरा
भारतीय तीर्थाटन की समृद्ध परंपरा में प्रमुख स्थान वाले चार धाम हैं- बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी और रामेश्वरम। बद्रीनाथ भगवान विष्णु का धाम है, जो सतयुग का प्रतिनिधित्व करता है। द्वारका, जहां भगवान कृष्ण ने निवास किया, द्वापर युग को दर्शाता है। पुरी में भगवान जगन्नाथ की उपासना होती है, जो कलियुग का धाम है और रामेश्वरम भगवान शिव का तीर्थ है, जो त्रेतायुग से जुड़ा है। इसी प्रकार, चार प्रमुख पीठ हैं-गोवर्धन मठ, शारदा मठ, ज्योतिर्मठ और शृंगेरी मठ- जिन्हें आदि शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों में स्थापित किया था। गोवर्धन मठ पूर्वी भाग में, ओडिशा के पुरी नगर में स्थित है।
इसे ऋ ग्वेद से जुड़ा माना जाता है। इस मठ के संन्यासी नाम के बाद ‘आरण्य’ लगाते हैं। इसका मुख्य सिद्धांत ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ है। शारदा मठ पश्चिम भारत के द्वारका धाम में है, जो सामवेद का प्रतिनिधत्व करता है। यहां के संन्यासियों के नाम के बाद ‘तीर्थ’ या ‘आश्रम’ विशेषण लगा होता है। इसका मूल मंत्र है-‘तत्त्वमसि’।
ज्योतिर्मठ उत्तर में बद्रीनाथ में स्थित है और अथर्ववेद से संबंधित है। यहां के संन्यासी नाम के बाद ‘गिरि’, ‘पर्वत’ या ‘सागर’ लगाते हैं। इसका महावाक्य ‘अयमात्मा ब्रह्म’ है। शृंगेरी मठ, जो दक्षिण भारत में कर्नाटक के चिकमंगलूर में स्थित है, यजुर्वेद का प्रतिनिधित्व करता है। यहां के संन्यासियों के नाम के बाद ‘सरस्वती’, ‘भारती’, ‘पुरी’ लगाने की परंपरा है। इसका ध्येय वाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ है। ये मठ सनातन धर्म की शिक्षा और संस्कृति के केंद्र हैं। ये मठ भारत के धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जीवन के स्तंभ हैं, जो विभिन्न वेदों और संप्रदायों का प्रचार-प्रसार करते हैं।
प्रयागराज का तीर्थाटन तो पूरे विश्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रयाग 5 माने गए हैं- विष्णु प्रयाग, नंद प्रयाग, कर्ण प्रयाग, रुद्र प्रयाग और देव प्रयाग। प्रयागराज को तीर्थराज कहा जाता है, क्योंकि यहां किए गए धर्म-कर्म सदैव अक्षय फल देते हैं। यह तीर्थ मानवता के लिए शांति, पूजा और ज्ञान का अटल स्रोत है। इन सभी स्थानों पर आस्था और श्रद्धा के साथ स्नान करने और पूजा-अर्चना करने से मनुष्य को पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्त होता है। प्रयागराज में तीन पवित्र नदियां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती मिलती हैं और इनका संगम त्रिवेणी कहलाता है। यहां प्रत्येक 12 वर्ष में महाकुंभ का आयोजन होता है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं। यह तीर्थ स्थल न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का वैश्विक केंद्र भी है।
इसी प्रकार, आठ भैरव हैं- असितांग, रुद्र, चंद्र, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार। इन सभी रूपों की उपासना और दर्शन करने से मन के दूर हो जाते हैं। ये सभी रूप भगवान शिव के विभिन्न प्रचंड और उग्र स्वरूप हैं, जो भक्तों की रक्षा करते हैं और नकारात्मकता का संहार करते हैं। प्रभास, शूकरक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, हरिक्षेत्र, भृगु क्षेत्र, पुरुषोत्तम क्षेत्र और नैमिष क्षेत्र-ये सभी क्षेत्र तीर्थाटन के मेरुदंड हैं, जो धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत महान है। इन स्थानों पर तीर्थ यात्रा करने से मनुष्य के जीवन में शांति, पुण्य और आध्यात्मिक उन्नति होती है। यही नहीं, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम, उज्जैन, द्वारका जैसे सात प्रमुख पवित्र पुरियां हैं, जिनका तीर्थाटन करना बहुत सौभाग्य माना जाता है। ये सारे स्थान भारतीय संस्कृति और धर्म के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। यहां तीर्थाटन करने से मनुष्य को आध्यात्मिक लाभ, शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
उन्नति और शांति का मार्ग
इस प्रकार तीर्थाटन हमारे धर्म, संस्कृति, इतिहास और आध्यात्म की जड़ें हैं, जो मानव जीवन को उन्नति और शांति की ओर ले जाती हैं। चौसठ योगिनी की यात्रा हो या सात द्वीपों- जंबू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रोंच, शाक, पुष्कर की यात्रा हो या नौ खंडों- इलावृत्त, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरि, केतु-माल, कुरु, हिरण्य-मय या चौदह भुवनों की मानसिक धर्मयात्रा हो; ये सभी यात्राएं जीव को जगदीश से जोड़ती हैं। पांडवों ने भी तीर्थाटन करके धर्म की स्थापना की। चैतन्य महाप्रभु ने नवदीप से वर्तमान वृंदावन व्रज मंडल को तीर्थाटन द्वारा जीवंत किया। सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों ने अयोध्या और काशी को तीर्थाटन के माध्यम से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप दिया। भर्तृहरि महाराज की समाधि भी तीर्थाटन की देन है। हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने ‘जगदम्ब’ और ‘हर हर महादेव’ की जयकार तीर्थाटन से उत्पन्न की, जिसने भारतीय संस्कृति को नई ऊर्जा दी।
पूर्व में राजा अपनी प्रजा के साथ तीर्थाटन करते थे। तीर्थों के पुरोहितों के पास उनके लेखा-जोखा आज भी सुरक्षित हैं। महाराणा प्रताप ने तुला दान किया था और सिखों के छठे गुरु हरगोविंद ने कांस्य पर लिखित स्वलेख तुलसीदास के जन्मभूमि शूकरक्षेत्र सोरों में पुरोहितों को दिया था, जिसका दर्शन आज भी संभव है। जयपुर, जोधपुर, अलवर, बीकानेर, ग्वालियर, कालिंजर, ओरछा, गुजरात के राजा और महाराजा तीर्थाटन के शिलालेख उत्कीर्ण करते थे, जिन्हें पुरातत्व के छात्र पढ़ते हैं। नेपाल के नरेश ने काशी, ऋ षिकेश और शूकरक्षेत्र में अष्टधातु की बजनी घंटी स्थापित की, जो अभी भी अपनी आवाज़ से गूंजती है।
इनके कारण ही राणा जंगबहादुर को पुत्र प्राप्त हुआ था। तीर्थाटन मनोकामना पूरी करने का आधार है। इस प्रकार तीर्थाटन न केवल धार्मिक आस्था है बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। नर्मदा की धर्मयात्रा का आयोजन चतुर्थ सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया ने प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी के साथ किया था। नर्मदा नदी भगवान शिव की मानस पुत्री मानी जाती है, जो ब्रह्मचारिणी हैं।
मकर संक्रांति के दिन गंगासागर संगम त्रिवेणी के पवित्र जल में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। त्रिपुरा की त्रिपुरेश्वरी की यात्रा, प्रयागराज में माघ मास तक का कल्पवास, अरुणाचल का परशुराम कुंड, शुक्रताल का वटवृक्ष जहां शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को भागवत कथा सुनाई और नैमिषारण्य का चक्र कुंड ऐसे पवित्र स्थल हैं, जहां हर कोई जाना चाहता है। श्रावण महीने में करीब 50 करोड़ कांवड़ियों की यात्रा होती है, जो आस्था की शक्ति का प्रमाण है। आलंदी से पंढरपुर तक करोड़ों वारकरी दिंडियां चलती हैं, वर्षा ऋ तु में कामाख्या का महोत्सव मनाया जाता है।
रामेश्वरम में उत्तर भारत के बद्रीनाथ में दक्ष का पुजारी है। कश्मीर का मार्तंड, कोणार्क का सूर्य मंदिर, भारत के पहले गांव माणा में पांडवों के स्वर्गारोहण का स्थल, गुजरात के गिरिनार की दस हजार सीढ़ियां, अन्नामलाई की यात्रा, स्वामी अय्यप्पा की यात्रा, तिरुपति की यात्रा तीर्थाटन के महत्व को दर्शाती है। अयोध्या, काशी, ब्रजमंडल, जनकपुर, सीतामढ़ी, शूकरक्षेत्र की चौरासी कोस की यात्रा, गिरिराज जी की दंडौती परिक्रमा आदि को भी भक्तिमाल में अनेक भक्तों द्वारा सर्वोपरि माना गया है। तीर्थाटन भारत की मङ्गल जिजीविषा है, जो जन-मन में आस्था एवं समर्पण की भावना को जगाती है।
हिंदुओं के लिए कैलास मानसरोवर की यात्रा भी बहुत खास है। यह यात्रा जीवन की सबसे बड़ी सौभाग्यवान घड़ियों में से एक मानी जाती है। गया में पितरों को पिंडदान, मेहंदीपुर बालाजी में हनुमानजी के दर्शन, काशी के महाश्मशान में काया का अग्नि संस्कार, महाकाल के महालोक में निर्भय महसूस करना, देवभूमि की यात्रा और देवतात्मा हिमालय की यात्रा करना- इन सबका मूल तत्व मुमुक्षु की आध्यात्मिक भूख है। इसमें संदेह नहीं है कि तीर्थाटन आध्यात्मिक उन्नति और शांति का मार्ग है।
तीर्थ क्षेत्र
4 पीठ
बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम
4 पीठ
गोवर्धन मठ, शारदा मठ, ज्योतिर्मठ, शृंगेरी मठ
5 प्रयाग
विष्णु प्रयाग, नंद प्रयाग, कर्ण प्रयाग, रुद्र प्रयाग, देव प्रयाग
8 भैरव
असितंग, रुद्र, चंद्र, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण, संहार
7 क्षेत्र
प्रभास क्षेत्र, शूकर क्षेत्र, कुरुक्षेत्र, हरि क्षेत्र, भृगु क्षेत्र, पुरुषोत्तम क्षेत्र एवं नैमिष क्षेत्र
7 पुरियां
अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम, उज्जैन, द्वारका















