लता मंगेशकर: अविनाशी स्वर की गाथा
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लता मंगेशकर: अविनाशी स्वर की गाथा

लता मंगेशकर के जन्मदिवस पर विशेष: उनकी अविनाशी आवाज़ ने संगीत, भाषा और भावों का विराट संसार रचा। भक्ति से श्रृंगार तक, हर स्वर आत्मा की थाती। पढ़ें उनकी साधना, स्मृतियां और अमर चमत्कार।

Written byडॉ विश्वास चौहानडॉ विश्वास चौहान — edited by कुलदीप सिंह
Sep 28, 2025, 11:45 am IST
inभारत
भारत रत्न लता मंगेशकर (फाइल फोटो)

भारत रत्न लता मंगेशकर (फाइल फोटो)

होस्टल के समय से सिलसिला है ,जब रात की नीरवता में स्वाध्याय करता हूँ तो पार्श्व में लता जी के गीत न चलें, ऐसा सम्भव नहीं है, कल रात्रि में लता जी को सुनते हुए ही लता जी पर लिखा है। आज लता मंगेशकर जी का जन्मदिवस है।

ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब लता मंगेशकर की आवाज़ सुनाई न दे। चाहे हम जान-बूझकर सुनें या अनचाहे कहीं से कोई गीत कानों में उतर आए, उनका स्वर जीवन की पृष्ठभूमि-ध्वनि बन चुका है। जैसे सुबह की प्रार्थना या संध्या वंदन, वैसे ही उन्हें याद करना एक व्रत-उपवास निभाने जैसा है।

अविनाशी स्वर की सृष्टि

92 वर्ष की उनकी गरिमामय उपस्थिति ने संगीत, भाषा और भावों का ऐसा संसार रचा, जो तीन-चार पीढ़ियों को ही नहीं, आने वाली असंख्य पीढ़ियों को गौरवान्वित करता रहेगा। यह कोई आँकड़ों में मापा जाने वाला योगदान नहीं है; यह तो आत्मा की थाती है। लता का स्वर मानो प्रकृति का अवयव हो ,जैसे हवा, जैसे नदी, जैसे सूर्योदय। बड़े गुलाम अली खान ने उन्हें “अल्लाह की देन” कहा, तो उस्ताद अमीर खान ने माना कि “जो बड़ा गायक तीन घंटे में करता है, लता तीन मिनट में कर देती हैं।” विजय तेंदुलकर ने लिखा कि भले ही उनके गीत किसी की भूख न मिटाएँ, पर लोग उन्हें पागलों की तरह सुनते चले जाते हैं।

विविधता का विराट आकाश

उनकी आवाज़ ने गीता का अध्यात्म भी गाया और “बेकस पर करम कीजिए सरकार-ए-मदीना” में नात का सहारा भी दिया। गुरु नानक की बानी में उजाला बिखेरा, संस्कृत श्लोकों से देवत्व का आवाहन किया और ग़ालिब की ख्वाहिशों की कसक भी गाई। मराठी में नामदेव और तुकाराम के अभंग, हिंदी में मीरा की भक्ति, बंगाली में रवीन्द्र संगीत, गुजराती में वैष्णव परंपरा, तमिल और मलयालम में भक्ति और श्रृंगार , हर भाषा उनकी अपनी भाषा लगती है। “घनश्याम सुंदरा श्रीधरा” की मासूमियत, “रुणु-झुणु रे भ्रमरा” की निष्काम भक्ति, “ओ रे मोनो पाखी” की रबीन्द्रिक पवित्रता, “जिया जले” का मादकपन , सब कुछ उनकी कंठध्वनि से सहज होकर निकलता है।

गंगा के किनारे गाया “हे गंगा मईया” हो या ब्रह्मपुत्र की घाटी से झरता “जोना कोरे राति”, उड़ीसा के सागर में गूंजता “माई अथाय जलोधि गंभीर” हो या कश्मीर-हिमालय के लोकगीत , लता का स्वर भूगोल की सीमाओं से परे था।

इसे भी पढ़ें: तमिलनाडु के करूर में जोसेफ विजय की रैली में भगदड़: 39 की मौत, पीएम मोदी और राष्ट्रपति ने जताया शोक

स्वर के पीछे की साधना

प्रवीण झा का कहना सही है कि लता का यह मुकाम केवल दिव्यता से नहीं आया। यह उनकी विनम्रता, निरंतर सीखने की ललक और परंपरा को अक्षुण्ण रखने की साधना थी। उनकी गायकी कभी बेसुरी नहीं हुई , यह केवल प्रकृति प्रदत्त वरदान नहीं था, बल्कि असाधारण अनुशासन और जीवन-दर्शन का परिणाम था।

उनकी आवाज़ ने उपमहाद्वीप के जीवन की हर मनोदशा को अपने भीतर समेटा। यही कारण है कि वे केवल एक गायिका नहीं, बल्कि सांगीतिक जीवन की आधारशिला हैं।

स्मृति और अनुभव

बहुत-से श्रोताओं की तरह बचपन से ही यह आवाज़ संगीत का पर्याय बन गई। भीमसेन जोशी और कुमार गंधर्व का असर गहरा रहा होगा, पर लता का नाम सुनते ही ध्यान एकदम उसी पर टिक जाता है।

स्मृतियाँ बताती हैं कि कैसे कैसेट के ज़माने में लोग अपने पसंदीदा 20 गीत चुनकर एक टेप तैयार कराते थे , क्योंकि हर गाना अलग से ढूँढना कठिन था। “आएगा आने वाला”, “आ जा रे परदेसी”, “पिया तोसे नैना लागे रे”, “धीरे धीरे मचल”, “ना जिया लागे ना” , ऐसी सूची एक सहचरी बन जाती थी। परंतु, जैसे-जैसे समय बढ़ता गया, नित नए गीत सामने आते रहे और लगता रहा कि लता को पुनः खोजा जा सकता है।

1952 की फिल्म जाल के गीत “पिघला है सोना” और “कैसी ये जागी अगन” सुनकर आज भी वही विस्मय होता है, मानो तरुणी लता के स्वर में नदियों की धारा और समय का चक्र एक साथ गा रहा हो।

स्वर का अधिभौतिक वैभव

लता की आवाज़ हमारी दुनिया में धूप-चाँदनी की तरह बिखरी, पर उसका दूसरा छोर किसी ऐसे लोक से जुड़ा था जहाँ हमारी पहुँच नहीं। राजशेखर ने जिस भावयित्री और कारयित्री प्रतिभा की बात की, उससे आगे लता स्वयं ही बीज थीं , स्वर-स्वरूपा।

“आ जा री आ निंदिया तू आ” सुनते ही निष्कम्प दीपशिखा का आभास होता है। “नैन सो नैन नाहि मिलाओ” में भोर का आलोक महसूस होता है। “जाग दर्दे-इश्क जाग” में विद्युल्लता-सा वज्रपात और “आएगा आने वाला” में नींद में घुली बारिश का सपना। यही वह अधिभौतिक तन्मयता है, जो किसी भी सांसारिक संदर्भ से परे है।

अभिमान और विनम्रता

फिल्म “अभिमान” में लता जी ने स्त्री-स्वर के सभी गीत गाए। पुरुष-स्वर रफ़ी, किशोर और मनहर उधास ने गाए। कहानी में गायिका पति से अधिक प्रतिभाशाली दिखाई जाती है। यह संकेत भले ही विवादास्पद बन सकता था, पर न रफ़ी साहब ने और न ही किशोर दा ने कोई आपत्ति जताई। इससे सिद्ध होता है कि इन मूर्धन्य गायकों के लिए लता की प्रतिभा स्वीकार्य और निर्विवाद थी। इसी तरह, जब “लता मंगेशकर पुरस्कार” स्थापित हुआ और वरिष्ठ संगीतकारों को दिया गया, तो उन्होंने भी सहर्ष स्वीकार किया। पुरुष का अभिमान अंततः स्त्री-प्रतिभा के समक्ष आहत नहीं हुआ।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि उनके पास स्वर का अमरत्व था । लता मंगेशकर भारतभूमि पर जन्मी सबसे बड़ी प्रतिभा थीं। उनकी आवाज़ में केवल सुर नहीं, बल्कि आत्मा का नाद है। वह स्वर जो नश्वर कंठ से निकलकर अनश्वर हो गया। आज भी जब हम उनका कोई गीत सुनते हैं, तो लगता है जैसे समय ठहर गया हो। हमारी सांसारिक दोपहर एक दिव्य तन्मयता में बदल जाती है। यही उनका चमत्कार है।

मनुष्यजाति जब भी विधाता को चुनौती देगी कि उसने भी सृष्टि जैसी कृति रची है, तो वह लता का गाना ही होगा।

Topics: लता मंगेशकरLata Mangeshkarपाञ्चजन्य विशेष
डॉ विश्वास चौहान
डॉ विश्वास चौहान
संयोजक जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र , मध्यप्रदेश ( प्राध्यापक विधि , शासकीय स्टेट लॉ कॉलेज भोपाल, मध्य प्रदेश ) [Read more]
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