राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : गीत रूपी जल से परिपक्व होती वैचारिक फसल
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : गीत रूपी जल से परिपक्व होती वैचारिक फसल

संघ में एकल गीत, गण गीत, संचलन गीत जैसे अनेक गीत होते हैं। गीत में लय, शब्द और विचार का समन्वय होता है। वे लंबे समय तक मन - मस्तिष्क में बैठ जाते हैं। इसलिए शाखा में हर दिन एक गीत होते है।

Written byविजय कुमारविजय कुमार
Sep 25, 2025, 10:50 pm IST
inविश्लेषण, संघ @100
एक कार्यक्रम में एकल गीत प्रस्तुत करता स्वयंसेवक

एक कार्यक्रम में एकल गीत प्रस्तुत करता स्वयंसेवक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के काम का आधार दैनिक शाखा तथा उसके शारीरिक और बौद्धिक कार्यक्रम हैं। इनमें गीत का भी प्रमुख स्थान है। प्रायः शाखा समाप्ति से पूर्व कोई सामूहिक गीत बोला जाता है। इनसे प्राप्त देश, धर्म और समाजसेवा के संस्कार स्वयंसेवकों के मन पर अमिट हो जाते हैं। ये गीत कई प्रकार के हैं। प्रायः शाखा में एक स्वयंसेवक पहले बोलता है, बाकी उसे दोहराते हैं। इन्हें ‘गणगीत’ कहते हैं। इसे याद करके जब सब मिलकर बोलते हैं, तो वह ‘समूहगान’ हो जाता है। किसी विशेष कार्यक्रम में बौद्धिक वर्ग से पूर्व एक स्वयंसेवक अकेले ही गीत बोलता है, उसे ‘एकल गीत’ कहते हैं। यह गीत उस बौद्धिक के विषय से संबंधित होता है। संचलन में उपयोगी गीत ‘संचलन गीत’ कहलाते हैं। खेलकूद प्रतियोगिता के बाद ताली बजाकर मस्ती भरे गीत गाने से थकान और मनोमालिन्य मिट जाता है। इन गीतों के अनेक संकलन संघ के विभिन्न प्रकाशनों ने छापे हैं। यद्यपि उनमें गीत तो अधिक हैं; पर लोकप्रिय वही होते हैं, जिनके शब्द और भाव सरल हों। साथ ही वे छोटे हों और लय भी अच्छी हो।

विजय कुमार­
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ

गहन बौद्धिकता वाले गीत अधिक नहीं चलते। इन गीतों की एक विशेषता यह भी है कि इन्हें कब और किसने लिखा या किसने लय बनायी, यह पता नहीं लगता। किसी स्वयंसेवक को कहीं कोई अच्छा गीत मिले, तो वह उसे शाखा में गा देता है। यदि वह व्यापक रूप से चल जाए, तो किसी संकलन में छपकर देशव्यापी हो जाता है। कई प्रतिभाशाली लोग इनका स्थानीय भाषा में अनुवाद तथा कुछ संशोधन भी कर देते हैं।

अधिकांश गीत दो-तीन साल ही चल पाते हैं, तो कुछ की यात्रा कई पीढ़ियों तक चलती रहती है। कुछ गीत प्रख्यात गायकों और संगीतकारों के प्रयास से अमर हो गए हैं। संघ के गीत समयानुकूल होते हैं। अतः संगठन, समर्पण, वीरता, सेवा भाव आदि को इनमें स्थान मिलता रहा है। देश की स्वाधीनता और विभाजन, चीन और पाकिस्तान के आक्रमण, संघ पर प्रतिबंध, आपातकाल और सत्ता परिर्वतन, एकात्मता यज्ञ यात्रा, गोरक्षा अभियान, राम मंदिर आंदोलन आदि पर बने गीत खूब लोकप्रिय हुए।

संघ में प्रचलित छह उत्सवों तथा डॉ.हेडगेवार और श्रीगुरुजी पर भी सैकड़ों गीत लिखे गए हैं। संघ का काम महाराष्ट्र से शुरू हुआ, इसलिए तब के गीतों में मराठी और संस्कृतनिष्ठ शब्द होते थे। विभाजन के बाद पंजाब और सिंध के लोग उत्तर भारत में आए, तो गीतों में उर्दू के शब्द आ गए। उनमें वीरभाव, बलिदान, देश और धर्म के संकट आदि का प्रभाव होता था। आपातकाल के बाद सेवा और समरसता पर जोर दिया जाने लगा, तो गीत भी ऐसे ही बनने लगे। अर्थात् समय की धारा के साथ गणवेश और कार्यक्रमों की तरह गीत भी बदले। यह संघ की जीवंतता का लक्षण है।

यहां एक रोचक प्रसंग याद आता है। मैं आपातकाल में चार महीने मेरठ जेल में रहा। वहां इंदिरा विरोधी राजनेता, नक्सली, आनंदमार्गी तथा जयप्रकाश गुट के सर्वोदयी भी थे। प्रतिदिन सुबह बिना ध्वज और प्रार्थना की शाखा के अंत में एक ‘गणगीत’ होता था। वहां कई गीतकार स्वयंसेवक थे। अतः हर सप्ताह एक नए गीत का नंबर आ जाता था। सर्वोदय वाले बुजुर्ग थे और सज्जन भी। वे भी गीत के समय वहां आ जाते थे। एक सप्ताह जो गीत हुआ, उसमें कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं— ‘नेत्र तीसरा पल भर को यदि, शंकर क्रोधी खोलेंगे रौद्र रूप धर चंद्रहास ले, असुर शक्ति को तोलेंगे। शत्रु रक्त को पीकर अपनी, पूर्ण प्रतिज्ञा कर लेंगे तांडव नृत्य दिखाएंगे, स्वयं काल बन जाएंगे। मां की रक्षा हित हम शत-शत, हिन्दू बलि हो जाएंगे।।’

इस दौरान सर्वोदय वाले पूरे हफ्ते नहीं आए। उन्होंने कहा कि अहिंसावादी होने कारण वे इसे नहीं गा सकते। जब गीत बदला, तो वे फिर आने लगे। यद्यपि इस गीत के उग्रभाव के कारण कई दिन तक नक्सली वहां आते रहे। 1983 में बरेली में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का संघ शिक्षा वर्ग लगा था। संघ स्थान सड़क के पास था। एक शाम वहां विशाल खेल हुआ। उसमें भरपूर उत्साह और संघर्ष भी था। इससे सड़क से गुजरते लोगों को लगा कि यहां झगड़ा हो गया है। किसी ने पुलिस को सूचना दे दी।

जब तक पुलिस आई, तब तक खेल समाप्त हो चुका था। सब मिलकर गीत गा रहे थे, ‘शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है…।’ पुलिस वालों ने सिर पीट लिया। संघ में हजारों ऐसे स्वयंसेवक हैं, जिन्हें संघ के विचार तो मालूम हैं, पर वे उसे व्यक्त नहीं कर पाते; लेकिन उन्हें बचपन के शाखा गीत आज भी प्रेरणा देते हैं। तृतीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस संघ कार्य के लिए बंगाल गए थे। वहां का एक ग्राम्य गीत (धन धान्य पुष्पे भरा) उन्हें बहुत पसंद था। आगे चलकर संघ के घोष ने भी इसे अपना लिया।

जब बालासाहब ने 11 मार्च, 1994 को सरसंघचालक की जिम्मेदारी रज्जू भैया को दी, तो शाम को नागपुर में एक सार्वजनिक कार्यक्रम हुआ। समापन के बाद मंच के पास आकर घोषदल ने बहुत देर तक यह गीत बजाया। इस दौरान बालासाहब अति प्रसन्न दिखायी दिए। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब वरिष्ठ प्रचारक या कार्यकर्ताओं ने अंतिम समय में अपना कोई प्रिय गीत सुनने की इच्छा व्यक्त की। वरिष्ठ प्रचारक एवं पत्रकार भानुप्रताप शुक्ल जब अस्पताल में भर्ती थे, तो श्री सुदर्शन उनसे मिलने गए। सुदर्शन जी ने उन्हें एक गीत और फिर प्रार्थना सुनायी। इससे उनके चेहरे पर चमक आ गई। गीत में लय, शब्द और विचार का समन्वय होता है। वे लंबे समय तक मन और मस्तिष्क में बैठ जाते हैं। गीत रूपी जल की सिंचाई से ही वैचारिक फसल परिपक्व होती है। इसलिए शाखा में हर दिन गीत होना जरूरी है।

 

Topics: संचलन गीतराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघसमाजसेवा के संस्कारधर्मएकात्मता यज्ञ यात्रादेशगोरक्षा अभियानराम मंदिर आंदोलनपाञ्चजन्य विशेषVijay Kumarविजय कुमारRSS के 100 सालसंघ में एकल गीतगण गीत
विजय कुमार
विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ [Read more]
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